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Bihari Ratnakar in Hindi बिहारी रत्नाकर के दोहे (13-18) व्याख्या


Bihari Ratnakar Ke Dohe Vyakhya Bhav Sahit by Jagannath Das Ratnakar in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! आज हम श्री जगन्नाथदास रत्नाकर रचित “बिहारी-रत्नाकर” के अगले 13-18 तक के दोहों की विस्तृत व्याख्या समझने वाले है। तो चलिए शुरू करते है :

श्री जगन्नाथदास रत्नाकर रचित “बिहारी-रत्नाकर” के दोहों का विस्तृत अध्ययन करने के लिये आप
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Bihari Ratnakar in Hindi बिहारी रत्नाकर के दोहों (13-15) की व्याख्या


Jagannath Das Ratnakar Krit Bihari Ratnakar Ke Dohe 13-15 Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! बिहारी रत्नाकर के 13-15 दोहों की व्याख्या इसप्रकार है :

दोहा : 13.

जोग-जुगति लिखए सबै, मनों महामुनि मैन।
चाहत पिय-अद्वैतता, काननु सेवत नैन।।13.।।

व्याख्या :

इस दोहे में नायक ने नायिका को देखा है। नायिका अब युवती हो चुकी है। अब उसके शरीर और व्यक्तित्व में परिवर्तन आया है और उसमें भी सबसे ज्यादा आकर्षण उसके नेत्रों में हुआ है। उसके इन नेत्रों के जाल में नायक बंध गया है। इस परिवर्तन की ओर नायिका की सखी उसका ध्यान आकर्षित करती है।

वह कहती है कि हे सखी ! जबसे तुम युवती हुई हो, तबसे तुम्हारे नेत्र विस्तृत हो गये है और इन विस्तृत नेत्रों को देखकर ऐसा लग रहा है, जैसे मानो महामुनि कामदेव ने प्रेम-भोग साधना का सारा कौशल तुम्हारे नेत्रों को ही सिखा दिया है। अब तेरे नेत्र प्रियतम से मिलने की चाहत में कानो तक लम्बे हो गए है।

कहने का तात्पर्य है कि जिसप्रकार ईश्वर की प्राप्ति के लिए मनुष्य वैराग्य धारण करके कानन अर्थात् वन की ओर चले जाते है, उसी प्रकार तुम्हारे नेत्र भी प्रियतम की प्राप्ति-कामना से कानो तक चले गये है। दोस्तों ! इस दोहे में छेकानुप्रास, वृत्यानुप्रास, उत्प्रेक्षा और श्लेष आदि अलंकारों का प्रयोग हुआ है।

दोहा : 14.

खरी पातरी कान कौ, कौन, बहाऊ बानि।
आक-कली न रली करै अली, अली, जिय जानि।।14.।।

व्याख्या :

दोस्तों ! इस दोहे में नायिका को एक शंका हो गयी है कि नायक किसी दासी के प्रेमजाल में फंस गया है। इस बात से वह नायक से रूठ जाती है। नायक नायिका को मनाने की बहुत कोशिश करता है। लेकिन जब वह असफल हो जाता है, तब नायिका की अंतरंग सखी को अपने हृदय की बात बताता है।

तब सखी नायक के सन्देश को लेकर नायिका के पास जाती है और उसको समझाती हुई कहती है कि हे सखी ! तू तो कान की कच्ची है। तुम्हारा यह स्वभाव तुम्हें नष्ट करने वाला है। बिना विचार किये सब बातो पर विश्वास कर लेती हो।

तू मेरी इस बात को सत्य मान ले कि भ्रमर किसी भी स्थिति में आक की कली के साथ विहार नहीं कर सकता है अर्थात् कोई भी उच्च कुल में उत्पन्न व्यक्ति किसी भी निम्न स्त्री के साथ प्रेम का आनंद नहीं लेता है। इस दोहे में छेकानुप्रास, वृत्यानुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

दोहा : 15.

पिय बिछुरन को दुसहु दुखु, हरषु जाल प्यौसार।
दुरजोधन सौं देखयति तजत प्रान इहि बार।।15.।।

व्याख्या :

दोस्तों ! यहाँ मध्यावस्था नायिका का चित्रण हुआ है। नायिका अपने ससुराल से अपने पिता के घर जा रही है। अतः उसे एक ओर तो अपने पिता के घर जाने का सुख अनुभव हो रहा है और दूसरी ओर अपने प्रियतम से बिछड़ने का दु:ख भी हो रहा है।

कवि ने नायिका की इस सुख-दु:खमयी मन:स्थिति की तुलना दुर्योधन से की है। प्राण तजते समय जो हर्ष और विषाद की स्थिति दुर्योधन की थी, ठीक वैसी ही नायिका की मन:स्थिति प्रतीत हो रही है। इस दोहे में छेकानुप्रास, वृत्यानुप्रास और उपमा अलंकार का प्रयोग हुआ है।

Bihari Ratnakar in Hindi बिहारी रत्नाकर के दोहों (16-18) की व्याख्या


Jagannath Das Ratnakar Krit Bihari Ratnakar Ke Dohe 16-18 Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! बिहारी रत्नाकर के अगले 16-18 दोहों की व्याख्या इसप्रकार है :

दोहा : 16.

झीनै पट मैं झुलमुली झलकति ओप अपार।
सुरतरु की मनु सिंधु मैं लसति अपल्लव डार।।16.।।

व्याख्या :

इस दोहे में वासकसज्जा नायिका का चित्रण किया गया है। नायक वासकसज्जा, मुग्धा नायिका पर रीझ जाता है। नायिका ने पारदर्शी वस्त्र पहन रखे है और उस पारदर्शी वस्त्र में से उसका शरीर दिखाई दे रहा है। उसके सौंदर्य की तुलना महाकवि बिहारी ने कल्पवृक्ष के पत्तो से युक्त शाखा से की है।

कवि कहते हैं कि नायिका के वस्रों के अंदर से शरीर की कांति इस प्रकार झिलमिलाती हुई शोभा दे रही है, मानो समुंद्र के अंदर कल्पवृक्ष की कोई डाली पत्तों सहित झिलमिलाते हुई दिखाई पड़ रही हो। दोस्तों ! प्रस्तुत दोहे में वृत्यानुप्रास और छेकानुप्रास अलंकार प्रयुक्त हुआ है।

दोहा : 17.

डारे ठोढी-गाङ, गहि नैन-बटोही मारि।
चिलक-चैंध मैं रूप-ठग, हाँसी-फांसी हारि।।17.।।

व्याख्या :

नायिका के सौंदर्य पर मुग्ध नायक की स्थिति का वर्णन करते हुए कवि कह रहे हैं कि नायिका की ठोडी पर छोटा सा गड्डा है, जो उसके सौंदर्य को द्विगुणित कर रहा है। नायक के नेत्र नायिका की ठुड्डी पर स्थित गड्ढे में अटक कर रह गये है।

नायक स्वयं कह रहा है कि मेरे नेत्र रुपी राहगीर को नायिका के सौंदर्य रुपी ठग ने पकड़कर मधुर हास्य रुपी फांसी लगाकर मार दिया है और चिबुक रुपी गड्ढे में ले जाकर डाल दिया है। कहने का भाव यह है कि नायिका के हास्य ने नायक को और अधिक आकर्षित कर लिया। इस दोहे में सांगरूपक और छेकानुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

दोहा : 18.

कीनै हूँ कोटिक जतन, अब कहि काढ़ै कौनु।
भो मन मोहन-रूपु मिलि, पाना मैं को लौनु।।18.।।

व्याख्या :

दोस्तों ! इस दोहे में एक सखी अपने मोहन के प्रेम में डूबी सखी को समझा रही है कि तुझे पर-पुरुष पर अनुरक्त नहीं होना चाहिए। वह कहती है कि हे सखी ! तू उसकी ओर से अपना ध्यान हटा ले। इस पर सखी अपनी प्रेम विवशता को व्यक्त करती है।

और कहती है कि हे सखी ! मेरे मोहन का लावण्यमय रूप मेरे मन रुपी मानसरोवर में मिलकर पानी में घुले नमक के समान एक हो गया है। अब कोई कोटि प्रयत्न करके भी उसे बाहर नहीं निकाल सकता। कहने का भाव यह है कि मेरा मन नायक के प्रेम में इतना डूब गया है कि करोडो प्रयत्न करने पर भी उसे बाहर नहीं निकाला जा सकता है। इस दोहे में वृत्यानुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

इसप्रकार दोस्तों ! आज हमने बिहारी रत्नाकर के अगले 13-18 तक के दोहों की विस्तृत व्याख्या को समझा। उम्मीद है कि आपको समझ में आया होगा। अगले भाग में कुछ नए दोहों के साथ मिलते है।


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एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको “Bihari Ratnakar in Hindi बिहारी रत्नाकर के दोहे (13-18) व्याख्या” के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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