Longinus | लोंजाइनस का उदात्त सिद्धांत एवं पेरिइप्सुस ग्रंथ


नमस्कार दोस्तों ! आज हम Longinus | लोंजाइनस और उसके उदात्त सिद्धांत के बारे में विस्तार से चर्चा करने जा रहे है। साथ ही लोंजाइनस के प्रमुख ग्रन्थ पेरिइप्सुस के बारे में भी कुछ महत्वपूर्ण बातें समझने की कोशिश करते है। और इस ग्रन्थ के कुछ प्रमुख अध्यायों का विवेचन भी जानते है। चलिए शुरू करते है :



Longinus | लोंजाइनस : पाश्चात्य साहित्य शास्त्र में प्लेटो और अरस्तू के बाद तीसरा महत्वपूर्ण नाम लोंजाइनस का है। इनका यूनानी नाम ” लोंगिनुस स्वदहपदने” है। लोंजाइनस का ग्रंथ है : पेरिइप्सुस। पेरिइप्सुस का अर्थ है : उदात्त के विषय में। अंग्रेजी में इसका अर्थ है : सबलाइम

लोंजाइनस का समय प्रथम या तृतीय शताब्दी है। लोंजाइनस का ग्रंथ पेरिइप्सुस भी अरस्तु के ग्रंथ “पेरिपोइएतिकेस” के समान ही पाश्चात्य साहित्य शास्त्र का मूल आधार माना जाता है। इस ग्रंथ का प्रकाशन सबसे पहले 1554 ई. में इटालवी विद्वान “रोबेरतेल्लों” ने करवाया था।

सर्वप्रथम अंग्रेजी अनुवाद 1652 ई. में जॉन हॉल ने “ऑन द हाइट ऑफ ए जोक्वेन्स” शीर्षक से प्रकाशित कराया था । उदात्त का निरूपण सर्वप्रथम “केकिलिउस” नामक व्यक्ति ने किया।

कुछ विद्वानों का विचार रहा है कि पेरिइप्सुस के रचयिता लोंजाइनस तीसरी सदी ई. पूर्व के हैं। यह रोम संरक्षित सीरियन राज्य पालमीरा की महारानी “जैकोबिया” के प्रतिष्ठित मंत्री और वीर थे ।जिन्होंने महारानी के हित में प्राणोत्सर्ग कर दिया।

प्रो .रीज राबर्टस का विचार है कि पेरिइप्सुस के रचयिता जैकोबिया के मंत्री नहीं बल्कि पहली सदी ई. के कोई अज्ञात रोमन साहित्यकार हैं ।इनका पूरा नाम “दिओनोसिउस लोंगिनुस” था, जबकि जैकोबिया के मंत्री का नाम “केसिअस लोंगिनुस “था।

वर्षों तक अंधकार के गर्त में पड़े रहने के बाद “रोबेरतेल्लों “के प्रयास से पहली बार 1554 ई. में यह पुस्तक प्रकाश में आई।


Longinus | लोंजाइनस का पेरिइप्सुस ग्रंथ :

पेरिइप्सुस के रचयिता एक ऐसे ग्रीक साहित्यकार हैं, जो ग्रीक देश की प्राचीन संस्कृति और गौरवपूर्ण इतिहास से चमत्कृत है। साथ ही अंतिम अध्याय (44वें) में प्रश्न उठाया है कि अलौकिक प्रतिभा के रचनाकार अब क्यों उत्पन्न नहीं होते ?

इसके उत्तर में वे तात्कालिक युग की धनासक्ति और विषयासक्ति को उदात्त साहित्य के पतन का कारण मानते हैं।

पेरिइप्सुस के बारे में हम आपको बता दें कि “पेरिइप्सुस” वर्तमान अपूर्ण और खंडित रूप में एक छोटी सी कृति है। पेरिइप्सुस मे 44 अध्याय हैं। यह रचना किसी अज्ञात रोमन मित्र को संबोधित की गई है। जिसका नाम “पोस्तुमिउस तेरेन्तिआनुस” है।

इस पुस्तक का घोषित विषय साहित्य शास्त्र है किंतु इसकी मूल अवधारणा साहित्य में औदात्त्य विषयक अवधारणा है। इसके अध्याय 1 से अध्याय 7 तक में औदात्त्य नैसर्गिक प्रतिभा तथा कलागत अभ्यास, वागाडम्बर, शब्दाडम्बर आदि का विवेचन किया है।

लोंजाइनस ने काव्य की अवरोधक तत्वों का उल्लेख किया है जो इस प्रकार है :

  1. भावाडम्बर
  2. शब्दाडम्बर
  3. बालेयता

अध्याय 7 के अनुच्छेद 8 में उदात्त के पांच स्रोतों का उल्लेख मिलता है :

  • उदात्त विचार
  • उदात्त भाव
  • सहज आलंकारिक योजना
  • उत्कृष्ट भाषा
  • गरिमामय रचना विधान

Longinus | लोंजाइनस के पेरिइप्सुस ग्रंथ के अध्याय :

पेरिइप्सुस के अध्याय 1 में केकिलिउस द्वारा लिखे उदात्त संबंधी निबंध की अपूर्णता का उल्लेख करते हुए इस विषय पर पुनर्विचार करना आवश्यक माना है।

अध्याय 8 से 15 तक में उदात्त के प्रथम दो स्रोतों का विवेचन मिलता है :

  • महान विचारों के धारण करने की शक़्तियां।
  • भाव एवं संवेगो की प्रबलतम् व उत्कृष्ट अभिव्यक्ति।

16 से 29 अध्याय तक में सहज अलंकार योजना अर्थात उदात्त के तीसरे स्रोत का विवेचन मिलता है। उदात्त सृजन में सहायक अलंकारों में इन्होंने विपर्यय, यति क्रम, रूप परिवर्तन, सार, पर्यायोक्ति आदि अलंकारों का उल्लेख किया है। लोंजाइनस ने 12 अलंकारों का उल्लेख किया है।

30 से 38 अध्याय तक में उदात्त के चतुर्थ स्रोत का विवेचन मिलता है। शब्द चयन, भाषा के अलंकरण आदि पर विचार किया गया है।

39 और40 अध्याय में उदात्त के पांचवें अंतिम स्रोत गरिमामय एवं भव्य रचना विधान का विवेचन किया गया है।

41 से 43 अध्याय में उदात्त बाधक छंद लय एवं शब्द प्रयोग का उल्लेख मिलता है।

अंतिम 44 वें अध्याय में तत्कालीन नैतिक पतन की अकुलाहट ध्वनित होती है। वे नैतिक पतन को ही उदात्त साहित्य के हास् का कारण मानते हैं।



Longinus | लोंजाइनस के उदात्त सिद्धांत का स्वरूप


उदात्त सिद्धांत के स्वरूप को इस प्रकार से समझ सकते है :

  • औदात्त्य अभिव्यक्ति की उच्चता व उत्कृष्टता का नाम है।
  • अभिव्यक्ति की उच्चता पाठक या श्रोता के तर्क का समाधान नहीं करती अपितु उसे भावाभिभूत कर लेती है।
  • रचना का औदात्त्य पाठक को अनायास ही अपने प्रबल प्रवाह में बहा ले जाता है।
  • किसी रचना का शिल्प उसके एक या दो अंशों से नहीं बल्कि संपूर्ण रचना विधान से धीमे-धीमे प्रकाश में आता है। यदि उदात्त विचार अवसर के अनुकूल आ जाए तो एकाएक विद्युत की भांति चमक कर संपूर्ण विषय वस्तु को आलोकित कर देता है। क्षण भर में वक्ता का समस्त वाग्वैभव प्रकाशित हो जाता है।
  • लोंजाइनस का विचार है कि महान विद्वान प्रतिभावान एवं उच्च चरित्रवान ही उदात्त रचनाए दे सकते हैं। वे कहते हैं :

“औदात्त्य आत्मा की महानता का प्रतिबिंब है”
सच्चा औदात्त्य केवल उन्हीं में प्राप्य है जिनकी चेतना औदात्त्य एवं विकासोन्मुख है। जिनका जीवन तुच्छ एवं संकीर्ण विचारों के अनुसरण में व्यतीत होता है। वे कभी भी मानवता के स्थायी महत्व की रचना नहीं दे सकते।


Longinus | लोंजाइनस का औदात्त्य भाव :

इस प्रकार औदात्त्य की सत्ता रचना के भाव पक्ष एवं कला पक्ष दोनों को समाहित कर लेती है। औदात्त्य एक भाव भी है, विचार भी है और शैली का एक गुण भी है। यहां तक कि वह कलाकार के व्यक्तित्व का अनिवार्य गुण भी है। जब रचनाकार का व्यक्तित्व औदात्त्य होता है तभी वह औदात्त्य विषयक औदात्त्य भावों और विचारों को आत्मसात कर पाता है।

ध्यान देने वाली बात यह है कि लोंजाइनस ने पहली बार कवि के व्यक्तित्व को कविता की भव्यता से संबंध करके काव्य चिंतन की दशा ही बदल दी।

अरस्तु ने अनुकरण सिद्धांत में कवि के आत्म तत्व को महत्व देते हुए भी कलाकार के व्यक्तित्व को उतना स्थान नहीं दिया, जितना दिया जाना चाहिए। अरस्तु ने वस्तुपरक आत्मतत्व को स्थान दिया है और अलंकार को प्रकृति का विशिष्ट अनुकर्ता मात्र माना है।

लोंजाइनस ने कवि के व्यक्तित्व को वरीयता देते हुए रचना की भव्यता को रचनाकार से सम्बन्ध कर दिया। यह उनकी महत्वपूर्ण देन है।

इन्हीं संदर्भों में “स्कॉट जेम्स” ने लोंजाइनस को प्रथम स्वच्छंदतावादी आलोचक माना है। यद्यपि लोंजाइनस शास्त्रवादी विचारक है तथापि इनके उदात्त सिद्धांत में शास्त्रवाद और स्वच्छंदतावाद का मणिकांचन योग मिलता है।



Longinus | लोंजाइनस के उदात्त के पांच स्रोत


Longinus | लोंजाइनस के उदात्त के पांच स्रोत निम्नप्रकार समझ सकते है :


1. उदात्त विचार | महान विचारों के धारण करने की शक्ति :

उदात्त विचार का संबंध उदात्त व्यक्तित्व से है। रचनाकार को उन महापुरुषों के साथ तादात्म्य करना पड़ता है। जिनका चित्रण वह अपनी कविता में करता है। महान विचारों के धारण करने की शक्ति प्राकृतिक देन है। जिसे लोंजाइनस ने पेरिइप्सुस के नवें अध्याय में नैसर्गिक प्रतिभा कहा है।

यद्यपि इस शक्ति को अभ्यास से भी अर्जित किया जा सकता है। महान विचारों से रहित साहित्यकार उदात्त सृजन नहीं कर सकता। क्योंकि “औदात्य महान आत्मा की सच्ची प्रतिध्वनि है।” लोंजाइनस ने तो महान आत्मा के द्वारा प्रेरित मौन को भी उदात्त की संज्ञा दी है।


2. उदात्त भाव | भावों या सवेगों की उत्कृष्टत्तम एवं प्रबल अभिव्यक्ति :

महान विचारों के धारण करने की क्षमता के साथ ही साथ उनको अभिव्यक्त करने की प्रबल शक्ति भी रचनाकार में होनी चाहिए। अभिव्यक्ति की क्षमता भी प्रकृति प्रदत है। उदात्त के इस दूसरे स्रोत के बारे में लोंजाइनस ने जो कुछ कहना चाहा है, उसका अधिकांश भाग लुप्त है। यहां पांडुलिपि खंडित पाई गई है।

लोंजाइनस कहते हैं – नायकों की भावनाओं एवं मनोवेगों से तादात्म्य स्थापित करके ही रचनाकार भाव की उचित स्थिति को पहचान सकेगा। उपयुक्त परिस्थितियों का चयन एवं उनका सम्यक रूप में संघटन ही भावावेग का जनक है।


3. अलंकारों की समुचित योजना :

अलंकार प्रयोग से ही उदात्त शैली का निर्माण होता है। अलंकार भावावेग की प्रेरणा से काव्य में आने चाहिए। तभी वे औदात्त्य में सहायक बनते हैं। कल्पना की कौड़ी के पंख लगाकर उड़ने वाले कृत्रिम अलंकार काव्य की उदारता को नष्ट करते हैं।

रचनाकार को पता भी ना लगे कि अलंकार का प्रयोग कब हो गया। यह सर्वाधिक उचित स्थिति है। उदात्त सृजन में सहायक अलंकारों का निर्देश लोंजाइनस ने इस प्रकार से दिया है : विस्तारण, संबोधन, प्रश्नालंकार, विपर्यय, व्यतिक्रम, पुनरावृति, छिन्नवाक्य, प्रत्यक्षीकरण, संचयन, रूप परिवर्तन, पर्यायोक्ति आदि।


4. उत्कृष्ट भाषा | अभिजात अभिव्यक्ति :

अभिजात अभिव्यक्ति से तात्पर्य काव्य भाषा से है जिसके दो अंश है :

  • उपयुक्त और प्रभावक शब्द चयन।
  • अलंकृत भाषा प्रयोग जिसमें रूपक व अतिश्योक्त्ति अलंकारों का प्रयोग जरूरी है।

यहां भी पांडुलिपि के 4 पृष्ठ गायब हैं। प्राप्त पृष्ठो के अनुसार उपयुक्त शब्द चयन प्रभावोत्पादक शब्दावली पाठक या श्रोता को भावाभिभूत कर लेती है। शब्द योजना में भाव प्रवणता शक्ति, औज, गुण, सौंदर्य गरिमा आदि श्रेष्ठ तत्व समाहित होने चाहिए। लोंजाइनस कहते हैं –

“सुंदर शब्द ही सुंदर विचार को अभिव्यक्त कर पाता है।”


5. गरिमामय एवं भव्य रचना विधान :

उदात्त का यह अंतिम स्रोत है। इस स्रोत में उपरोक्त चारों स्रोत समाहित है। काव्य रचना के विभिन्न उपकरणों का सामंजस्य अर्थात विचार, भाव अलंकार, भाषा व शब्दों आदि का पूर्ण संगुम्फन।

उदात्त के चारों स्रोतों का पूर्ण एवं उचित समन्वय ही भव्य रचना विधान कहलाता है। शब्दों के व्यवस्थित क्रम से काव्य में सामंजस्य आता है। भाषा के सामंजस्य में छंद विधान का भी अपना महत्व है।

— लोंजाइनस ने उदात्त के इन पांच स्रोतों के अतिरिक्त बिंब विधायिनी कल्पना को भी साहित्य में गरिमा और ऊर्जा सृजन का महत्वपूर्ण तत्व माना है।


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