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Sadharanikaran Ka Siddhant | साधारणीकरण का सिद्धांत


Sadharanikaran Ka Siddhant | साधारणीकरण का सिद्धांत : साधारणीकरण का सबसे अधिक महत्व होता है। रस सिद्धांत में वस्तुतः साधारणीकरण के बिना रसानुभूति नहीं हो सकती।

रस सिद्धांत का आविष्कार आचार्य भट्टनायक ने किया। साधारणीकरण का अर्थ है – सामान्यीकरण। असाधारण को इस प्रकार प्रस्तुत करना कि वह सभी के लिए सहज ग्रहणीय बन जाए, साधारण बन जाए साधारणीकरण कहलाता है।

साधारणीकरण व्यापार में वस्तुएं सामान्य रूप में प्रतीत होती है। साधारणीकरण रसास्वादन का केंद्रीय बिंदु है क्योंकि बिना साधारणीकरण के रसास्वादन नहीं किया जा सकता।

असल में साधारणीकरण वह सामान्यीकृत अनुभव है जिसमें वस्तुएं देशकाल के विशिष्ट बंधनों से मुक्त हो जाती है। साधारणीकरण रस की पूर्ववर्ती प्रक्रिया है। इसको हम राग द्वेष मुक्त अवस्था कह सकते हैं।

साधारणीकरण की प्रक्रिया में सहृदय ममत्त्व , परत्व के क्षुद्र बंधनों से मुक्त होकर एक सामान्य भाव भूमि को प्राप्त करता है। रामचंद्र शुक्ल ने इसे ही रस दशा की संज्ञा दी है।



Sadharanikaran Ka Siddhant | साधारणीकरण का सिद्धांत के संबंध में मत


Sadharanikaran Ka Siddhant | साधारणीकरण का सिद्धांत : साधारणीकरण के संबंध में विभिन्न विद्वानों ने जो मत प्रस्तुत किया है वह निम्नानुसार है:-

1. Bhatt Nayak | भट्ट नायक का मत

भट्ट नायक के अनुसार :

” साधारणीकरण विभावादी का होता है। “

भट्टनायक शब्द रूप काव्य के तीन व्यापार मानते हैं :

  • अभिधा व्यापार
  • भावकत्व व्यापार
  • भोजकत्व व्यापार

वे इनमें से भावकत्व को ही साधारणीकरण मानते हैं। भट्टनायक विभावादी के सामान्य हो जाने को साधारणीकरण मानते हैं। विभावादी के अंतर्गत स्थायी भाव, संचारी भाव, आलंबन विभाव आदि सभी आते हैं।


2. Acharya Abhinav Gupt | आचार्य अभिनव गुप्त

अभिनव गुप्त का मत है – साधारणीकरण हो जाने पर विभावादी ममत्त्व, परत्व की भावना से मुक्त हो जाते हैं। उनके अनुसार

“विभावादी के साथ-साथ स्थायी भाव का भी साधारणीकरण हो जाता है। “

आश्रय व आलंबन का साधारणीकरण हो जाने से स्थायी भाव अपने देशकाल के बंधन से मुक्त हो जाता है और रस की अभिव्यक्ति हो जाती है। अभिनव गुप्त विभावादी का ममत्व-परत्व संबंध से अलग होना ही साधारणीकरण मानते हैं।


3. Acharya Vishwanath | आचार्य विश्वनाथ

इन्‍होंंने अभिनव गुप्त से सहमति दिखलाई है। इनके अनुसार :

“साधारणीकरण” रामादि नायकों एवं सामाजिक को अपना साधारण आश्रय बनाना ही
विभावादिको का विभावन व्यापार है ।”

इनके प्रभाव से प्रमाता (सहृदय) भी समुंद्रलंघन जैसे कार्य को सरल मानने लगता है। आश्रय का साधारणीकरण हो जाने से सामाजिक व हनुमानजी में अभेद तादात्म्य स्थापित हो जाता है।

अतः Sadharanikaran Ka Siddhant (साधारणीकरण का सिद्धांत) के फलस्वरुप सामाजिक का आश्रय के साथ अभेद तादातम्य स्थापित हो जाता है।


4. Acharya Ramchandra Shukla | आचार्य रामचंद्र शुक्ल

इनके अनुसार साधारणीकरण आलम्बनत्व धर्म का होता है। इससे तात्पर्य है कि इसमें व्यक्ति तो विशेष रहता ही है लेकिन उसमें प्रतिष्ठा ऐसे साधारण धर्म की होती है जिसके साक्षात्कार से सहृदय पाठकों या श्रोताओं के मन में एक ही भाव का उदय न्यूनाधिक मात्रा में अवश्य उत्पन्न होता है

साधारणीकरण स्वरूप का होता है, व्यक्ति अथवा वस्तु का नहीं। विभावादी सामान्य रूप से प्रतीत होते हैं। इसका अर्थ यह है कि रस मग्न पाठक थोड़ी देर के लिए सामान्य हृदय लोग धारण कर लेता है। उसके हृदय में यह भेदभाव नहीं रहता कि यह आलंबन मेरे है या दूसरे के।

आचार्य शुक्ल विचार करते हैं कि जहां पूर्ण रस होता है वहां तीन हृदयो का समावेश होना चाहिए।

  • आलंबन द्वारा भाव की अनुभूति प्रथम तो कवि में होनी चाहिए ।
  • दूसरा उसके द्वारा वर्णित पात्र में पाठक या श्रोता में ।
  • विभावादी के द्वारा जो साधारणीकरण होता है वह तभी चरितार्थ होता है।


5. Shyamsundar Das | श्यामसुंदर दास

सहृदय पाठक या श्रोता के चित्त का साधारणीकरण मानते हैं। इनके अनुसार कवि और पाठक की चितवृतियो का एक तान व एक लय हो जाना ही Sadharanikaran Ka Siddhant | साधारणीकरण का सिद्धांत है।

इस प्रकार श्यामसुंदर दास ने चित्त का साधारणीकरण माना है। इन्होंने साधारणीकरण की प्रक्रिया में मधुमति भूमिका की परिकल्पना की है।


6. Dr. Nagendra | डॉ. नगेंद्र

साधारणीकरण के संबंध में डॉ नगेंद्र का मत भी महत्वपूर्ण है –

“वह कवि की अनुभूति का साधारणीकरण मानते हैं “

साधारणीकरण कवि की अनुभूति या भावना का होता है जिसे हम Sadharanikaran Ka Siddhant| साधारणीकरण का सिद्धांत कहते हैं। वह कवि की अनुभूति का सुसंवेध रूप होता है।


7. Ramdahin Mishra | रामदहिन मिश्र

इनके अनुसार साधारणीकरण कवि की अनुभूति के साथ होता है।


8. Gulab Roy | गुलाब राय

इनके अनुसार साधारणीकरण व्यक्ति का नहीं, उसके संबंधों का होता है।


9. Nanddulare Vajpai | नंददुलारे वाजपेई

इन्होंने अपनी पुस्तक “नया साहित्य नए प्रश्न” में लिखा है कि साधारणीकरण वास्तव में कवि कल्पित समस्त व्यापार का होता है, केवल किसी पात्र विशेष का नहीं।

वास्तव में साधारणीकरण रस की वह पूर्ववर्ती प्रक्रिया है जिसके द्वारा सहृदय समस्त पूर्वाग्रहों से मुक्त हो जाता है। निष्कर्षत: कह सकते हैं कि Sadharanikaran Ka Siddhant | साधारणीकरण का सिद्धांत :

  • आलम्बनत्व धर्म का होता है।
  • सहृदय पाठक या श्रोता के चित का होता है।
  • कवि की अनुभूति का होता है।

अतः यह कहना उचित होगा कि डॉ. नगेंद्र का मत आचार्य शुक्लश्यामसुंदर दास दोनों के मतों का समन्वय करने वाला है। इसलिए अधिक उपयुक्त है।


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एक गुजारिश :

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