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Kavy Hetu । काव्य हेतु और उसके प्रकार एवं महत्वपूर्ण तथ्य


Kavy Hetu (काव्य हेतु) : काव्य हेतु काव्य का सृजनात्मक पक्ष है।

काव्य हेतु दो शब्दों से मिलकर बना है – काव्य और हेतु जिसमें काव्य का अर्थ कविता और हेतु का अर्थ कारण है।

किसी भी मनुष्य में काव्य की क्षमता उत्पन्न कर देने वाले कारण या कारक काव्य हेतु कहलाते हैं । काव्य – कार्य है और हेतु- कारण है।

बाबू गुलाब राय के अनुसार :

“हेतु का भी प्राय उन साधनों से है जो कभी की काव्य रचना में सहायक बनते हैं।”



Kavy Hetu । काव्य हेतु के प्रकार


Kavy Hetu (काव्य हेतु) : काव्य हेतु तीन प्रकार के होते हैं –

  • प्रतिभा
  • व्युत्पत्ति
  • अभ्यास

इन तीनों को इस प्रकार समझ सकते हैं :

प्रतिभा :

यह जन्मजात होती है जबकि व्युत्पत्ति और अभ्यास हासिल की जाने वाली चीजें हैं। व्युत्पत्ति के अंतर्गत लोक, शास्त्र और कला इन तीनों का समावेश होता है।

हम आपको बता दे कि संस्कृत समीक्षा शास्त्र में जहां भी लोक का उल्लेख आया है, वहां कला का भी उल्लेख हुआ है । जैसे कि आपको पता होगा किलोक मौखिक परंपरा का हिस्सा है, यह लिखित ना होकर मौखिक परंपरा पर आधारित होता है ।

लोक को देखकर ही शास्त्रीय परंपरा के नियम बनते हैं लेकिन शास्त्र भी लोक को प्रभावित करता है । यह दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं ।

दर्शन, कला, संगीत चिंतन के आलोचनात्मक ग्रंथ सभी शास्त्र में निहित है । वास्तव में चिंतन के जितने भी पक्ष होते हैं और जहां भी उनमें से सैद्धान्तिक बखान होता है, वह शास्त्र कहलाता है ।


व्युत्पत्ति :

व्युत्पत्ति के अंतर्गत कला का ज्ञान भी अपरिहार्य है। कला को विद्वानों ने एक अलग क्षेत्र माना है । 64 प्रकार की कलाएं मानी गई है ।कला की स्थिति स्वायत्त होती है । यह लोकोत्तर होती है।


अभ्यास :

तीसरे काव्य हेतु के रूप में अभ्यास का नाम आता है । जैसे : कवि वृंद (वृंदावन) में भी लिखा है कि


“करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान
रसरी आवत जात सो सिल पर परत निशान”

आचार्य वामन ने कहा है-

” अभ्यासोहि कर्मसु कौशल भावहिती।”

आचार्य दंडी तो एकमात्र ऐसे आचार्य हैं, जिन्होंने अभ्यास को सर्वोपरि काव्य हेतु मना है ।

भामह और वामन ने भी प्रतिभा को विशेष महत्व दिया है।

राजशेखर ने प्रतिभा और व्युत्पत्ति को बराबर महत्व दिया है।

मम्मट और जगन्नाथ ने प्रतिभा को ही सर्वोपरि माना है।



Kavy Hetu । काव्य हेतु के संबंध में महत्वपूर्ण तथ्य


काव्य हेतु के संबंध में महत्वपूर्ण तथ्य इसप्रकार है :

हिंदी के पहले आचार्य जिन्होंने काव्य हेतु पर पहली बार विस्तार से उल्लेख किया है : वह कुलपति मिश्र है। प्रतिभा को विद्वानों ने शक्ति के रूप में भी विवेचित किया है।

आचार्य रूद्रट ने प्रतिभा को शक्ति कहा है । इन्होंने प्रतिभा के दो भेद किए हैं :

  • सहजा – जो जन्मजात होती है
  • उत्पाद्या – जो अध्ययन जन्य होती है।

इसी प्रकार राजशेखर ने भावयित्री और कारयित्री नामक प्रतिभा के दो भेद किए हैं।

  • कारयित्री – कवि की होती है।
  • भावयित्री – यह सहृदय की होती है और अध्ययन जन्य होती है।

इसी प्रकार राजशेखर ने कारयित्री प्रतिभा के भी तीन भेद किए हैं :

  1. सहजा
  2. आहार्य
  3. औपदेशिकी

इन भेदों के आधार पर राजशेखर ने कवियों की भी तीन श्रेणियां निर्धारित की है :

  1. सारस्वत
  2. उपदेशिक
  3. अभ्यासित

इस प्रकार बुद्धि के भी तीन प्रकार बताए हैं :

  1. स्मृति
  2. मति
  3. प्रज्ञा

इसी प्रकार पंडितराज जगन्नाथ एकमात्र काव्य हेतु प्रतिभा पर विशेष बल देते हैं । अतः यह प्रतिभावादी भी कहे जाते हैं।
इन्होंने कहा है :

“तस्य च कारणम् कविगता केवलाम् प्रतिभा “।

हिंदी आचार्यों में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने प्रतिभा को “अंतःकरण की उद्भभावित क्रिया” कहा है।

आनंद वर्धन ने प्रतिभा को “अपूर्व वस्तुओं के निर्माण में सक्षम” कहा है।

इन्होंने इस प्रकार लिखा है :

“शब्दार्थ शरीरं तावत्काव्यम।”



आचार्य वामन

इन्होंने काव्य हेतु शब्द के स्थान पर काव्यांग शब्द का प्रयोग किया है।

“लोको विद्या प्रकीर्णस्य काव्यांगनि”।

आचार्य मम्मट ने लिखा है :

“शक्ति निपुर्णता लोकशास्त्र काव्याद्य वेक्षणात,
काव्यज्ञ शिक्षयाभ्यास इति हेतुस्तदुभ्दभवे।”

व्युत्पत्ति का अर्थ :

व्युत्पत्ति का अर्थ है – बहुलता
इसमें लोक, शास्त्र एवं कला तीनों का समावेश हो जाता है ।

राजशेखर के अनुसार :

“उचितानुचित विवेको व्युत्पत्ति:” अर्थात उचित और अनुचित का विवेक ही व्युत्पत्ति है।

आचार्य अभिनव गुप्त के अनुसार :

“अपूर्व वस्तु निर्माण क्षमा प्रज्ञा ही प्रतिभा है।”

सहृदय या आलोचक को भारतीय काव्यशास्त्र में भावक भी कहते हैं ।

इस प्रकार तीनों काव्य हेतुओं में किसी ने एक को, किसी ने दो को, तो किसी ने तीनों काव्य हेतुओं को महत्व दिया है । वास्तव में तो इन तीनों का ही स्थान महत्वपूर्ण है । यह तीनों एक दूसरे के पूरक है । अपने आप में कोई पूर्ण नहीं है । एक के बिना दूसरा अधूरा है ।

इस प्रकार काव्य रचना में तीनों का महत्व है।


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