Aadikal | आदिकाल : हिंदी साहित्य का आरंभ


Aadikal | आदिकाल : हिंदी साहित्य का आरंभ – हिंदी साहित्य का आरंभ का प्रश्न हिंदी भाषा के विकास से संबंध है। आठवीं सदी में साहित्यिक अपभ्रंश से इतर बोलचाल की लोक भाषा अपभ्रंश में साहित्य रचना होने लगी थी।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उत्तर अपभ्रंश की रचनाओं को साहित्य की कोटि में न मानते हुए भी प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से हिंदी साहित्य का आविर्भाव माना है। इन्होनें अपभ्रंश को “प्राकृताभास हिंदी” की संज्ञा दी है।

अपभ्रंश किस बोलचाल की भाषा या लोक भाषा को विद्वानों ने उत्तरी या परवर्ती अपभ्रंश, पुरानी हिंदी या प्राकृतावास हिंदी कहा है। सर्वप्रथम चंद्रधर शर्मा गुलेरी जी ने 1921 में काशी नगरी प्रचारिणी पत्रिका में उत्तर अपभृंश को पुरानी हिंदी की संज्ञा दी।



Aadikal | आदिकाल : हिंदी का पहला कवि


Aadikal | आदिकाल : हिंदी का पहला कवि

  • शिव सिंह सेंगर ने 7 वीं शताब्दी के पुष्य या पुण्ड नामक कवि को हिंदी का प्रथम कवि माना है ।
  • राहुल सांस्कृत्यायन ने 7 वीं शताब्दी के सरहपाद को हिंदी का पहला कवि माना है।
  • गणपति चंद्रगुप्त ने “भरतेश्वर बाहुबली के रचयिता” शालिभद्र सूरी को हिंदी का पहला कवि माना है।

अतः सरहपाद को हिंदी का प्रथम कवि माना जा सकता है क्योंकि उनकी भावधारा सिद्धों और नाथों से होती हुई कबीर तक अपनी परम्परा बनाती है , साथ ही उनकी रचनाओं से हिंदी का आरंभिक रूप भी स्पष्ट होता है।


Aadikal Ke Namkaran | आदिकाल के नामकरण


Aadikal Ke Namkaran | आदिकाल के नामकरण : किस कवि ने आदिकाल को क्या नाम दिया ? निम्नानुसार देखा जा सकता है :

सं.कवि रचना
1ग्रिर्यसनसर्वप्रथम ग्रिर्यसन ने नामकरण किया है और
नाम दिया – चारण काल
2मिश्र बंधू आरंभिक काल
3गणपति चंद्र गुप्त प्रारम्भ काल / शुन्य काल
4महावीर प्रसाद द्विवेदी बीजवपन काल
5रामकुमार वर्मा संधि काल / चरण काल
6रामचंद्र शुक्ल वीरगाथा काल
7विश्वनाथ प्रसाद वीर काल
8डॉ बच्चन सिंह / वीरेंद्र वर्मा अपभृंश काल
9राहुल सांस्कृत्यायन सिद्धसामन्त काल
10हजारी प्रसाद द्विवेदी आदिकाल
11वसुदेव सिंह उद्भव काल
12कमलकुल श्रेष्ठ अन्धकार काल
13सुमन राजे आधार काल
14रमाशंकर शुक्ल रसाल जयकाव्य काल

वास्तव में “आदिकाल” नाम ही अधिक युक्तिसंगत है। क्योंकि इसमें हिंदी भाषा के आदि रूप और साहित्यिक प्रवृत्तियों के आदि रूपों का बोध होता है।

हिंदी साहित्य का आरंभ सिद्ध साहित्य से माना गया है । सरहपाद हिंदी के प्रथम कवि हैं।



वीरगाथा नामकरण :

रामचंद्र शुक्ल ने इन 12 रचनाओं के आधार पर वीरगाथा का नाम दिया है :

सं.रचना का नामरचनाकार
1खुमान रासोदलपति विजय
2विजयपाल रासोनल्ह सिंह
3बीसलदेव रासोनरपति नाल्ह
4परमाल रासोजगनिक
5पृथ्वीराज रासोचंदबरदाई
6हमीर रासोशारंगधर
7जय मयंक जस चंद्रिकामधुकर कवि
8जय चंद्र प्रकाशभट्टकेदार
9कीर्तिलताविद्यापति
10कीर्तिपताकाविद्यापति
11विद्यापति की पदावलीविद्यापति
12अमीर खुसरो की पहेलियांअमीर खुसरो

रामचंद्र शुक्ल ने इनमें से बीसलदेव रासो, विद्यापति की पदावली और अमीर खुसरो की पहेलियां इन हिंदी रचनाओं को छोड़कर शेष सभी ग्रंथों को भी रसात्मक माना है। इसलिए इन्होंने वीरगाथा काल का नाम दिया है।

आचार्य शुक्ल ने सिद्ध और नाथ साहित्य को धार्मिक संप्रदाय कोटि का बतलाकर इसे विश्व साहित्य से दूर कर दिया। यही कारण है कि शुक्ल जी ने सिद्ध नाथ साहित्य को हिंदी साहित्य के दायरे से बाहर कर दिया

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने चार रचनाओं की भाषा साहित्य का भ्रंश मानी है :

  • विजयपाल रासो
  • हमीर रासो
  • कीर्तिलता
  • कीर्तिपताका

शेष 8 रचनाये देशभाषा में रचित माना है।


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