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Prayogvad Aur Taar Saptak Kavi | प्रयोगवाद और तार सप्तक के कवि


नमस्कार दोस्तों ! आज हम “Prayogvad Aur Taar Saptak Kavi | प्रयोगवाद और तार सप्तक के कवि” के बारे में जानकारी देने जा रहे है। आपको बता दे कि प्रयोगवाद के प्रवर्तक अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन) है। प्रगतिवाद के बाद प्रयोगवाद आता है। लेकिन प्रयोगवाद आखिर क्यों आता है ? उसकी पृष्ठभूमि क्या है ? इसकी प्रमुख विशेषताएँ क्या है ? आदि के बारे में चर्चा करने जा रहे है :



Prayogvad | प्रयोगवाद आखिर क्यों आया ?


प्रगतिवाद के पास मार्क्सवादी दर्शन था, पर दर्शन की कट्टरता समाजवादी यथार्थवाद, वर्ग-संघर्ष में Proletariat (सर्वहारा) की विजय, प्रतिबद्धता और सामूहिकता के कारण उसके साहित्य में एकरसता आ गई थी। वैयक्तिकता के लिए कोई अवकाश न था और न ही कला समस्या के लिए कोई सरोकार। प्रगतिवाद के इन्हीं विचारधारात्मक दबावों ने प्रयोगवाद का मार्ग प्रशस्त कर दिया।


Prayogvad | प्रयोगवादी कविता की विशेषताएं


इसकी विशेषताएं निम्न है :

  • प्रयोगवादी कविता “कला, कला के लिए है” सिद्धांत का पालन करती हुई, कला मूल्य के सरोकारों पर विशेष बल देती है। तथा इसमें व्यष्टि चेतना पर विशेष बल दिया गया है।
  • प्रयोगवादी कवि नवीन भावान्भूति को संप्रेषित करने के लिए नये बिम्ब, नये प्रतीक, नये शब्द, नये उपमानों की तलाश करते हैं।
  • “कलंगी बाजरे की” कविता में अज्ञेय लिखते हैं, —

“देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच।
कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।। “

(हरी घास पर क्षण भर)

  • प्रयोगवादी कविता में Jean-Paul Sartre (ज्यां-पाल सार्त्र) के अस्तित्ववादी दर्शन का प्रभाव पड़ा है। इसमें क्षणवाद की अभिव्यक्ति मिलती है।
  • उन्मुक्त भोगवाद की अभिव्यक्ति दिखाई देती है तथा साथ ही पीड़ा, संत्रास, घुटन, दु:ख की अभिव्यक्ति भी देखने को मिलती है।
  • प्रयोगवादी कविता में राष्ट्रीय चेतना एवं जनजीवन से संपर्क का अभाव है।

साँप तुम सभ्य तो हुए नहीं, न होंगे।
नगर में बसना भी तुम्हें न आया।।”
(अज्ञेय)

प्रयोगवाद का प्रारंभ सन 1943 में अज्ञेय द्वारा संपादित “तार सप्तक” से माना जा सकता है।
अज्ञेय ने तार सप्तक के कवियों को “नई राहों के अन्वेषी” कहा है।

  • अज्ञेय के संपादन में प्रतीक पत्रिका का प्रकाशन हुआ। 1951 ईस्वी में दूसरे सप्तक का प्रकाशन हुआ। उसके बाद तीसरा सप्तक
  • हिंदी साहित्य की सबसे आधुनिकतम विचारधारा प्रयोगवाद है। दूसरा सप्तक की भूमिका में अज्ञेय ने नंददुलारे वाजपेई की अवधारणा का खंडन करते हुए कहा, —

प्रयोग अपने आप में ईष्ट नहीं है, बल्कि वह सत्य को जानने का दोहरा साधन है।”

  • 1946 में अज्ञेय ने प्रतीक का प्रकाशन किया जिससे प्रयोगवाद को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। 1952 ईस्वी में अज्ञेय ने ‘पटना रेडियो’ में “नयी कविता” नाम की घोषणा की।

ध्यान रहे कि प्रगतिवाद नाम मुक्तिबोध ने दिया जबकि प्रयोगवाद नाम नंददुलारे वाजपेई ने दिया
एवं “नयी कविता” का नामकरण अज्ञेय द्वारा किया हुआ है।



Prayogvad | प्रयोगवाद किन बिंदुओं पर प्रगतिवाद से अलग है ?


हम निम्न बिंदुओं के आधार पर प्रयोगवाद और प्रगतिवाद के अंतर को समझ सकते है :

  • प्रगतिवाद समाजवादी विचारधारा की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है; जबकि प्रयोगवाद का वैचारिक धरातल है : बौद्धिक व्यक्तिवाद
  • प्रयोगवाद यथार्थवाद को लेकर चलता है लेकिन समाजवादी यथार्थवाद के प्रति उन्मुख नहीं है।
  • प्रगतिवाद शोषित पीड़ित मानवता की मुक्ति की बात करता है। यह सर्वहारा वर्ग को साथ लेकर चलने वाला राजनीतिक जागरण का आंदोलन है। जबकि प्रयोगवाद शहर केंद्रित मध्यवर्ग का आंदोलन है।
  • प्रगतिवाद रूप और संवेदना में कोई अंतर नहीं मानता। प्रगतिवाद की स्पष्ट समझ है कि कथ्य के दबाव में भाषा शिल्प स्वयं आकार लेते हैं। इनकी सत्ता काव्य से अलग नहीं है। जबकि प्रयोगवाद कथ्य, शिल्प, भाषा तीनों में नवीनता के लिए प्रयोग को आवश्यक मानता है।
  • ये प्रगतिवाद सौंदर्य की वस्तुगत सत्ता को स्वीकारते हुए प्रकृति के उपयोगितामूलक सौंदर्य को प्रमुखता देते हैं। जबकि प्रयोगवाद प्रकृति में आधुनिक जीवन की विडम्बनाओं, तनावों और दूरभि संधियों को रुपायित करते हैं।
  • शमशेर बहादुर के शब्दों में, —

” एक पीली शाम
पतझड़ का जरा अटका हुआ पत्ता
वह अटका हुआ आँसू
अब गिरा तब गिरा
सांध्य तारक सा अतल में।”

  • प्रगतिवाद में नारी प्रेम तन और मन दोनों की सहभागिता की अपेक्षा रखता है। प्रयोगवाद में या तो कवि रूमानियत भाव का विरोधी होने का दावा करता है या फिर वासना की विकलता के कारण “कहाँ हो नारी..!” की पुकार मचाने लगता है।
  • प्रयोगवादी कविता यद्यपि राष्ट्रवाद का विरोध राष्ट्रवाद का विरोध नहीं करती तथापि प्रयोगवाद में राष्ट्रवाद की उतनी अभिव्यक्ति नहीं हो सकी है, जितनी प्रगतिवाद में।
  • प्रगतिवाद विचारधारा को लेकर इतने उत्साह में है कि वह अनभोगे यथार्थ को भी रूपायित करने में नहीं हिचकते। जबकि प्रयोगवाद आम आदमी की जटिलता को सच्ची अनुभूति के साथ पकड़ता है।
  • प्रगतिवाद ने कला मूल्यों को प्राथमिकता नहीं दी है। जबकि प्रयोगवाद में कला मूल्य सर्वोपरि है।

Taar Saptak Ke Kavi | तार सप्तक के प्रमुख कवि


आज हम कुछ प्रमुख Taar Saptak Ke Kavi | तार सप्तक के कवियों और उनकी रचनाओं का जिक्र करने जा रहे है। जो निम्नानुसार है :

  1. अज्ञेय
  2. गिरिजा कुमार माथुर
  3. भारत भूषण अग्रवाल
  4. नेमी चंद्र जैन
  5. प्रभाकर माचवे
  6. रामविलास शर्मा
  7. गजानन माधव मुक्तिबोध

1. Agyeya | अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्‍स्‍यायन)

अज्ञेय ही प्रयोगवाद के प्रवर्तक हैं। इनका जन्म 1911 ईस्वी में हुआ। ये सृजनात्मकता की अद्वितीयता व विशिष्टता के कवि हैं। ये निजता की सुरक्षा के कवि हैं। अज्ञेय को “कठिन गद्य का प्रेत” माना जाता है।

अज्ञेय की प्रमुख रचनाएँ :

सं.कविता संग्रहवर्ष
01.भग्नदूत1933
02.चिन्ता1942
03.इत्यलम्1946
04.हरी घास पर क्षण भर1949
05.बावरा अहेरी1954
06. इंद्रधनुष रौंदे हुए1957
07.अरी ओ करुणा प्रभामय1959
08.आंगन के पार द्वार1961
09.कितनी नावों में कितनी बार1967
10.क्योंकि मैं उसे जानता हूँ1970
11.सागर मुद्रा1970
12.पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ1973
13.महावृक्ष के नीचे1977
14.नदी की बाँक पर छाया1981
  • “नदी के द्वीप” कविता “हरी घास पर क्षण भर” काव्य संग्रह में संकलित है। जिसे अज्ञेय का मूल दर्शन कहा जाता है। “कतकी पूनों” और “कलंगी बाजरे की” इसी में संकलित है।
  • “बावरा अहेरी” में बावरा अहेरी सूर्य का प्रतीक है। “यह द्वीप अकेला” भी बावरा अहेरी में संकलित है।
  • “इंद्रधनुष रौंदे हुए” में संकलित है :
  1. “जितना तुम्हारा सच है”
  2. “सांप”
  3. “आखेटक”
  4. “इतिहास की हवा”
  5. “हवाई यात्रा”
  6. “ऊंची उड़ान”
  7. “नयी कविता : एक संभाव्य भूमिका”
  • “कितनी नावों में कितनी बार” काव्य संग्रह को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला है।
  • “आंगन के पार द्वार” को 1964 ईस्वी में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है। इस रचना में जैन और बौद्ध दर्शन का चरमोत्कर्ष दिखता है।यह तीन खंडों में है :
  1. अन्त: सलिला
  2. चक्रांत शिला
  3. असाध्य वीणा
  • “कन्हाई ने प्यार किया” शीर्षक कविता “सागर मुद्रा” में संकलित है।
  • अज्ञेय ने “Prison days and other poems| प्रिजन डेज एंड अदर पोयम्स” – 1946 अंग्रेजी में लिखी।


2. Girija Kumar Mathur | गिरिजा कुमार माथुर

गिरिजा कुमार माथुर रोमानी ढंग के कवि हैं। रामविलास शर्मा के अनुसार इनका किशोर मन न वयस्क होता है, न प्रौढ़।

गिरिजा कुमार माथुर की प्रमुख रचनाएँ :

सं.काव्य संग्रहवर्ष
01.मंजीर – प्रथम संग्रह1941
02.नाश और निर्माण1946
03.धूप के धान1955
04.शिलापंख चमकीले1961
05.भीतरी नदी की यात्रा1975

अन्य संग्रह :

  1. छाया मत छूना मन
  2. साक्षी रहे वर्तमान
  3. कल्पान्तर
  4. मैं वक्त के हूँ सामने
  5. मुझे और अभी कहना है

प्रबंध रचना :

  1. पृथ्वीकल्प
  • “मैं वक्त के हूँ सामने” को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है।

3. Bharat Bhushan Agarwal | भारत भूषण अग्रवाल

इनका प्रमुख काव्य संग्रह इस प्रकार है :

  1. अनुपस्थित लोग
  2. कागज के फूल
  3. छवि के बंधन
  4. मुक्तिमार्ग
  5. जागते रहो
  6. ओ अप्रस्तुत मन
  7. उतना वह सूरज है।

प्रबंध रचना :

  1. अग्निलीक – सीता की अग्नि परीक्षा पर आधारित

4. Nemi Chandra Jain | नेमिचन्द्र जैन

नेमिचन्द्र जैन नटरंग पत्रिका के संपादक रहे हैं। ये “अधूरे साक्षात्कार” आलोचना कृति के रचनाकार हैं। इसमें 18 हिंदी उपन्यासों की आलोचना है।

इनका प्रमुख काव्य संग्रह इस प्रकार है :

  1. एकांत
  2. अचानक हम फिर

5. Prabhakar Machwe | प्रभाकर माचवे

इनका प्रमुख काव्य संग्रह इस प्रकार है :

  1. स्वप्न भंग
  2. मेपल
  3. क्षणभंगुर
  • इनका व्यंग्य निबंध “खरगोश के सींग” प्रसिद्ध है।


6. Ram Vilas Sharma | रामविलास शर्मा

इनका प्रमुख काव्य संग्रह इस प्रकार है :

  1. रूप तरंग

7. Gajanan Madhav Muktibodh | गजानन माधव मुक्तिबोध

इनका प्रमुख काव्य संग्रह इस प्रकार है :

  1. चाँद का मुँह टेढ़ा है – 1946
  2. भूरी-भूरी खाक धूल – 1980

  • तार सप्तक के कवियों में रामविलास शर्मा और मुक्तिबोध को छोड़कर शेष सभी प्रयोगवादी हैं।
  • दूसरे सप्तक में शमशेर प्रयोगवादी कवि हैं एवं शेष सभी “नयी कविता” के कवि हैं।
  • तीसरे सप्तक के सभी कवि “नयी कविता” के हैं।
  • चौथे सप्तक के कवि समकालीन कविता में माने जाएंगे।

इसप्रकार दोस्तों ! आज आपने “Prayogvad Aur Taar Saptak Kavi | प्रयोगवाद और तार सप्तक के प्रमुख कवियों एवं उनकी रचनाओं” के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की। उम्मीद करते है कि आपको आसानी से समझ आया होगा।


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एक गुजारिश :

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