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Parayi Pyas Ka Safar | परायी प्यास का सफर – आलम शाह खान


नमस्कार दोस्तों ! आज हम हिंदी साहित्य की एक महत्वपूर्ण कहानी से रूबरू होने जा रहे है। आज आप आलमशाह खान द्वारा रचित बहुत ही चर्चित कहानी के बारे में जानेंगे। इस कहानी का नाम है : Parayi Pyas Ka Safar | परायी प्यास का सफर। बाल श्रम और शोषण पर आधारित इस कहानी का मर्म विचारणीय है। तो चलिए इसे समझते है :



Alam Shah Khan | आलम शाह खान : कहानीParayi Pyas Ka Safar | परायी प्यास का सफर” आलम शाह खान द्वारा रचित है। आलम शाह का जन्म 31 मार्च, 1936 को उदयपुर, राजस्थान में हुआ और इनकी मृत्यु 17 मई, 2003 को हुई थी।

इनके पांच कथा संग्रह प्रकाशित हुए। पहला कथा संग्रह “परायी प्यास का सफर” नाम से था। जिसमें यह कहानी भी संकलित है। इसके अतिरिक्त भी आलम शाह खान के अन्य कहानी संग्रह है, जो इसप्रकार से है :

  1. किराये की कोख
  2. एक और सीता
  3. एक गधे की जन्म कुंडली
  4. सांसों का रेवड़

इनकी सभी कहानियों का संग्रह “कथा यात्रा” नाम से है। “परायी प्यास का सफर” कहानी का प्रथम प्रकाशन 1979 में हुआ। सारिका पत्रिका में भी यह कहानी प्रकाशित हो चुकी है। इस कहानी को संवाद शैली में लिखा गया है और इसकी भाषा पात्रों के अनुकूल है।

यह कहानी बाल श्रम और उनके शोषण पर आधारित है। इस कहानी के माध्यम से निम्न वर्ग व मध्यम वर्ग की आर्थिक विषमता का चित्रण किया गया है। साथ ही पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों की शोषित स्थिति का मार्मिक चित्रण भी किया गया है।

इस कहानी में लेखक की बाल मनोविज्ञान पर कितनी पकड़ है, यह भी समझने मैं आसानी होगी। लेखक ने बच्चों के मन का विश्लेषण बहुत ही सटीक और सुलझे तरीके से किया है।


Parayi Pyas Ka Safar | परायी प्यास का सफर – कहानी


दोस्तों ! अब हम आलमशाह की चर्चित कहानी Parayi Pyas Ka Safar | परायी प्यास का सफर के बारे में जानते है :

आपने कभी रेस्टोरेंट/रेस्तराँ या ढाबे में खाना खाया होगा। वहां कुछ छोटे-छोटे बच्चे होते हैं, जो वहां काम करते हैं और ग्राहकों के आर्डर लेते नजर आते हैं। जिस उम्र में बच्चों को अच्छी शिक्षा पाने के लिए स्कूल भेजा जाता है, वहीं दूसरी तरफ बच्चों को ढाबे पर ग्राहकों के अपशब्द सुनने पड़ते हैं।

खिलौनों से खेलने की उम्र में इन बच्चों के बीड़ी, सिगरेट के दुर्व्यसन, इनकी जिंदगी के साथ खेल जाता है। माता-पिता का वात्सल्य पाने की उम्र में इन बच्चों को मालिकों की गालियां खानी पड़ती है।

जब भी हम किसीरेस्टोरेंट/रेस्तराँ में जाते हैं तो हम भी इन बच्चों को दस-दस चक्कर कटवाने से बाज नहीं आते। हमें लगता है कि कुछ देर खाना खाने के बदले हमने उन्हें खरीद लिया है। पर वास्तव में बिका हुआ कौन है ? वह बच्चे या हमारी मानवता है ? विचार करते हैं, इस प्रश्न पर और शुरू करते हैं आलम शाह द्वारा रचित कहानी :



Parayi Pyas Ka Safar | परायी प्यास का सफर – कहानी का प्रारम्भ :

दोस्तों ! कहानी कुछ यूं शुरू होती है कि एक स्त्री का पति उसे छोड़कर किसी दूसरी औरत को भगा ले जाता है। वह परित्यक्ता स्त्री दर-दर भटकती नज़र आती है। और फिर वह अपने बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए एक अन्य पुरुष से विवाह कर लेती है। लेकिन वह पुरुष अपने वचन से मुकर जाता है और उस स्त्री के बच्चों की जिम्मेदारी उठाने से मना कर देता है।

यही नहीं वह उस “लखना” नाम के बच्चे को किसी रेस्टोरेंट मालिक के पास काम करने के लिए छोड़ देता है। लखना नाम का 12 वर्षीय छोटा सा बच्चा सुबह से शाम तक ग्राहकों से आर्डर लेता है, उनकी गालियां सुनता है ।

और ग्राहकों के लिए बीड़ी सिगरेट तक खरीद कर ला कर देता है। रेस्टोरेंट में आने वाले परिपक्व लोगों की बातें उसके नन्हे कानों में पड़ती है, जो उसे समय से पहले ही परिपक्व बना देती है।

वह बीड़ी पीना तक सीख जाता है। यही नहीं ग्राहक उसे बेवजह बार-बार सुबह से शाम तक सैकड़ों बार सीढ़ियां चढ़ाते और उतराते है। उसकी सांस फूल जाती है ताकि ऊपर मंजिल पर बैठे ग्राहकों तक खाना पहुंच जाए।

कहानी से कुछ पंक्तियां :

लखना की ड्यूटी इसी ऊपर केबिन में थी।
ऊपर से आर्डर लेकर वह नीचे उतरता और सामान लेकर ऊपर टेबलों पर रखता।
काम तो इतना ही था, पर उसे सुबह से शाम
और शाम से रात भीगने के समय तक चढ़-उतर लगी रहती।”

Parayi Pyas Ka Safar | परायी प्यास का सफर – कहानी का मध्य :

लखना केवल अकेला ही नहीं है। लखना की तरह ही रेस्टोरेंट में एक और बच्चा है, जिसका नाम ‘बडके’ है। बडके को भी उसके पिता ने रेस्टोरेंट में काम पर रखा है। यह दोनों ही पात्र, यह दोनों बच्चे अपने पिता के तिरस्कारो एवं रेस्टोरेंट मालिक के अत्याचारों से पीड़ित है।

हाडतोड़ परिश्रम करने के बाद इन्हें जो भी तनख्वाह मिलती हैं, उसे इनके पिता हड़प कर ले जाते हैं। रेस्टोरेंट में सुबह-शाम खुद का खाना खुद बनाकर खाते हैं। कितनी विडम्बना की बात है ना कि रेस्टोरेंट में इतना खाना बनता है। यह खाना बच्चे दूसरों को परोसते हैं लेकिन खुद भूखे रह जाते हैं।

एक बार उन्हें तनख्वाह मिलती है । दोनों बच्चे सोचते है कि कल उनके पिता तनख्वाह ले ही जाएंगे, तो क्यों ना कहीं बाहर जाकर कुछ खाया जाये और पिताजी से झूठ कह देंगे।

और फिर दोनों एक रेस्टोरेंट में खाना खाने चले जाते हैं । वहां पर एक बच्चा उनसे आर्डर लेने आता है। वे दोनों भी उसके साथ वह वैसा ही कठोर व्यवहार करते हैं, जैसा उनके ग्राहक उनके साथ करते हैं। वह बोलता है :

कहानी से कुछ पंक्तियां :

ऐ छोकरे……।
बोल……..। ”
उसके सामने उसकी उम्र का एक लड़का खड़ा था। उसे लगा जैसे वह अपने आप से बात कर रहा है।
खाने में क्या है ?” उसकी आवाज में ठसक थी।”

Parayi Pyas Ka Safar | परायी प्यास का सफर – कहानी का अंत :

खाना खाकर वापस आने के बाद दोनों जब सोने लगते हैं तो उन्हें अहसास होता है कि भोजन में अत्यधिक मिर्ची थी । पानी पीने की अत्यधिक आवश्यकता है। दोनों पूरे दिन के अत्यधिक थके हुए हैं। अब उनमें उठकर पानी पीने की बिल्कुल हिम्मत नहीं है।

लखना चाहता है कि मुझे उठना ना पड़े और बडके उठकर पानी ले आए। बडके भी यही चाहता है कि मुझे उठना ना पड़े और लखना उठ कर पानी ले आए । इस बात पर दोनों झगड़ भी पड़ते हैं, लेकिन कोई उठकर नहीं जाता। दोनों प्यासे पड़े रहते हैं।

कहानी से कुछ पंक्तियां :

ऐसे –
प्यास तो मुझे भी सता रही है। हलक में काँटे से अड रहे हैं।
तो फिर खुद पी और लेता भी आना एक गिलास।”
“यार अपने में तो सकत नहीं। तू कर ना हिम्मत।”

तभी अचानक लखना को रेस्टोरेंट मालिक आवाज लगाता है। लखना बिजली की गति से उठकर मालिक के सामने हाजिर हो जाता है। मालिक कहता है कि मुझे पानी लाकर पिलाओ, अभी के अभी।

लखना तुरंत मालिक को पानी देता है और खुद पानी पीना भूल जाता है । और फिर वापस आकर लेट जाता है। बडके उससे पूछता है, —

“तुम उठ कर गये, न तो तुमने खुद पानी पिया,
ना तुम मेरे लिए पानी लाये। क्यों तुझे प्यास नहीं लगी?”

तो लखना उसे उत्तर देता है, —

प्यासा तो मैं अब भी हूँ, पर आर्डर सेठ का था तो उसे पिला दिया,
मुझे पानी पीने की याद ही नहीं रही।
रोज ऑर्डर देने वाला ही खाता-पीता है ना।”

इसी वाक्य पर यह कहानी खत्म होती है।



Parayi Pyas Ka Safar | परायी प्यास का सफर – कहानी से सीख :

और हमें भी हमारे प्रश्न का उत्तर मिल जाता है कि वह बच्चे बिके हुए नहीं है। असल में तो हमारी संवेदनाएँ ही बिकी हुई है। इस कहानी को पढ़कर पाठक बहुत कुछ सीखता है कि कैसे एक बच्चे का बाल-श्रम, बाल-मजदूरी उसका बचपन खराब कर देती है।

बाल मनोविज्ञान पर आधारित यह कहानी मध्यम और निम्न वर्ग की आर्थिक विषमता का भी चित्रण करती है। साथ हीबच्चे की कोमल भावनाओं का हृदय विदारक चित्रण करती है।

और हमें यह भी सीख बताती है कि ग्रामीण जीवन की आर्थिक कठिनाइयों के बीच जीवनयापन करने की विवशता कैसे इन बच्चों का बचपन खराब कर देती है। दोस्तों ! उम्मीद है कि यह कहानी पढ़ने के पश्चात हम सब भी अपनी मानवता को पुनः जागृत करेंगे । इसे किसी भी कीमत पर मिटने नहीं देंगे।

इसप्रकार Parayi Pyas Ka Safar | परायी प्यास का सफर पूरा होता है। उम्मीद है कि आपको ये कहानी और इसके अंदर छुपा मर्म अच्छे से समझ आ गया होगा।

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एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Parayi Pyas Ka Safar | परायी प्यास का सफर – आलम शाह खान के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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