Contents

Kavy Prayojan | काव्य प्रयोजन | काव्यशास्त्र


Kavy Prayojan | काव्य प्रयोजन : काव्य प्रयोजन के अन्तर्गत हम निम्न का अध्ययन करते है –

  • काव्य के उद्देश्य
  • काव्य के लक्ष्य
  • इसके (काव्य के) साध्य
  • काव्य के महत्व और
  • काव्य की उपयोगिता

किसी भी कृति का कोई ना कोई प्रयोजन अवश्य होता है। निरुद्देश्य रचना संभव नहीं है। संस्कृत समीक्षा शास्त्री भी ग्रंथ लिखते समय काव्य प्रयोजन पर विचार व्यक्त करते थे।

सर्वप्रथम आचार्य भरतमुनि ने नाटक के संदर्भ में काव्य प्रयोजन पर विचार करते हुए काव्य का प्रयोजन आनंद बतलाया है।

यह आनंद भौतिक सुखवाद से भिन्न है। यहां आनंद दार्शनिक संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है जिसका मूल नैतिकता में है।

आनंदवाद की दशा में पाठक सुख-दुख, राग- द्वैष, ममत्व-परत्व आदि सभी से ऊपर उठ जाता है। वह स्थान व देश काल की बाधाओं से मुक्त हो जाता है। संस्कृत समीक्षाशास्त्र में आनंद की यही प्रकृति बतलाई गई है। नाटक या काव्य के माध्यम से यह आनंद सहृदय को प्राप्त होता है।



Kavy Prayojan | काव्य प्रयोजन की समीक्षा


काव्य प्रयोजन की समीक्षा : हम यहां विभिन्न आचार्यों द्वारा निर्दिष्ट काव्य प्रयोजन की समीक्षा करेंगे :

भरत मुनि

नाट्यशास्त्र के रचयिता भरतमुनि ने काव्य प्रयोजन पर इस प्रकार लिखा है :

“धर्मयं यशस्यं आयुष्यं हितं बुद्धि: विवर्धनम्।
लोको उपदेश जननम् नाट्यमेतद भविष्यति।।

अर्थात- धर्म ,यश, आयुष ,हित, बुद्धि, वृद्धि, लोकोपदेश, दक्षता, चरमविश्रांति आनंद को काव्य प्रयोजन माना है।


भामह

भामह ने पहली बार चतुवर्ग प्रयोजन (धर्म ,अर्थ, काम, मोक्ष) की बात की है। इन्होंने धर्म अर्थ काम मोक्ष के साथ कीर्ति व प्रीति (आनंद) तथा विचक्षणता को काव्य का प्रयोजन बतलाया है।

” धर्मार्थ काम मोक्षेषु वैचक्षण्यं कलासु च। करोति कीर्ति प्रीति च साधुकाव्य निबंधनम्।।


Kavy Prayojan | काव्य प्रयोजन के प्रकार


Kavy Prayojan (काव्य प्रयोजन) के प्रकार : शास्त्रों में तीन प्रकार का प्रयोजन बतलाया गया है :

प्रभु सम्मित उद्देश्य

यह शब्द प्रधान होता है । इसमें अर्थ परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं होती। शब्द में हेरफेर नहीं हो सकता । जैसे : कुरान और बाइबिल इसके उदाहरण हैं।

इसमें ईश्वर प्रदत्त बातें ज्यों कि त्यों चलती रहती है। मौलिक अर्थ की यहां कोई संभावना नहीं है। प्रभु सम्मित उद्देश्य एक प्रकार से रूढी को जन्म देता है।


सुहृत सम्मित उद्देश्य

यह अर्थ प्रधान है। जैसे – पुराणों में बातें तो वहीं कई गई है लेकिन कहानी के माध्यम से कही गई है। अतः यहां व्याख्या की गुंजाइश होती है।


कांता सम्मित उद्देश्य

यह न तो शब्द प्रधान है, न हीं अर्थ प्रधान, यह तो रस प्रधान है। कांता से तात्पर्य है – स्त्री

जैसा कि आप जानते हैं कि जिस प्रकार स्त्री अपनी लावण्यता एवं सौंदर्य से अपना प्रभाव स्थापित करती है और बिना आज्ञा अथवा उपदेश दिए अपनी बातों को पूर्ण कराने में सक्षम होती है उसी प्रकार काव्य का रस सहृदय को को सम्मोहित कर लेता है। काव्य का प्रयोजन ऐसा ही प्रयोजन है।

कांता सम्मित उद्देश्य में पाठक सब कुछ भूलकर काव्य रस में तल्लीन हो जाता है। यहां कोई उपदेश नहीं दिया जा रहा होता। फिर भी अर्थ की अनेक छवियों को व्यक्त करता है। इसमें आसानी से बतलाया जाता है कि नैतिकता क्या है और अनैतिकता क्या है ? पाठक रस के द्वारा नैतिकता की तरफ उन्मुख होता है।

नैतिकता में यथार्थवाद एवं प्रकृतवाद नहीं होता है। अतः संस्कृत समीक्षाशास्त्रियों ने ट्रेजडी, यथार्थ एवं प्रकृतवाद का उल्लेख नहीं किया है।

संस्कृत काव्यशास्त्र में काव्य का प्रयोजन जीवन की आलोचना नहीं है बल्कि आनंद, कीर्ति, प्रीति व कांता सम्मित उद्देश्य पर बल दिया गया है ।

ध्यान रहे कि कांता सम्मित में पाठक स्वायत्त होता है और अपने अनुरूप अर्थ को ग्रहण करता है।



Kavy Prayojan | काव्य प्रयोजन के संबंध में विभिन्न मत


Kavy Prayojan (काव्य प्रयोजन) के संबंध में विभिन्न मत : Kavy Prayojan (काव्य प्रयोजन) के संबंध में विभिन्न विद्वानों ने जो विभिन्न प्रकार के मत दिए है वो इसप्रकार है –

आचार्य मम्मट

आचार्य मम्मट ने कुल 6 काव्य प्रयोजन माने हैं :

  • यश की प्राप्ति
  • अर्थ की प्राप्ति
  • व्यावहारिक ज्ञान की प्राप्ति
  • शिवेत्तर अनिष्ट का नाश
  • सद्य: पवरनिवृत्ति (ब्रह्मानंद सहोदर आनंद की प्राप्ति )
  • कांता सम्मित उद्देश्य

“काव्यं यश से अर्थकृते व्यवहार विदे शिवेतरक्षयते।
सद्य: परिनिर्वृत्तये कांता सम्मित तयोपदेशयुजे ।।”

अर्थात-काव्य यश के लिए, अर्थ( धन) की प्राप्ति के लिए, व्यावहारिक ज्ञान के लिए, अमंगल के नाश के लिए, और अलौकिक आनंद की प्राप्ति के लिए व कांता के समान प्रिय व मधुर उपदेश प्राप्ति के लिए प्रयोजनीय है।


आचार्य वामन

आचार्य वामन ने दृष्ट -अदृष्ट को भी काव्य का प्रयोजन माना है।.इसके साथ ही आचार्य वामन ने कीर्ति और प्रीति को मुख्य काव्य प्रयोजन माना है।

“काव्य सदृष्टा दृष्टांर्थ प्रीति कीर्ति हेतुत्वात ।”


आचार्य रामचंद्र शुक्ल

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने काव्य प्रयोजन को इस प्रकार विवेचित किया है कि –

” कविता का अंतिम लक्ष्य जगत के मार्मिक पक्षों का प्रत्यक्षीकरण करके उनके साथ मनुष्य हृदय का सामंजस्य स्थापन है।”


डॉ नगेंद्र

डॉ नगेंद्र के अनुसार – काव्य का प्रयोजन – आत्माभिव्यक्ति है।



नंददुलारे वाजपेई

नंददुलारे वाजपेई के अनुसार काव्य का प्रयोजन – आत्मानुभूति है।


महावीर प्रसाद द्विवेदी

महावीर प्रसाद द्विवेदी के अनुसार काव्य का प्रयोजन – उपयोगितावाद है।


मैथिलीशरण गुप्त

गुप्तजी भी केवल मनोरंजन को ही काव्य का प्रयोजन नहीं मानते हैं। वे लिखते हैं –

“केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए, उसमें उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।”

“मानते हैं जो कला को कला के अर्थ ही, स्वार्थिनी करते कला को व्यर्थ ही।”


गोस्वामी तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास का काव्य प्रयोजन – लोकमंगल की भावना है।

“कीरति भनिति भूति भल सोई । सुरसुरी सम सबकह हित होई।।”


बिहारी सतसई

इसी प्रकार मैं आपको और बता दूं कि बिहारी सतसई का काव्य प्रयोजन – अर्थ की प्राप्ति है।


पद्मावत

पद्मावत का काव्य प्रयोजन – यश की प्राप्ति है।


जायसी

जायसी लिखते हैं-

“कोई ना जगत जस बेचा कोई न लीन्हा जस मोल। जो यह पढ़ै कहानी हम सँवंंरे दुह बोल।।”


कुलपति मिश्र

कुलपति मिश्र -यह पहले आचार्य हैं जिन्होंने विस्तार से काव्य प्रयोजन का जिक्र किया है।

“जस संपत्ति आनंद अति दूरितन डारे सोई । होत कवित्त ते चतुरई जगत राम बस होई।”


आचार्य भोजराज

भोजराज ने भी कीर्ति और प्रीति को काव्य का प्रयोजन स्वीकार किया है।


आचार्य दंडी

दंडी ने धर्म, कीर्ति, अनर्थोपशम, अर्थ और सुख उपलब्धि को काव्य का प्रयोजन माना है।


आनंद वर्धन

आनंद वर्धन ने विनेयन्मुखीकरण एवं प्रीति को काव्य का प्रयोजन माना है।


आचार्य महिम भट्ट

महिम भट्ट ने रसमय सदुपदेश एवं परम आह्लाद को काव्य का प्रयोजन माना है।


आचार्य अभिनव गुप्त

अभिनव गुप्त ने काव्य के प्रयोजन में कांता सम्मित उपदेश, यश की प्राप्ति, परमानंद की प्राप्ति एवं चतुर वर्ग फल प्राप्ति को गिनाया है।

इस प्रकार निष्कर्ष यह है कि काव्य का प्रयोजन आनंद प्राप्ति है। जिसे रस की अनुभूति से प्राप्त किया जा सकता है।
यश, अर्थ, व्यवहार ज्ञान, लोकोपदेश व अमंगल का विनाश भी काव्य का प्रयोजन है।

दोस्तों ! हिंदी साहित्य से जुड़ी उपयोगी सामग्री यहां उपलब्ध कराई जाती है जो आपके लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में उपयोगी सिद्ध होगी।
हम आपके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं।


ये भी अच्छे से जाने :


एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको “काव्य प्रयोजन” के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

नोट्स अच्छे लगे हो तो अपने दोस्तों को सोशल मीडिया पर शेयर करना न भूले I नोट्स पढ़ने और हमारी वेबसाइट पर बने रहने के लिए आपका धन्यवाद..!


Leave a Comment

error: Content is protected !!
Ads Blocker Image Powered by Code Help Pro

Ads Blocker Detected!!!

We have detected that you are using extensions to block ads. Please support us by disabling these ads blocker.

Powered By
Best Wordpress Adblock Detecting Plugin | CHP Adblock