Contents

Bihari Ratnakar Vyakhya बिहारी रत्नाकर के दोहे (19-25) व्याख्या


Bihari Ratnakar Ke Dohe Vyakhya Saar by Jagannath Das Ratnakar in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! आज हम श्री जगन्नाथदास रत्नाकर रचित “बिहारी-रत्नाकर” के अगले 19-25 दोहों की व्याख्या करने जा रहे है। आइए विस्तार से समझते है :

श्री जगन्नाथदास रत्नाकर रचित “बिहारी-रत्नाकर” के दोहों का विस्तृत अध्ययन करने के लिये आप
नीचे दी गयी पुस्तकों को खरीद सकते है। ये आपके लिए उपयोगी पुस्तके है। तो अभी Shop Now कीजिये :


Bihari Ratnakar Vyakhya बिहारी रत्नाकर के दोहों (19-21) की व्याख्या


Jagannath Das Ratnakar Krit Bihari Ratnakar Ke Dohe 19-21 Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! बिहारी रत्नाकर के 19-21 दोहों की व्याख्या इसप्रकार है :

दोहा : 19.

लग्यो सुमनु ह्वै है सफलु आतप-रोसु निवारि।
बारी बारी आपनी सींचि सुहृदता बारि।।19.।।

व्याख्या :

दोस्तों ! इस पद में नायक अपनी नायिका से मिलने एक वाटिका (बगिया) में आने वाला है। नायक को आने में देरी हो गई है और नायिका क्रोधित है, क्योंकि नायक समय से मिलने नहीं आया। ऐसी स्थिति में नायक जानता है कि नायिका क्रोधित है।

वह नायिका की अंतरंग सखी के माध्यम से एक संदेश नायिका के पास भेजता है और नायिका की सखी नायिका को इस दोहे के माध्यम से समझाती है और कहती है कि हे बालिका ! तेरी वाटिका में जो प्रेम के पुष्प लगे हुये हैं, वे किसी न किसी दिन अवश्य ही फलित होंगे, इसलिए तुझे अपनी वाटिका को क्रोध की धूप से दूर रखना होगा और सहृदयता अर्थात् प्रेमपूर्ण मित्रता के जल से सिंचित करना होगा। इस पद में श्लेष, रूपक और यमक अलंकार का कवि ने सुंदर प्रयोग किया है।

दोहा : 20.

अजौ तरयौना ही रह्यौ श्रुति सेवत इक-रंग।
नाम बास बेसरि लह्यौ बसि मुकुतनु के संग।।20.।।

व्याख्या :

दोस्तों ! कवि कहते हैं कि वे वेदपाठी व्यक्ति, जो एकनिष्ठ भाव से वेदों का अध्ययन करते रहे, लेकिन फिर भी वह संसार सागर से पार नहीं उतर सके। जिस प्रकार तरयौना (कान का आभूषण) निरंतर कान की सेवा करता है तो वह कान तक ही सीमित रहा, उसी प्रकार वेद शास्त्रों का अध्ययन करने वाला व्यक्ति निरंतर वेद शास्त्रों का अध्ययन में लगा रहा। लेकिन फिर भी वह संसार सागर से पार नहीं उतर सके।

बेसरि, जो नाक का आभूषण है, उसने मोती का साथ लिया और अपने सौंदर्य में वृद्धि की। इसलिए वह नाक के सौंदर्य को बढ़ाने वाले आभूषण के रूप में स्वीकार हुआ अर्थात् तरयौना (कर्णाभूषण) निरंतर कान का सेवन करने पर भी तरयौना ही रहा।

भाव यह है कि ये तरयौना कानों में पीछे ही पडा रहा । ये कभी आगे नाक तक नहीं आ सका। नाक आगे और कान पीछे है, किंतु बेसरि अर्थात् नाक का आभूषण, जिसमें मोती लटकता रहता है, उसके मोतियों के साथ रहने से नाक का पद अर्थात् कान की अपेक्षा उच्च पद प्राप्त कर लिया है। अर्थात् उसने सत्संग किया, इसलिए उसे स्वर्ग का उच्च स्थान प्राप्त हो सका।

कहने का भाव यह है कि निरंतर एक निष्ठा भाव से वेद का पाठ करने वाला व्यक्ति संसार सागर से अपना उद्धार नहीं कर सका अथवा स्वर्ग प्राप्त करने में असफल रहा, किंतु साधारण मनुष्य ने जीवन मुक्त पुरुषों का सत्संग प्राप्त कर स्वर्ग प्राप्त कर लिया। इस पद में श्लेष और वृत्यानुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

दोहा : 21.

जम करि-मुँह-तरहरि परयौ, इहिं धरहरि चित लाउ।
विषय-तृषा परिहरि अजौं नरहरि के गुन गाउ।।21.।।

व्याख्या :

दोस्तों ! इस पद में कवि ने ईश्वर के गुणगान के महत्व को बताया है। वे कहते हैं कि हे मनुष्य ! तू अपनी सांसारिक स्थिति के प्रति जागरूक हो जा, क्योंकि तू यम रूपी हाथी के नीचे पड़ा हुआ है अर्थात् जीवन क्षणभंगुर है। एक दिन तेरी मृत्यु निश्चित है, इसलिए जीवन की नश्वरता को ध्यान में रखते हुए ईश्वर के भजन में मन लगाना चाहिए।

कहने का तात्पर्य यह है कि हे सांसारिक मनुष्य ! तू यमराज रूपी हाथी के मुख के नीचे पड़ा हुआ है, जहां से बच पाना दुष्कर है। अतः तू इस स्थिति को अपने ध्यान में ला और अब भी विषय वासना एवं प्रश्नों को त्याग कर भगवान जी का गुणगान प्रारंभ कर दे। दोस्तों ! इस पद में रूपक एवं वृत्यानुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है।

Bihari Ratnakar Vyakhya बिहारी रत्नाकर के दोहों (22-25) की व्याख्या


Jagannath Das Ratnakar Krit Bihari Ratnakar Ke Dohe 22-25 Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! बिहारी रत्नाकर के अगले 22-25 दोहों की व्याख्या इसप्रकार है :

दोहा : 22.

पलनु पीक, अंजनु अधर, धरे महावरू भाल।
आजु मिले, सु भली करी; भले बने हौ लाल।।22.।।

व्याख्या :

दोस्तों ! इस दोहे में कवि ने उस स्थिति का वर्णन किया है, जब नायक पर-स्त्री के साथ रात बिताकर लौटा है। उसकी वेशभूषा देखकर नायिका समझ जाती है कि वह किसी अन्य स्त्री के साथ रात बिता कर लौटा है, क्योंकि उसकी पलकों पर पान की पीक लगी है। उसके होठों पर काजल लगा हुआ है। उसके मस्तक पर स्त्री द्वारा पैरों में लगाये जाने वाला महावर है। नायिका नायक के वेश को देखकर नायक से कहती है कि आज आप मिले बहुत अच्छा किया, क्योंकि आज आप बहुत सुंदर दिखाई दे रहे हो।

व्यंजना यह है कि नायिका कटाक्ष करती है कि आज आपके वेश को देखकर मुझे सहज ही अनुमान हो रहा है कि आप स्त्री-रमण करके लौटे हैं। नायिका कहती है कि हे प्रियतम ! आपके पलकों पर पीक, अधरों पर काजल और मस्तक पर महावर शोभायमान है। आज बड़ा ही शुभ दिन है कि आपने दर्शन दे दिये। वास्तव में आज आप बड़े सुंदर लग रहे हैं।

यहां व्यंग्यार्थ यह है कि नायिका अपने प्रियतम से कहती है कि हे प्रियतम ! आज आप रंगे हाथों पकड़े गये हैं। पर-स्त्रीरमण के सभी चिन्ह स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। मस्तक पर महावर है। पलकों में पर-स्त्री के मुंह की पीक लगी हुई है। अधरों पर काजल लगा हुआ है। ये सभी चिन्ह यह प्रमाणित कर रहे हैं कि आप किसी प्रौढ़ा परकीया स्त्री के साथ रमण करके आये हैं। इस पद में छेकानुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

दोहा : 23.

लाज-गरब-आलस-उमग-भरै नैन मुसकात।
राति-रमी रति देति कहि औरें प्रभा प्रभात।।23.।।

व्याख्या :

दोस्तों ! नायिका सुबह-सुबह उठी है और उसका सौंदर्य दुगुना दिखाई दे रहा है। उसकी सखी उस सौंदर्य को रात्रि में प्रियतम के साथ बिताये गये प्रेम के पलों का परिणाम मानती है। वह कहती है कि हे सखी ! तेरे मुस्कुराते नेत्रों में लज्जा भी है, गर्व भी है, आलस्य भी है और उमंग भी है। इसके कारण प्रात:काल में तेरा सौंदर्य अलग ही दिखाई दे रहा है, कुछ विशिष्ट है।

भाव यह है कि एक सहेली नायिका से कहती है कि हे सखी ! यद्यपि तू पति के साथ अपनी रात्रिरमण की स्थिति का वर्णन नहीं कर रही है, किंतु तेरे लाज, गर्व, आलस्य और उमंग से भरे हुए नेत्र मुस्कुराकर सब कुछ बता रहे हैं। इससे तेरी शोभा अनिर्वचनीय और मोहक प्रतीत होने लगी है।

कवि की यह अनिर्वचनीय महकता स्पष्ट कह रही है कि नायिका रात्रिभर विपरीत रतिक्रीड़ा में निमग्न रही है। इस पद में छेकानुप्रास एवं वृत्यानुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

दोहा : 24.

पति रति की बतियाँ कहीं, सखी लखी मुसकाइ।
कै कै सबै टलाटलीं, अलीं चलीं सुखु पाइ।।24.।।

व्याख्या :

दोस्तों ! यहाँ नायक और नायिका रंगमहल में बैठे विनोद कर रहे हैं। अचानक सखियाँ आ जाती है। नायक उस समय प्रेम की मनःस्थिति में है। वह चाहता है कि वह नायिका के साथ एकांत प्रेम का समय व्यतीत करें। सखियों का आना उसे कहीं ना कहीं अच्छा नहीं लगा तो वह संकेत से नायिका के साथ प्रेम की बातें करना शुरू करता है। नायिका उसका इशारा समझ जाती है और अपनी सखियों की ओर देखकर मुस्कुराती है।

सखियां भी समझदार हैं। वे भी धीरे-धीरे वहाँ से टल जाती है। उसी प्रसंग का वर्णन कवि यहाँ कर रहे हैं। बिहारी कह रहे हैं कि नायक और नायिका रंग महल में बैठे विनोद कर रहे थे कि उसी वक़्त सखियाँ आ गई। नायक ने नायिका से रति की बातें करना प्रारंभ कर दिया।

नायिका भी चतुर थी। अतः वह अपनी सखियों की ओर देखकर मुस्कुरा दी। सखियाँ भी नायिका की ही भांति चतुर थी। अतः वे भी रति-रहस्य के संकेत को पाकर बड़ी प्रसन्नता से धीरे-धीरे कोई ना कोई बहाना बनाकर वहाँ से उठकर चल दी। इस पद में वृत्यानुप्रास एवं पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार का प्रयोग हुआ है।

दोहा : 25.

पर वारौं उरबसी, सुनी, राधिके सुजान।
तू मोहन कैं उर बसी ह्वै उरबसी-समान।। 25.।।

व्याख्या :

दोस्तों ! इस पद में बिहारी लिखते हैं कि राधिका के मन में एक बार यह वहम हो जाता है कि श्री कृष्ण जी ने अपने हृदय में किसी और को बसा लिया है। और अब श्रीकृष्ण जी के हृदय में उनके लिये कोई स्थान नहीं रहा।

जब श्री कृष्ण को इस बात का पता चलता है तो वे राधा जी से कहते हैं कि तुम पर मैं स्वर्ग की उर्वशी नामक अप्सरा भी न्योछावर कर सकता हूँ। तू यह निश्चित रूप से मान ले कि तू मोहन के हृदय में बसी हुई है। जिस प्रकार उरबसी नामक आभूषण ह्रदय पर शोभायमान होता है, उसी प्रकार तुम भी उस उरबसी आभूषण के समान मेरे हृदय में बसी हुई हो।

कहने का तात्पर्य यह है कि राधिका के श्रीकृष्ण को अन्य-रत मान लेने पर श्री कृष्ण जी उन्हें मनाते हुए कहते हैं कि हे सुजान राधिके ! तुम यह मान लो कि मैं तुम्हारे रूप और सौंदर्य पर उर्वशी जैसी सुंदर अप्सरा को भी न्योछावर कर सकता हूँ।

कारण यह है कि तुम तो मेरे हृदय में उसी प्रकार निवास करती हो, जिस प्रकार उर्वशी नामक आभूषण हृदय में निवास करता है। व्यंजना यह है कि हृदय में बसे होने पर और किसी के तो बसने की संभावना ही नहीं है।

इसप्रकार दोस्तों ! आज हमने बिहारी रत्नाकर के अगले 19-25 तक के दोहों की व्याख्या को अच्छे से जाना और समझा। अब अगले भाग में हम किसी नए अध्याय की शुरुआत करने जा रहे है। तो बने रहिये हमारे साथ।


यह भी जरूर पढ़े :


एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको “Bihari Ratnakar Vyakhya बिहारी रत्नाकर के दोहे (19-24) व्याख्या” के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

नोट्स अच्छे लगे हो तो अपने दोस्तों को सोशल मीडिया पर शेयर करना ना भूले I नोट्स पढ़ने और HindiShri पर बने रहने के लिए आपका धन्यवाद..!


Leave a Comment

error: Content is protected !!
Ads Blocker Image Powered by Code Help Pro

Ads Blocker Detected!!!

We have detected that you are using extensions to block ads. Please support us by disabling these ads blocker.

Powered By
Best Wordpress Adblock Detecting Plugin | CHP Adblock