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Vinay Patrika Pad 156-158 विनय पत्रिका के पदों की व्याख्या


Vinay Patrika Pad 156-158 Vyakhya by Tulsidas in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! श्री गोस्वामी तुलसीदास रचित “विनय-पत्रिका” की पद व्याख्या श्रृंखला में आज प्रस्तुत है : पद संख्या 156-158 की विस्तृत व्याख्या। ध्यान से समझियेगा :

श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत “विनय-पत्रिका” के पदों का विस्तृत अध्ययन करने के लिये आप
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Vinay Patrika Ki Vyakhya विनय पत्रिका के पद संख्या 156 की व्याख्या


Tulsidas Krit Vinay Patrika Ke Pad 156 Ki Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! विनय पत्रिका के 156वें पद की व्याख्या इसप्रकार है :

#पद :

Vinay Patrika Pad Sankhya 156 Ki Vyakhya in Hindi

कलि नाम कामतरु रामको।
डालनिहार दारिद दुकाल दुख, दोष घोर घन घामको ।।1.।।

नाम लेत दाहिनो होत मन, बाम बिधाता बामको।
कहत मुनीस महेस महातम, उलटे सूधे नामको ।।2.।।

भलो लोक-परलोक तासु जाके बल ललित-ललामको।
तुलसी जग जानियत नामते सोच न कूच मुकामको ।।3.।।

व्याख्या :

दोस्तों ! इस पद में तुलसीदास जी कह रहे हैं कि इस कलयुग में श्रीराम जी का नाम कल्पवृक्ष के समान है। वह दरिद्रता, दुर्भिक्ष, दु:ख, दोष, सांसारिक विपत्तियों और कड़ी धूप अर्थात् ताप और संताप का नाश करने वाला हैं। कहने का भाव यह है कि सांसारिक कड़ी धूप से बचाने के लिये श्रीराम जी का नाम मेघ के समान है।

आगे तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीराम जी का नाम लेने से ही प्रतिकूल मन भी अनुकूल हो जाता है । रूठे हुये देव भी प्रसन्न हो जाते है अर्थात् उल्टे नाम जपते-जपते वाल्मीकि बहेलिये से ब्रह्मर्षि बन गये और शिवजी सीधा नाम जपने से हलाहल विष का पान कर गये एवं स्वयं भगवत स्वरूप माने गये।

जिसे इस सुन्दरतम श्रीराम नाम के बल पर भरोसा है। उसके लोक और परलोक बने बनाये हैं। हे तुलसी ! श्रीराम नाम से इस आवागमन अर्थात् संसार में आना और जाना, दोनों ही हँसी के खेल हो जाते हैं अर्थात् सरल हो जाते हैं।

Vinay Patrika Ki Vyakhya विनय पत्रिका के पद संख्या 157 की व्याख्या


Tulsidas Krit Vinay Patrika Ke Pad 157 Ki Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! विनय पत्रिका के 157वें पद की व्याख्या इसप्रकार है :

#पद :

Vinay Patrika Ke Pad 157 Ki Bhavarth Sahit Vyakhya in Hindi

सेइये सुसाहिब राम सो।
सुखद सुसील सूजन सूर सूचि, सुन्दर कोटिक काम सो ।।1.।।

सारद सेस साधु महिमा कहैं, गुनगन-गायक साम सो।
सुमिरि सप्रेम नाम जासों रति चाहत चंद्र-ललाम सो ।।2.।।

गमन बिदेस न लेस कलेसको, सकुचत सकृत प्रनाम सो।
साखी ताको बिदित बिभीषन, बैठो है अबिचल धाम सो ।।3.।।

व्याख्या :

दोस्तों ! इस पद में तुलसीदास जी कह रहे हैं कि श्रीराम जी के जैसे सुंदर स्वामी की सेवा करनी चाहिए, क्योंकि वे सुख प्रदान करने वाले है, सुशील है, चतुर है, वीर है और करोड़ों कामदेव के समान सुंदर है।

उनकी महिमा का गुणगान तो स्वयं सरस्वती, शेषनाग और संत जन करते हैं। उनके गुणावली के गायक सामवेद के समान है। शिव जी जैसे महादेव भी उनका गुणगान करते हुये उनसे लगन लगाना चाहते हैं।

वे सदा एकरस और प्रसन्न रहने वाले स्वामी हैं। उन्हें वन जाते हुये कुछ भी कष्ट नहीं हुआ। उन्हें कोई एक बार भी प्रणाम करता है तो वे संकोच के मारे दब जाते हैं। इन सबका साक्षी वह लंका में बैठा विभीषण है।

#पद :

टहल सहल जन महल-महल, जागत चारों जुग जाम सो।
देखत दोष न खीझत, रीझत सुनि सेवक गुन-ग्राम सो ।।4.।।

जाके भजे तिलोक-तिलक भये, त्रिजग जोनि तनु तामसो।
तुलसी ऐसे प्रभुहिं भजै जो न ताहि बिधाता बाम सो ।।5.।।

व्याख्या :

तुलसीदास जी आगे कहते हैं कि उनकी चाकरी बहुत सरल है। यदि थोड़ी बहुत भूल हो भी जाये तो वे माफ कर देते हैं। वे अपने भक्तों के घट-घट में अर्थात् हृदय में चारों युगों से, चारों प्रहर जागते हुये रहते हैं। कहने का भाव यह है कि वे मोह या संकट के समय उनके हृदय में बैठकर चौकसी करते हैं। वे उनकी रखवाली करते हैं।

आगे तुलसीदास जी कहते हैं कि अपने सेवक का अपराध देखते हुये भी वे उस पर क्रोध नहीं करते। जब भी अपने भक्तों की गुणावली सुनते हैं तो उन पर निहाल हो जाते हैं। ऐसे प्रभु जी की उपासना करने से पशु-पक्षी और तामसी राक्षस भी त्रिलोक-शिरोमणि माने गये हैं। ऐसे सुंदर, सुशील, पतित-पावन प्रभु जी को जो नहीं भजते, उन पर विधाता ही प्रतिकूल है। ऐसा ही समझना चाहिए।

Vinay Patrika Ki Vyakhya विनय पत्रिका के पद संख्या 158 की व्याख्या


Tulsidas Krit Vinay Patrika Ke Pad 158 Ki Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! विनय पत्रिका के 158वें पद की व्याख्या इसप्रकार है :

#पद :

Tulsidas Ji Rachit Vinay Patrika Ke Pad 158 Ki Arth Sahit Vyakhya in Hindi

कैसे देउँ नाथहिं खोरि।
काम-लोलुप भ्रमत मन हरि भगति परिहरि तोरि ।।1.।।

बहुत प्रीति पुजाइबे पर, पूजिबे पर थोरि।
देत सिख सिखयो न मानत, मूढ़ता असि मोरि ।।2.।।

किये सहित सनेह जे अघ हृदय राखे चोरि।
संग-बस किये सुभ सुनाये सकल लोक निहोरि ।।3.।।

व्याख्या :

तुलसीदास जी इस पद में कहते हैं कि मैं अपने नाथ, अपने स्वामी को कैसे दोष दूँ। हे हरि ! आपकी भक्ति को छोड़कर मेरा मन काम में फँसा हुआ इधर-उधर घूमता रहता है। कभी क्षण-भर के लिए भी मैं आपका ध्यान नहीं कर पाता।

तुलसीदास जी कहते हैं कि स्वयं को पूजाने में मुझे बहुत प्रेम है। मैं सदा यही चाहता हूं कि लोग मुझे संत-महंत मानकर मेरी पूजा करें। लेकिन आपको पूजने में मेरी बहुत कम श्रद्धा है। मैं दूसरों को बहुत उपदेश देता रहता हूं और चाहता हूं कि लोग मेरे उपदेश पर चले, परंतु मैं स्वयं किसी की शिक्षा नहीं मानता। मेरी मूर्खता ऐसी है।

आगे तुलसीदास जी कह रहे हैं कि जिन-जिन पापों को मैंने बड़े चाव से किया है, उन्हें मैंने अपनी ह्रदय में छुपाकर रख लिया और कभी किसी सत्संग में जाने से, मुझसे अगर कोई अच्छे काम हो भी गये तो उन्हें मैं सारे संसारभर को सुनाता फिरता हूँ।

कहने का भाव यह है कि मुझे सदा यही लगी रहती है कि ये दुनिया मुझे महान समझे। इसलिए मैं अपने पापों को तो हृदय में छुपाकर रखता हूँ, मगर सत्संग के कारण जो कोई अच्छे काम मुझसे हो गये हैं, उनका मैं सारे संसार में ढिंढोरा पीटता रहता हूँ।

#पद :

Vinay Patrika Pad Sankhya 158 Vyakhya Saar in Hindi

करौं जो कछु धरौं सचि-पचि सुकृत-सिला बटोरि।
पैठि उर बरबस दयानिधि दम्भ लेत अँजोरि ।।4.।।

लोभ मनहिं नचाव कपि ज्यों गरे आसा-डोरि।
बात कहौं बनाइ बुध ज्यों, बर बिराग निचोरि ।।5.।।

एतेहुँ पर तुम्हरो कहावत, लाज अँचई घोरि।
निलजता पर रीझि रघुबर, देहु तुलसिहिं छोरि ।।6.।।

व्याख्या :

आगे तुलसीदास जी कहते हैं कि कभी भी मुझसे कोई सत्कर्म बन जाते हैं तो उन्हें खेत में पड़े दानों के समान बटोर-बटोर के रख लेता हूँ, लेकिन पाखंड ह्रदय में जबरदस्ती बैठकर, उन्हें भी खोज-खोज कर बाहर निकाल देता है अर्थात् पाखंड किये हुये सारे अच्छे कामों को मिट्टी में मिला देता है।

तुलसीदास जी कहते हैं कि ये लोभ मेरे मन को आशा रुपी रस्सी से इस कदर नचा रहा है, जैसे कोई मदारी बंदर के गले में डोरी बांधकर उसे मनमाना नाच नचाता है। इसी लोभ के कारण वैराग्य और तत्व की बातें, बड़े-बड़े पंडितों के समान करता हूँ।

इतना सब पाखंड करने पर भी मैं तुम्हारा दास कहाता हूँ। जो लाज- शर्म थी, उसे भी मानो मैं घोल कर पी गया हूँ अर्थात् मैं बेशर्म होकर जो जी में आये करता रहता हूँ। हे रघुनाथ जी ! अब मेरे पास कुछ भी नहीं रहा। अब इस निर्लज्जता पर ही रीझकर मेरा बंधन काट दीजिये। मुझे इस संसार के जाल से मुक्त कर दीजिये।

तो दोस्तों ! आज के अध्याय में हमने विनय पत्रिका के अगले 156-158वें पदों की विस्तृत व्याख्या को अच्छे से जाना और समझा। फिर मिलते है अगले पदों के साथ।


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एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Vinay Patrika Pad 156-158 विनय पत्रिका के पदों की व्याख्या के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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