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Vinay Patrika Pad 159-161 विनय पत्रिका के पदों की व्याख्या


Vinay Patrika Pad 159-161 Vyakhya by Tulsidas in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! आज के अध्याय में हम श्री गोस्वामी तुलसीदास रचित “विनय-पत्रिका” के अगले 159-161वें पदों की व्याख्या को समझेंगे। तो चलिए इन पदों को विस्तार से पढ़ते है :

श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत “विनय-पत्रिका” के पदों का विस्तृत अध्ययन करने के लिये आप
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Vinay Patrika Ki Vyakhya विनय पत्रिका के पद संख्या 159 की व्याख्या


Tulsidas Krit Vinay Patrika Ke Pad 159 Ki Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! विनय पत्रिका के 159वें पद की व्याख्या इसप्रकार है :

#पद :

Vinay Patrika Pad Sankhya 159 Ki Vyakhya in Hindi

है प्रभु ! मेरोई सब दोसु।
सीलसिंधु कृपालु नाथ अनाथ आरत-पोसु ।।1.।।

बेष बचन बिराग मन अघ अवगुननिको कोसु।
राम प्रीति प्रतीति पोली, कपट-करतब ठोसु ।।2.।।

राग-रंग कुसंग ही सों, साधु-संगति रोसु।
चहत केहरि-जसहिं सेइ सृगाल ज्यों ख़रगोसु ।।3.।।

व्याख्या :

तुलसीदास जी इस पद में कहते हैं कि हे प्रभु जी ! सब मेरा ही दोष है। आप तो शील के समुंद्र हैं, कृपालु हैं। नाथों के नाथ हैं और दीन-दुखियों के पालनहार हैं, इसलिए आपका कोई दोष नहीं है। हे प्रभु जी यह सब दोष मेरा ही है।

मेरे वेश और वचनों से तो वैराग्य झलक रहा है, परंतु मेरे मन में पाप है और अवगुणों का तो मैं खजाना हूँ, इसलिए हे श्रीराम जी आप की भक्ति और श्रद्धा के लिए मेरा मन खोखला है अर्थात् उसमें थोड़ी सी भी भक्ति और प्रीति नहीं है। लेकिन छल और कपट जैसे कामों के लिये मेरे मन में स्थान ही स्थान है।

आगे तुलसीदास जी कहते हैं कि हे प्रभु जी ! खरगोश सियार की सेवा करके सिंह जैसी कीर्ति चाहता है, वैसे ही मैं भी कुसंगतियों से तो प्रेम करता हूँ और साधु-संतो के संग से रुठा रहता हूँ। कहने का भाव यह है कि खरगोश सियार के बूते पर सिंह का सा यश पाना चाहता है। लेकिन संभव ही नहीं है। सियार तो उसका भक्षण करने वाला है। यश की तो दूर की बात है, उसे तो प्राणों से भी हाथ धोने पड़ेंगे।

इस प्रकार के कुसंग में पड़कर वह कीर्ति कमाना चाहता है, लेकिन कीर्ति के बदले उसे अब अपकीर्ति ही प्राप्त होगी। वह और अधिक बदनाम होता चला जायेगा।

#पद :

संभु-सिखवन रसन हूँ नित राम-नामहिं घोसु।
दम्भहूँ कलि नाम कुंभज सोच-सागर-सोसु ।।4.।।

मोद-मंगल-मूल अति अनुकूल निज निरजोसु।
रामनाम प्रभाव सुनि तुलसिहुँ परम परितोसु ।।5.।।

व्याख्या :

तुलसीदास जी आगे कहना चाहते हैं कि शिवजी का उपदेश यही है कि नित्य जीभ से राम नाम का उच्चारण करो। पाखंड से लिया हुआ राम का नाम भी लोक-परलोक की चिंताओं को दूर करता है।

तुलसीदास जी कह रहे हैं कि राम-नाम आनंद और कल्याण की जड़ है, इसलिए मेरा निश्चय है कि एक राम-नाम ही मेरे लिए अनुकूल है। राम-नाम का ऐसा प्रभाव सुनकर तुलसी को बड़ा संतोष है, क्योंकि वह समझता है कि उसका भी इससे उद्धार हो जायेगा।

Vinay Patrika Ki Vyakhya विनय पत्रिका के पद संख्या 160 की व्याख्या


Tulsidas Krit Vinay Patrika Ke Pad 160 Ki Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! विनय पत्रिका के 160वें पद की व्याख्या इसप्रकार है :

#पद :

Vinay Patrika Ke Pad 160 Ki Bhavarth Sahit Vyakhya in Hindi

मैं हरि पतित-पावन सुने।
मैं पतित तुम पतित-पावन दोउ बानक बने ।।1.।।

ब्याध गनिका गज अजामिल साखि निगमनि भने।
और अधम अनेक तारे जात कापै गने ।।2.।।

जानि नाम अजानि लीन्हें नरक सुरपुर* मने।
दासतुलसी सरन आयो, राखिये आपने ।।3.।।

व्याख्या :

तुलसीदास जी इस पद में कह रहे हैं कि हे हरि ! मैंने सुना है कि तुम पापियों को पवित्र करते हो, इसलिए मैं तो पतित हूं अर्थात् पापी हूँ और तुम पतित पावन हो अर्थात् पापियों का उद्धार करने वाले हो। तो बस अब हम दोनों का मेल मिल गया है। भाव यह है कि मुझे पतित-पावन की तलाश थी और तुम्हें पतित की। तुम्हें पतित का उद्धार करना था, इसलिए मेरी भी कामना पूरी हो गई और तुम्हारी भी कामना पूरी हो गई।

तुलसीदास जी आगे कहते हैं कि वेद साक्षी भर रहे हैं कि तुमने व्याध अर्थात् वाल्मीकि को, गणिका अर्थात् पिंगला नामक वेश्या को, गजेंद्र और अजामिल को संसार सागर से पार कर दिया। आपने और भी अनेक नीचो को तारा है। उनकी गिनती भला किससे हो सकती है।

जिन्होंने जानकर या बिना जाने तुम्हारा नाम स्मरण किया है, आपने नरक और यमपुर जाने से रोक लिया है। ये सीधे बैकुंठ चले गये हैं। आगे तुलसीदास जी कहते हैं कि यह सारी बातें जानकर तुलसी भी आपकी शरण में आ गया है, इसे आप अपना लीजिए।

Vinay Patrika Ki Vyakhya विनय पत्रिका के पद संख्या 161 की व्याख्या


Tulsidas Krit Vinay Patrika Ke Pad 161 Ki Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! विनय पत्रिका के 161वें पद की व्याख्या इसप्रकार है :

#पद :

Tulsidas Ji Rachit Vinay Patrika Ke Pad 161 Ki Arth Sahit Vyakhya in Hindi

तो सों प्रभु जो पै कहूँ कोउ होतो।
तो सहि निपट निरादर निसिदिन, रटि लटि ऐसो घटि को तो ।।1.।।

कृपा-सुधा-जलदान माँगिबो कहौं सो साँच निसोतो।
स्वाति-सनेह-सलिल-सुख चाहत चित-चातक सो पोतो ।।2.।।

व्याख्या :

इस पद में तुलसीदास जी कहते हैं कि यदि तेरे जैसा कहीं कोई दूसरा मालिक होता तो भला ऐसा कौन क्षुद्र था, जो बड़ा भारी अपमान सहकर और दिन-रात तेरा नाम रट-रटकर दुर्बल होता। कहने का भाव यह है कि तेरे सिवा और कोई दूसरा समर्थ नहीं है। सब जगह भटककर ही तेरे द्वार पर धरना दिया है।

आगे तुलसीदास जी कहते हैं कि मैं तुझसे कृपा रूपी अमृत जल माँग रहा हूँ। वह सच में बहुत ही निराला है। मेरा चित्तरूपी चातक का बच्चा प्रेम रूपी स्वातिनक्षत्र का आनंदरुपी जल चाहता है। कहने का भाव यह है कि तेरे प्रेम के आनंद के लिये मेरा मन तड़प रहा है। इसे पल भर भी चैन नहीं पड़ता है। बच्चा ही तो है, इसीलिए तो बच्चे को भला धीरज कैसे बँध सकती है। वह तेरे प्रेम रूपी स्वातिनक्षत्र का जल चाहता है।

#पद :

काल-करम-बस मन कुमनोरथ कबहुँ कबहुँ कुछ भो तो।
ज्यों मुदमय बसि मीन बारि तजि उछरि भभरि लेत गोतो ।।3.।।

जितो दुराव दासतुलसी उर क्यों कहि आवत ओतो।
तेरे राज राय दशरथके, लयो बयो बिनु जोतो ।।4.।।

व्याख्या :

तुलसीदास जी आगे कहते हैं कि काल-कर्म के कारण कभी-कभी मन में कोई वासना भी आ जाती है तो वह ऐसा हो जाता है, जैसे मछली कभी-कभी घबराकर उछलकर फिर उसी में गोता लगाती है। कहने का भाव यह है कि जिस प्रकार मछली को जल का क्षण-भर का वियोग भी सहन नहीं होता, उसी प्रकार मेरा चित्त-चातक भी प्रेम जल से अलग होने पर घबरा जाता है और फिर उसी के लिये चेष्टा करता है।

आगे तुलसीदास जी कहते हैं कि जितना छल-कपट तुलसीदास के हृदय में है, उतना कहा नहीं जा सकता। लेकिन इतना विश्वास है कि हे दशरथ-दुलारे ! तेरे राज्य में लोगों ने बिना जोते और बोये ही पाया है। कहने का भाव यह है कि बिना सत्कर्म किये ही पापियों ने मोक्ष-लाभ पाया है। तो मेरी भी उसी प्रकार बन जायेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

इसप्रकार दोस्तों ! आज हमने विनय पत्रिका के 159 से 161 तक के पदों की विस्तृत व्याख्या समझ ली है। उम्मीद है कि आपको समझने में कोई परेशानी नहीं हो रही होगी। धन्यवाद !


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एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Vinay Patrika Pad 159-161 विनय पत्रिका के पदों की व्याख्या के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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