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Ghananand Kavitt Arth घनानन्द कवित्त के पदों की व्याख्या


Ghananand Kavitt Arth Edited by Vishwanath Prasad Mishra in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! आज हम आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित “घनानन्द कवित्त” के अगले 10 से लेकर 13 तक के पदों की अर्थ सहित व्याख्या करने जा रहे है। तो चलिए ध्यान से समझते है :

आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित घनानन्द कवित्त के पदों का विस्तृत अध्ययन करने के लिये आप
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Ghananand Kavitt घनानन्द कवित्त के पदों की विस्तृत व्याख्या (10-13)


Vishwanath Prasad Mishra Sampadit Ghananand Kavitt Ke Pad 10-13 Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! घनानंद कवित्त के 10-13 पदों की व्याख्या इसप्रकार है :

पद : 10.

Ghananand Kavitt Ke Pad 10 ki Vykhya in Hindi

पहिले घन-आनंद सींचि सुजान कहीं बतियाँ अति प्यार पगी।
अब लाय बियोग की लाय बलाय बढ़ाय, बिसास दगानि दगी।
अँखियाँ दुखियानि कुबानि परी न कहुँ लगै, कौन घरी सुलगी।
मति दौरि थकी, न लहै ठिकठौर, अमोही के मोह मिठामठगी।।

व्याख्या :

दोस्तों ! इस पद में नायिका द्वारा अपने प्रिय की निर्दयता के प्रति विवशता की स्थिति पर पश्चाताप किया जा रहा है। प्रिय के व्यवहार में विषमता का आख्यान, उसके प्रेमपूर्ण संताप के अनंतर विश्वासघात करने और वेदना बढ़ाने में है। आँखों की कुबाण कहीं भी नहीं लगती है। बुद्धि की विकृति विचार करने में भी अशक्त है। पश्चाताप के दो आधार है : अभिलक्षण व्यवहार और अपनी विवशता की विलक्षण स्थिति

दोस्तों ! कवि कहते हैं कि प्रिय, जो संपूर्ण आनंद स्वरूप है, उन्होंने आनंद की वृष्टि करके और उस वृष्टि के जल से चातुर्यपूर्वक भिगोकर अत्यंत प्यार की बातें की अर्थात् संयोग अवस्था में उन्होंने मुझे अपने प्रेम से तृप्त किया और अब वियोग अवस्था में विरह की आग लगाकर और उस आग के द्वारा कष्ट को बढाकर, फिर मुझे विश्वासघात के कपट से जलाया है।

दोस्तों ! प्रिय के वियोग की वेदना अत्यंत कष्टकारक है और उससे भी ज्यादा उसके विश्वासघाती व्यवहार से कष्ट होता है। उधर दुखिया आँखों को ऐसी आदत पड़ी हुई है कि इन्हें किसी और को देखना सुहाता ही नहीं है। यह कैसी घड़ी आ गई है ? यह कैसा बुरा समय आ गया है कि ना तो प्रिय ही अनुकूल है और ना ही आंखें अपने प्रति ऐसा व्यवहार कर रही है, जिससे मुझे कष्ट ना मिले, कष्ट का अनुभव कुछ कम हो जाये।

रही बात बुद्धि की तो वह बिचारी विचार-मार्ग पर दौड़ लगाते-लगाते थक गई है। पर उसे कहीं भी टिकाव का स्थान नहीं मिला। अमोही प्रिय के मोह के मिठास से वह ऐसी ठगी है कि उस मिठास के व्याप्त होने से उसने अपने सोचने-विचारने की वृत्ति ही त्याग दी है।

पद : 11.

Ghananand Kavitt Ke Pad 11 Ka Arth in Hindi

क्यों हँसि हेरि हियरा अरू क्यौं हित कै चित चाह बढ़ाई।
काहे कौं बालि सुधासने बैननि चैननि मैननि सैन चढ़ाई।
सौ सुधि मो हिय मैं घन-आनँद सालति क्यौं हूँ कढ़ै न कढ़ाई।
मीत सुजान अनीत की पाटी इते पै न जानियै कौनै पढ़ाई।।

व्याख्या :

दोस्तों ! इस छंद में प्रेमिका की ओर से अपने प्रिय को उपालम्भ दिया जा रहा है। प्रिय ने हँसकर देखा, जिससे उसका ह्रदय आकृष्ट हुआ।उसने प्रेम का संकेत दिया, जिससे लालसा बढी। उसने अमृततुल्य वचन कहे, जिससे कामनायें जगी। उसका स्मरण हृदय में निरंतर बना हुआ है, फिर भी उन्मुख नहीं होता और यही उपालम्भ का हेतु है।

कवि कहते हैं कि हे प्रिय सुजान ! आपसे यह पूछना है कि आपने हँसते हुये देखकर मेरे हृदय को चुरा लिया है। आपने हँसते हुये अपने सहज स्वभाव से नहीं देखा था, बल्कि आपने प्रेम करके मेरे मन में लालसा बढ़ा दी थी। केवल हँसते देखकर तो लालसा ही हुई थी, पर आपके द्वारा प्रेम का संकेत पाने से वह लालसा बढी और बलवती भी हो गई। और आपको पाने की संभावना अधिक जान पड़ी।

घनानन्द कवित्त पद व्याख्या :

केवल प्रेम का संकेत होता तो यह कहा जा सकता था कि संकेत समझने में भूल हुई है, पर आपने अपनी अमृतमय वाणी में बात क्यों करी ? उन मीठी बातों का परिणाम यह हुआ कि मैंने स्वयं पर आनंदपूर्वक कामनाओं की चढ़ाई होने दी अर्थात् अनेक प्रकार की कामनायें उत्पन्न हो गई। अभी स्थिति यह है कि आपका विरह सहना पड़ रहा है। उन बीती बातों का स्मरण करना पड़ता है।

जब सुध आती है तो हे आनंद के बादल ! वह मेरे हृदय में कसकती है। मैं प्रयत्न करती हूँ कि वह वेदना दूर हो, पर वह तो किसी भी प्रकार से निकाले नहीं निकलती। मैं आपके विरह में गल रही हूँ और आप मुझसे परामुख हैं। यह समझ में नहीं आता कि आपको यह अन्याय की पाटी कौन पढ़ाता है। संसार में तो ऐसे व्यक्ति देखे-सुने नहीं गये, आपको ऐसा अन्याय सिखाने वाला कहाँ मिला।

दोस्तों ! पहले चरण में लूटे हुये व्यक्ति की लालसा और दीनता है। दूसरे चरण में आक्रांत हुए व्यक्ति की स्थिति है। तीसरे में आहत व्यक्ति की चेतना है। कोई लुट जाये, उस पर चढ़ाई हो जाये, फिर चोट भी खा जाये, एक नहीं, तीन-तीन आपदायें पड़ जाये और आपदा डालने वाला, तरह-तरह की साजिशें करने वाला एक ही व्यक्ति हो। ऐसा प्राय: नहीं होता है। कम से कम सुजान तो ऐसा नहीं करते, मित्र ऐसा नहीं करते। अतः अनीति की यह पट्टी जगत में विलक्षण है।

पद : 12.

Ghananand Kavitt Ke Pad 12 Ki Vykhya Bhav Sahit in Hindi

प्रीतम सुजान मेरे हित के निधान कहौ
कैसे रहै प्रान जौ अनखि अरसायहौ।
तुम तौ उदार दीन हीन आनि परयौ द्वार
सुनियै पुकार याहि कौ लौं तरसायहौ।
चातिक है रावरो अनोखो मोह आवरो
सुजान रूप-बावरो, बदन दरसायहौ।
बिरह नसाय, दया हिय मैं बसाय, आय
हाय ! कब आनँद को घन बरसायहौ।।

व्याख्या :

दोस्तों ! इस छंद में विरहिणी प्रिय को संदेश दे रही है। प्रिय को सम्मुखी करने के लिये अपनी वेदना का निवेदन है। प्रिय हित का खजाना है। प्रिय यदि नहीं आता तो प्राणों का बचना संभव नहीं है। उसके प्राणों की पोषण की व्यवस्था कठिन है। दूसरों का द्वार छोड़कर प्रिय के द्वार पर ही डेरा दे रखा है। उनके रूप के दर्शन के लिये व्याकुल है। यह प्रार्थना है कि कृपा करके दर्शन दें और आनंद की वृष्टि करके कृतार्थ करें।

विरहणी कहती है कि हे प्रियतम सुजान ! आप ही तो मेरे हित के कोष हैं। यदि आप ही रूठकर आने में आलस्य करेंगे तो फिर यह प्राण कैसे जीते रह सकते हैं। प्राणों के पोषण के लिये जिस कोष की आवश्यकता है, वह तो आपके ही पास है। ये दीन-हीन आप ही के द्वार पर आकर पड़े हैं।

आप उदार भी हैं। मेरी दीनता-हीनता का विचार करके अपने पास से कुछ देने की शक्ति भी रखते हैं। ये पुकार कर रहे हैं, आप उस पुकार को सुने, यह निवेदन है। इस प्राण पपीहे को कब तक तरसाते रहोगे। यह तो आपका ही चातक है, किसी दूसरे के द्वार पर नहीं जायेगा। यह विलक्षण है और आपके ही मोह में व्याकुल है। यह आपके रूप-सौंदर्य पर पागल है। केवल आपके मुख की छटा ही मिल जाये तो इसे संतोष होगा। आप कब दर्शन देंगे ?

वह समय कब आयेगा, जब आप हृदय से दया करके और इसके विरह का, इसके ताप का नाश करते हुये आनंद के घन की वृष्टि करेंगे, इसे आनन्दित करेंगे। ना केवल दर्शन देंगे, अपितु रस की वृष्टि भी करेंगे। दोस्तों ! इस छंद से परमार्थिक अर्थ का भी संकेत मिलता है। परमात्मा के अर्थ में भी यह उक्ति लगती है। इसमें रहस्यात्मक संकेत भी कल्पित हो सकता है।

पद : 13.

Ghananand Kavitt Pad 13 – Vishwanath Prasad Mishra in Hindi

तब तौ छबि पीवत जीवत है अब सोचन लोचन जात जरे
हित-पोष के तोष सुप्राण पले बिललात महादुख दोष भरे।
‘घनआनन्द’ मीत सुजान बिना सबही सुखसाज समाज टरे
तब हार पहाड़ से लागत है अब आनि के बीच पहार परे।।

व्याख्या :

दोस्तों ! इस छंद में विरही संयोग और वियोग का अंतर स्पष्ट कर रहा है। दोनों स्थितियों की तुलना कर रहा है। पहले अर्थात् संयोग अवस्था में छवि का अमृतपान करके नेत्र जीते थे। पर अब वियोगावस्था में वे ही विष ज्वाला से जल रहे हैं। पहले प्राण प्रेम के पोषण से पुष्ट हो रहे थे। अब दु:ख में गल रहे हैं। सब प्रकार के सुख वियोग में तिरोहित हो गये हैं। संयोग में निकटता इतनी थी कि आलिंगन में हार पहाड़ की भांति बाधक होते थे, उनका व्यवधान हटाकर आलिंगन होता था। पर अब हार के व्यवधान की चर्चा ही व्यर्थ है।

दोस्तों ! तब संयोग अवस्था में शोभा के अमृत का पान करते हुये अर्थात् सौंदर्य निरखते हुये जीते थे। अब वियोग अवस्था में अनेक प्रकार की चिंताओं से ग्रस्त होकर वे जले जा रहे हैं। ये तो नेत्रों की ओर शरीर के बाहरी अवयवों की स्थिति में विषम अंतर हुआ। शरीर के भीतर प्राणों की स्थिति यह थी कि वे प्रेम का पोषण आकंठ पाकर और उससे छककर भली-भांति पल रहे थे।

घनानन्द कवित्त पद व्याख्या :

केवल उनका नेत्रों की भांति जीना भर नहीं हो रहा था, वे विकसित हो रहे थे, पल रहे थे। पर वही प्राण उस पोषण के अभाव में अत्यंत दु:ख और दोष से भर गये हैं। और कोई पूछने वाला तक नहीं है, इसलिए बिलबिला रहे हैं। दु:ख का दूर होना तो दूर, कोई सांत्वना देने वाला भी नहीं है। साथियों का या सहानुभूति व्यक्त करने वालों का ऐसा अभाव हो गया है कि उस आनंद के घन सुजान मित्र के वियोग के साथ ही एक-एक सुख के ना साज रह गये, ना समाज। सभी धीरे-धीरे टल गये, देखी-अनदेखी करके चले गये।

यदि किसी के माध्यम से प्रिय को संदेश भेजना हो तो संदेश ले जाने वाला ही कोई नहीं रह गया है और ना ही प्रिय इतनी पास है कि उसे अपनी वेदना सुनाई जा सके। जिस प्रिय की निकटता इतनी अधिक थी कि उसके और मेरे बीच हार का व्यवधान भी पहाड़ की भांति अत्यधिक जान पड़ता था, वही प्रिय इतनी दूर है कि उसके और मेरे बीच एक नहीं अनेक पहाड़ आ गये हैं।

इसप्रकार दोस्तों ! आज हमने घनानंद कवित्त के अगले 10-13 तक के पदों की व्याख्या को अर्थ सहित समझा। अगले पार्ट में कुछ नए पदों के साथ फिर से हाज़िर होंगे। धन्यवाद !


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एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको “Ghananand Kavitt Arth घनानन्द कवित्त के पदों की व्याख्या” के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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