Contents

Ghananand Kavitt Bhavarth घनानन्द कवित्त के पदों की व्याख्या


Ghananand Kavitt Bhavarth Edited by Vishwanath Prasad Mishra in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! आज हम आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित “घनानन्द कवित्त” के अगले 14 से लेकर 17 तक के पदों की भावार्थ सहित व्याख्या करने जा रहे है। तो चलिए ध्यान से समझते है :

आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र द्वारा सम्पादित घनानन्द कवित्त के पदों का विस्तृत अध्ययन करने के लिये आप
नीचे दी गयी पुस्तकों को खरीद सकते है। ये आपके लिए उपयोगी पुस्तके है। तो अभी Shop Now कीजिये :


Ghananand Kavitt घनानन्द कवित्त के पदों की विस्तृत व्याख्या (14-17)


Vishwanath Prasad Mishra Sampadit Ghananand Kavitt Ke Pad 14-17 Bhavarth in Hindi : दोस्तों ! घनानंद कवित्त के 14-17 पदों की भावार्थ सहित व्याख्या इसप्रकार है :

पद : 14.

Ghananand Kavitt Ke Pad 14 Ki Vyakhya Bhavarth Sahit in Hindi

पहिले अपनाय सुजान सनेह सों क्यों फिरि तेहिकै तोरियै जू।
निरधार अधार है झार मंझार दई, गहि बाँह न बोरिये जू।।
‘घनआनन्द’ अपने चातक कों गुन बाँधिकै मोह न छोरियै जू ।
रसप्याय कै ज्याय,बढाए कै प्यास,बिसास मैं यों बिस धोरियै जू ।।

व्याख्या :

दोस्तों ! यहाँ संयोग और वियोग की विषमता के आधार पर प्रिय के द्वारा किये जाने वाले व्यवहार की कुत्सा की जा रही है। इसके लिए उसने 4 विषमताओं को सामने रखा है। पहली यह है कि प्रेमपूर्वक अपनाना और फिर रोष करके संबंध-विच्छेद करना। दूसरी यह कि जो निराधार मझधार में डूब रहा हो, उसे सहारा देकर बचाना, पानी से बाहर निकालना, हाथ पकड़कर जीवनदान देना और फिर पाँव पकड़ कर डुबो देना।

तीसरी – गुन से बंधे चातक का मोह छोड़ देना। जो पक्षी गुन या फंदे में फँसाया गया हो अर्थात् खाने-पकाने के लिये ना फँसाया गया हो, उसके प्रति मोह और ममत्व रहता ही है। फिर जो खाने-पकाने के लिये फंदे में फँसाये जाते हैं, उनके प्रति भी मोह, ममत्व दिखाया जाता है। यहाँ तो वह भी नहीं है।और चौथा यह है कि जो मर रहा हो, उसे जिलाकर के फिर विष देना ठीक नहीं। नीति तो यह कहती है कि विष का वृक्ष पाल-पोसकर, स्वयं उसे छिन्न-भिन्न करना अनुचित होता है अतः जितने भी व्यवहार हैं, सब अनुचित है।

घनानन्द कवित्त पद व्याख्या :

दोस्तों ! संयोगावस्था के दौरान जिसे कोई अपनाये ही नहीं, उसे भी अपनाकर प्रेम करते हैं और फिर रोष में आकर प्रेम-संबंध को तोड़ देते हैं। हे सुजान ! पहले आपने मुझे प्रेमपूर्वक अपनाया। अब क्या कारण है कि आप रोष करके प्रेम-संबंध तोड़ रहे हैं। जिसे प्रेमपूर्वक अपनाया जाये, उसे रोष करके पृथक कर देना लोक नीति के विपरीत है।

जो व्यक्ति धारा के बीच निराधार डूब रहा हो, उसे आधार देकर निकाल लेना, फिर उसे बाँह पकड़कर बलपूर्वक डुबो देना कारुणिकता के विपरीत है। जिस चातक को गुन से बाँधा गया हो अर्थात् जिसे मनोरंजन के लिए फंदे में फँसाया गया हो, उसका मोह नहीं छोड़ना चाहिए। यह जन-प्रकृति के विपरीत है।

रस पिलाकर ह्रदय में अनुकूलता का विश्वास जगाना, जिससे उसके जीने की आशा बलवती हो गई हो, उसके इस विश्वास में विष मिलाकर नष्ट कर देना प्राणी के स्वभाव के विरुद्ध है। हे सुजान ! आपके सारे आचरण जगत के व्यवहार, मन के व्यापार और मनुष्य या प्राणी के स्वभाव के विपरीत हैं।

पद : 15.

Ghananand Kavitt Ke Pad 15 Ka Bhavarth in Hindi

रावरे रूप की रीति अनूप, नयो नयो लागत ज्यौं ज्यौं निहारियै।
त्यौं इन आँखिन बानि अनोखी, अघानि कहूँ नहिं आनि तिहारियै।।
एक ही जीव हुतौ सु तौ वार्यौ, सुजान, संकोच औ सोच सहारियै।
रोकौ रहै न, दहै घनआनंद बावरी रीझि के हाथन हारियै।।

व्याख्या :

दोस्तों ! इसमें प्रिय के रूप की विशेषता और प्रेमी के नेत्रों की प्रकृति एवं प्रेम की वृति का वर्णन किया गया है। घनानंद कहते हैं कि हे सुजान ! आपके सौंदर्य की अद्वितीय रीति है, उसे ज्यों-ज्यों देखा जाता है, वह नया-नया दिखाई देता है। यदि उसमें हर बार नूतन रूप राशि नहीं हो तो कौतूहल कम हो जाये। मेरे इन नेत्रों में विलक्षण ऐब है। केवल कौतूहल होता तो उसकी शांति अन्यत्र से हो जाती है, पर इन्हें अन्यत्र कहीं तृप्ति नहीं मिलती है।

मेरा जीव अपनत्व को बनाये रखने वाला था, उसे भी आपके रूप पर निछावर कर दिया। अब अपना जीव ही वश में नहीं है तो किसी का संकोच और अपनी चिंता ही कौन करें? इसलिए हे सुजान ! आपसे निवेदन है कि मेरे संकोच और सोच को संभालना आपके ऊपर है। मेरी विवशता तो यह है कि यह पगली रीझ मुझे जलाती ही रहती है। इसके हाथों तो हारना पड़ा। यदि ऐसी रीझ नहीं होती तो ऐसी परेशानी नहीं होती।

पद : 16.

Ghananand Kavitt Ke Pad 16 Ki Vykhya Bhav Sahit in Hindi

आसही अकास मधि अवधि गुनै बढ़ाय
चोपनि चढ़ाय दीनौ कीनो खेल सो यहै।
निपट कठोर एहौ ऐंचत न आप ओर
लाड़ले सुजान सौं दुहेली दसा को कहै।।
अचिरजमई मोहि भई घनआनंद यों
हाथ साथ लाग्यो पै समीप न कहूँ लहै।
बिरह समीर की झकोरनि अधीर नेह
नीर भीज्यो जीव तऊ गुड़ी लों उड्यो रहै।।

व्याख्या :

दोस्तों ! जी उड़ा-उड़ा रहता है। इसी को तुलनात्मक विधि से प्रस्तुत कविता में दिखाया है। गुड्डी अर्थात् पतंग से जी के उड़ने में व्यतिरेक दिखाया गया है। पतंग आकाश में सामान्यतया उड़ाने वाले से बहुत दूर नहीं जाती, पर कभी-कभी वह अधिक ढील देने से दूर भी हो जाती है। जी की स्थिति भी यह है कि वह बहुत दूर उड़ गया है।

दूर चली जाने वाली पतंग डगमगाती बहुत है। इस स्थिति में उड़ाने वाला उसे संभाल कर निकट कर लेता है, पर जी को खींचने वाले का अभाव है। प्रिय के हाथ का संबंध होते हुए भी नैकट्य नहीं प्राप्त होता। यदि पतंग दूर पहुंच गई हो और अंधंड आ जाये तो डोर के टूटने और पतंग के फट जाने की आशंका हो जाती है।

डोर टूट जाती है, पतंग फट जाती है और जी ऐसी स्थिति में भी उड़ता ही रहता है। ना डोर टूटती है और ना ही जी फटता है। पतंग भी खेल में उड़ाई जाती है और जी भी खेल में उड़ाया गया है। उड़ाने वाले को पतंग की चिंता रहती है, पर जी उड़ाने वाले प्रिय निश्चिंत हैं। प्रिय की निश्चिंतता और प्रेमी के चित्त की विरहजन्य कष्ट सहने की दृढ़ता प्रदर्शित करना इसका प्रयोजन है।

घनानन्द कवित्त पद व्याख्या :

दोस्तों ! आशा रूपी आकाश में अवधि रूपी गुण को बढ़ाकर तथा उमंग में आकर आपने यह खिलवाड़ किया। प्रिय की प्राप्ति में समय की सीमा बढ़ती जाती है। आशा इससे समाप्त नहीं होती। आपने यह खिलवाड़ कर रखा है।

दोस्तों ! पतंग का खेल मनोविनोद के लिये होता है। समय की सीमा बढ़ाना आदि भी अपने मनोरंजन के लिये आपने ही किया है। हे सुजान ! आप बहुत कठोर है कि आप मुझे अपने पास खींचते ही नहीं है। इस चढ़ी हुई पतंग को उतारते ही नहीं, अपने पास बुलाते ही नहीं। प्रिय सुजान को दु:खद दशा को कौन कहे ? सुजान से कुछ कहने की आवश्यकता ही नहीं है और दशा भी ऐसी है कि कोई क्या कहे ?

हे आनंद के घन ! मुझे तो ऐसा आश्चर्य लग रहा है कि हाथ के साथ लगे रहने पर भी सामर्थ्य की प्राप्ति कहीं नहीं हो रही। पतंग हाथ के इशारे पर ही हिलती-डोलती है, पर हाथ के निकट में नहीं आ पाती। विधि की सारी दुर्दशा प्रिय के ही हाथों हुई है, पर प्रिय का सामीप्य उस बेचारे को नहीं मिल रहा है। विरह की वायु के झकोरो से जी अधीर हो रहा है और फिर आंसू से भीग कर भी मेरा जी पतंग की भाँति उड़ता ही रहता है। दोस्तों ! इस पद में रूपक, उपमा एवं विरोधाभास अलंकारों का प्रयोग किया गया है।

पद : 17.

Ghananand Kavitt Pad 17 Bhavarth – Vishwanath Prasad Mishra in Hindi

‘घनाआनँद’ जीवन मूल सुजान की , कौंधनि हू न कहूँ दरसैं।
सु न जानिये धौं कित छाय रहे, दृग चातक प्रान तपै तरसैं।।
बिन पावस तो इन्हें थ्यावस हो न, सु क्यों करि ये अब सो परसैं।
बदरा बरसै रितु में घिरि कै, नितहीं अँखियाँ उघरी बरसैं।।

व्याख्या :

दोस्तों ! प्रिय कहीं ऐसे स्थान पर रह रहा है, जहाँ से उसका कोई समाचार नहीं मिलता। कहाँ है, कैसे हैं, इसका कोई पता नहीं। प्रिय ने परदेस जाकर कोई संदेश नहीं दिया। यदि पता होता तो किसी को तो भेजा जाता, पर किसी को पता तक नहीं कि वह कहाँ है। यह तो प्रिय पक्ष की स्थिति है। प्रेमी की स्थिति यह है कि नेत्रों से जब तक प्रिय के दर्शन मिले, तब तक उन्हें चैन नहीं। केवल दर्शन ही ना मिले, प्रेम की दृष्टि भी हो और तुष्टि भी हो। वर्षा करने वाला पास ही नहीं है, इसलिए वर्षा बनाये रखने के लिए नेत्र निरंतर बरसते रहते हैं।

दोस्तों ! आनंद के बादल सुजान के दर्शन की तो बात ही क्या। उनकी स्थिति का पता देने वाले काँधे के भी दर्शन कहीं नहीं होते अर्थात् वह प्रवासी होकर कहाँ है, इसका कुछ भी पता नहीं चल रहा है। पता नहीं, वह कहाँ छाये हुये हैं। किसी के प्रेम में पडकर उसके संपर्क का परित्याग करना नहीं चाहते और इधर नेत्र रूपी चातक के प्राण विरह से संतप्त हैं और उनके द्वारा रस प्राप्त एवं संयोग सुख की प्राप्ति के लिये तरस रहे हैं।

घनानन्द कवित्त पद व्याख्या :

ये नेत्र रूपी चातक बिना वर्षा के किसी प्रकार धैर्य धारण करने वाले नहीं हैं, उधर वर्षा की घटा की छटा छाने वाले आनंद के घन का कहीं पता नहीं। अतः उस वर्षा को कैसे प्राप्त करें ? यह उनके सामने बहुत ही जटिल समस्या है।

उन्होंने सोचा कि बादल की वह सुखदायक घटा ना जाने कब आये। अतः उनका भ्रम बनाये रखने के लिये उन्होंने स्वयं ही वर्षा आरंभ कर दी। बादल तो ऋतु का समय आने पर सावन-भादो में ही बरसते हैं, पर इन नेत्रों ने नित्य ही बरसना प्रारंभ कर दिया है। बादल तो छाकर बरसते हैं, लेकिन आंखें तो उघरी ही बरस रही हैं। दोस्तों ! इसमें रूपक, विरोधाभास एवं श्लेष अलंकारों का प्रयोग कवि के द्वारा किया गया है।

इसप्रकार दोस्तों ! आज हमने घनानंद कवित्त के अगले 14-17 तक के पदों की व्याख्या को भावार्थ सहित समझा। अगले पार्ट में कुछ नए पदों के साथ फिर से हाज़िर होंगे। धन्यवाद !


यह भी जरूर पढ़े :


एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको “Ghananand Kavitt Bhavarth घनानन्द कवित्त के पदों की व्याख्या” के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

नोट्स अच्छे लगे हो तो अपने दोस्तों को सोशल मीडिया पर शेयर करना ना भूले I नोट्स पढ़ने और HindiShri पर बने रहने के लिए आपका धन्यवाद..!


Leave a Comment

error: Content is protected !!
Ads Blocker Image Powered by Code Help Pro

Ads Blocker Detected!!!

We have detected that you are using extensions to block ads. Please support us by disabling these ads blocker.

Powered By
Best Wordpress Adblock Detecting Plugin | CHP Adblock