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Vinay Patrika विनय पत्रिका के पद संख्या 140-141 की व्याख्या


Vinay Patrika Pad 140-141 Vyakhya by Tulsidas in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! अब तक हम श्री गोस्वामी तुलसीदास रचित “विनय-पत्रिका” के 137-139 तक के पदों को समझ चुके है। आज हम इसकी पद संख्या 140-141 की व्याख्या करने जा रहे है। तो चलिये शुरू करते है :

श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत “विनय-पत्रिका” के पदों का विस्तृत अध्ययन करने के लिये आप
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Vinay Patrika Ki Vyakhya विनय पत्रिका के पद संख्या 140 की व्याख्या


Tulsidas Krit Vinay Patrika Ke Pad 140 Ki Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! विनय पत्रिका के 140वें पद की भावार्थ सहित व्याख्या इसप्रकार है :

#पद :

Vinay Patrika Pad Sankhya 140 Ki Vyakhya in Hindi

ते नर नरकरूप जीवत जग भव-भंजन-पद-बिमुख अभागी।
निसिबासर रुचिपाप असुचिमन, खलमति-मलिन, निगमापथ-त्यागी ।।1।।

नहिं सतसंग भजन नहिं हरिको, स्त्रवन न राम-कथा-अनुरागी।
सुत-बित-दार-भवन-ममता-निसि सोवत अति, न कबहुँ मति जागी ।।2।।

तुलसीदास हरिनाम-सुधा तजि, सठ हठि पियत बिषय-बिष माँगी।
सूकर-स्वान-सृगाल, सरिस जन, जनमत जगत जननि-दुख लागी ।।3।।

व्याख्या :

दोस्तों ! इस पद में तुलसीदास जी कह रहे हैं कि संसार में ऐसे अभागे मनुष्य नरक रूप होकर जी रहे हैं, जो भगवत चरणों से विमुख है। भगवान श्रीराम जी के चरण जन्म-मरण से मुक्त करने वाले हैं।

तुलसीदास जी फिर आगे कहते हैं कि ऐसे मनुष्यों की रूचि रात-दिन ऐसे कार्यों में ही लगी रहती है और उनका मन अशुद्ध रहता है। उनकी बुद्धि भी मलीन रहती है और वे वेदों के मार्ग को भी छोड़ देते हैं। अर्थात् पाप कर्म करते-करते ऐसे दुष्टों की प्रकृति ऐसी हो जाती है कि उन्हें वेद विहित कर्म अच्छे ही नहीं लगते।

वे मनुष्य ना तो संतो का संग अर्थात् सत्संग करते हैं और ना ही भगवान का भजन ही करते हैं। ना श्रीराम जी की कथा का प्रेम ही उनके कानों में रहता है। वे पुत्र, रत्न, पत्नी, भवन आदि के मोह में ही रात्रि में सोते रहते हैं। इन सब के मोह में ही मदहोश रहते हैं। इस निद्रा से उनकी बुद्धि कभी भी जागती नहीं। उनके मन में कभी भी वैराग्य का उदय नहीं होता है।

इसलिये तुलसीदास जी कहते हैं कि वे दुष्ट लोग राम-नाम रूपी अमृत को छोड़कर हठपूर्वक विषय रूपी जहर को पीते हैं। वे मनुष्य सूअर, कुत्ते एवं गीदड़ के समान अपनी मां को ही दु:ख देने के लिये पैदा होते हैं अर्थात् जो विषयी मनुष्य है, वे आत्म-दर्शन का लाभ छोड़कर विषयों में फंसे रहते हैं।

Vinay Patrika Ki Vyakhya विनय पत्रिका के पद संख्या 141 की व्याख्या


Tulsidas Krit Vinay Patrika Ke Pad 141 Ki Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! विनय पत्रिका के 141वें पद की भावार्थ सहित व्याख्या इसप्रकार है :

#पद :

Tulsidas Ji Rachit Vinay Patrika Ke Pad 141 Ki Arth Sahit Vyakhya in Hindi

रामचंद्र ! रघुनायक तुमसों हौं बिनती केहि भाँति करौं।
अघ अनेक अवलोकि आपने, अनघ नाम अनुमानि डरौं ।।1।।

पर-दुख दुखी सुखी पर-सुख ते, संत-सील नहिं हृदय धरौं।
देखि आनकी बिपति परम सुख, सुनि संपति बिनु आगि जरौं ।।2।।

भगति-बिराग-ग्यान साधन कहि बहु बिधि डहकत लोग फिरों।
सिव-सरबस सुखधाम नाम तव, बेचि नरकप्रद उदर भरौं ।।3।।

व्याख्या :

तुलसीदास जी कहते हैं कि हे श्रीराम जी ! मैं किसप्रकार आपसे विनती करूं ? अपने पापों की ओर देखकर और आपके पापरहित नाम का विचार करके मन ही मन मुझे डर लग रहा है, क्योंकि पाप और पुण्य की कभी नहीं बनती है। दोनों में जमीन और आसमान का अंतर है। इसलिए मुझ जैसे पापी का उद्धार ईश्वर जी कैसे कर सकेंगे ? इसलिए मैं विनती करते हुये भी डरता हूं।

आगे तुलसीदास जी कहते हैं कि दूसरों के दु:ख से दुखी और दूसरों के सुख से सुखी होना संतों का शील स्वभाव है। ऐसे स्वभाव को मैं कभी भी हृदय में धारण नहीं कर सकता। मैं दूसरों के दु:ख को देख कर बड़ा प्रसन्न होता हूं और दूसरों की संपत्ति अर्थात् धन को देखता हूं तो ईर्ष्या से जला जाता हूं।

तुलसीदास जी आगे कहते हैं कि भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य के साधनों का उपदेश देता हुआ, मैं अनेक प्रकार से लोगों को ठगता फिरता हूं। शिव का सर्वस्व और आनंद का धाम यह राम नाम ही है, जिसको बेचकर अर्थात् जपकर मैं यह सिद्ध करता हूं कि मैं आपका बड़ा भक्त हूं। हे श्रीराम जी ! इस पापी पेट के लिये आपके नाम की ओट में, मैं कई पाप करता हूं।

#पद :

Vinay Patrika Pad Sankhya 141 Bhavarth Sahit Vyakhya in Hindi

जानत हौं निज पाप जलधि जिय, जल-सीकर सम सुनत लरौं।
रज-सम-पर अवगुन सुमेरु करि, गुन गिरि-सम रजतें निदरौं ।।4।।

नाना बेष बनाय दिवस-निसि, पर-बित जेहि तेहि जुगुति हरौं।
एकौ पल न कबहुँ अलोल चित हित दै पद-सरोज सुमिरौं ।।5।।

जो आचरन बिचारहु मेरो, कलप कोटि लगि औटि मरौं।
तुलसीदास प्रभु कृपा-बिलोकनि, गोपद-ज्यों भवसिंधु तरौं ।।6।।

व्याख्या :

मैं जानता हूं कि मेरे पाप समुद्र के समान है। यह जानते हुये भी जब सुनता हूं कि मेरे पाप पानी की बूंद के समान है, तब मैं लड़ने लग जाता हूं और दूसरों के धूल के समान अवगुण सुमेरु पर्वत के समान मानता हूं। उनके गुण जो पर्वत के समान हैं, उन्हें धूल के समान तुच्छ मानता हूं।

मैं हमेशा यही चाहता हूं कि लोग मुझे पापी ना कहें, जबकि मैं पापी हूं। मैं इतना स्वार्थी हूं कि मुझे सब कुछ अपना ही अच्छा लगता है। दूसरों की निंदा करता रहता हूँ। मैं दिन-रात अनेक वेश बना-बनाकर दूसरों का धन बटोरता रहता हूँ। कभी भी एक क्षण के लिये भी निश्छल चित्त से आपके चरणों का स्मरण नहीं किया।

तुलसीदास जी कहते हैं कि आप यदि मेरे आचरण पर विचार करे और मेरे पाप का लेखा-जोखा करने बैठे तो करोड़ों कल्पों तक मुझे ओट-ओट कर मरना पड़ेगा अर्थात् इस संसार रूपी कड़ाव में जलना पड़ेगा। इसलिए हे प्रभु ! कभी आप मेरी ओर कृपा दृष्टि से देखलोगे तो मैं तुलसीदास इस संसार को गाय के खुर के समान पार कर जाऊंगा अर्थात् इस संसार सागर से तर जाऊंगा।

दोस्तों ! आज हमने विनय पत्रिका से पद संख्या 140 और 141 की व्याख्या को विस्तारपूर्वक समझा। उम्मीद है कि आपको समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई होगी।


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एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Vinay Patrika विनय पत्रिका के पद संख्या 140-141 की व्याख्या के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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