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Bharmar Geet Saar भ्रमरगीत सार – संपादक रामचंद्र शुक्ल


Ramchandra Shukla Sampadit Bharmargeet Saar Ki Vyakhya In Hindi : दोस्तों ! छत्तीसगढ़ असिस्टेंट प्रोफेसर व UPSC की सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के लिए हम लेकर आ गए हैं, उनके पाठ्यक्रम में संकलित रामचंद्र शुक्ल द्वारा संपादित कृति “Bharmar Geet Saar भ्रमरगीत सार“। हम इसके प्रत्येक पदों की विस्तार से व्याख्या करने जा रहे है। तो प्रस्तुत है, शुरूआती #1-3 पदों की व्याख्या :

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Bharmar Geet Saar भ्रमरगीत सार की व्याख्या [#1-3 पद]


दोस्तों ! रामचंद्र शुक्ल द्वारा सम्पादित कृति “भ्रमरगीत सार” की शुरूआती #1-3 पदों की व्याख्या इसप्रकार से है :

#पद : 1.

Surdas’Bharmar Geet Saar Sampadak Ramchandra Shukla in Hindi

पहिले करि परनाम नंद सो समाचार सब दीजो
औ वहां वृषभानु गोप सो जाय सकल सुधि लीजो।।
श्रीदाम आदिक सब ग्वालन मेरे हुतो भेंटियो।
सुख-सन्देस सुनाय हमारी गोपिन को दुख मेटियो।।
मंत्री एक बन बसत हमारो ताहि मिले सचु पाइयो।
सावधान है मेरे हुतो ताही माथ नावाइयो।।
सुंदर परम् किसोर बयक्रम चंचल नयन बिसाल।
कर मुरली सिर मोरपंख पीताम्बर उर बनमाल।।
जनि डरियो तुम सघन बनन में ब्रजदेवी रखवार
वृंदावन सो बसत निरन्तर कबहूँ न होत नियार।।
उध्दव प्रति सब कहीं स्यामजू अपने मन की प्रीति।
सुन्दरदास किरण करि पठए यहै सफल ब्रजरीति।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01.परनामप्रणाम
02.दीजोदेना
03. वृषभानु गोपराधा के पिता
04.सकलसंपूर्ण
05.हुतोओर से
06.सचुसुख
07. ताहीउसको
08. माथ नावाइयोमस्तक झुकाना
09.बयक्रमअवस्था
10.जनिमत
11.रखवाररक्षा करने वाली
12.नियारपृथक
13.प्रतिसे
14.ब्रजरीतीब्रज की पद्धति

व्याख्या :

दोस्तों ! यह सूरदास जी द्वारा रचित “भ्रमरगीत” का प्रारंभिक पद है। भगवान श्री कृष्ण को अपने माता-पिता व राधा और गोपियों की याद आ गई है। इसलिए वे अपने ज्ञानी सखा उद्धव को दूत बनाकर ब्रजवासियों और प्रियजनों की कुशल क्षेम ज्ञात करने के लिए भेज रहे हैं। उद्धव पहली बार ब्रज में जा रहे हैं, इसलिए श्रीकृष्ण ब्रज की रीति-नीति से उद्धव को अवगत करा रहे हैं। श्री कृष्ण उद्धव को समझा रहे हैं कि ब्रज पहुंचने पर सबसे पहले तुम नंद बाबा को प्रणाम करना, उसके बाद उनसे सारा समाचार कह देना।

फिर तुम राधा के पिता वृषभानु गोप के पास जाकर उनसे कुशल क्षेम पूछना। मेरी ओर से श्रीदामा आदि सभी से मिलकर स्नेह से प्रणाम करना और साथ ही गोपियों को हमारा सुख संदेश अर्थात् कुशल समाचार सुना कर, उनके विरह जन्य दु:ख संताप को दूर करना। वहां वन में हमारा एक मंत्री रहता है, यहां मंत्री का अभिप्राय राधा से है। श्री कृष्ण कहते हैं कि तुम उनसे मिलकर सुख प्राप्त करना। जब तुम उनके सम्मुख जाओगे तो मस्तक नवाकर हमारी ओर से प्रणाम करना।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

श्री कृष्ण का उद्धव को सावधान करने का कारण यही है कि वह राधा से मिलकर भ्रम में न पड़ जाए क्योंकि वे वहां श्री कृष्ण का वेश धारण करके ही विचरण करती रहती हैं। श्री कृष्ण कह रहे हैं कि हमारा वर मंत्री अत्यंत सुंदर और किशोरावस्था का है। उसके नेत्र चंचल एवं बड़े-बड़े हैं। वह हाथ में मुरली और सिर पर मोर पंख, शरीर पर पीतांबर एवं गले में मोतियों की माला धारण करता है।

कृष्ण उद्धव से कह रहे हैं कि हमारा मंत्री अत्यंत सघन वन में निवास करता है। तुम वहां जाकर उनसे मिलना और वन में जाने के लिए डरने का कोई कारण नहीं है, क्योंकि ब्रज देवी वहां सब की रक्षा करती है, इसलिए चिंता का कोई कारण नहीं है। वह ब्रज देवी सदा वृंदावन में ही निवास करती है। वहां से कभी पृथक नहीं होती। इस प्रकार श्री कृष्ण ने उद्धव से अपने मन की समस्त प्रेममयी स्थिति का स्पष्टीकरण किया। इस प्रकार श्री कृष्ण ने उद्धव को सारी ब्रजरीती समझाकर ब्रज भेजा और उनसे कहा कि वे इसी के अनुसार व्यवहार करें।


#पद : 2.

Bharmar Geet Saar Arth – Ramchandra Shukla in Hindi

कहियौ, नंद कठोर भये।
हम दोउ बीरैं डारि परघरै, मानो थाती सौंपि गये॥
तनक-तनक तैं पालि बड़े किये, बहुतै सुख दिखराये।
गो चारन कों चालत हमारे पीछे कोसक धाये
ये बसुदेव देवकी हमसों कहत आपने जाये।
बहुरि बिधाता जसुमति जू के हमहिं न गोद खिलाये॥
कौन काज यहि राजनगरि कौ, सब सुख सों सुख पाये।
सूरदास, ब्रज समाधान करु, आजु-काल्हि हम आये॥

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01.बीरैभय
02.परघरैदूसरे के घर में
03.थातीअमानत
04.तनक-तनकछोटे-छोटे
05.कोसकएक कोस
06.धायेदौड़े आते थे
07.बहुरिफिर
08.जसुमतियशोदा माता
09.समाधानसांत्वना या तसल्ली
10. आजु-काल्हिआजकल ही

व्याख्या :

श्री कृष्ण उद्धव को समझाते हुए कह रहे हैं कि उद्धव तुम ब्रज जाकर नंद बाबा से कहना है कि वे इतने कठोर क्यों हो गए हैं। वे हम दोनों भाइयों अर्थात् कृष्ण और बलराम को पराये घर अर्थात् मथुरा में इस प्रकार डाल गए हैं, जैसे कोई किसी की अमानत या धरोहर को लौटाकर एकदम निश्चिंत हो जाता है और पुनः उसकी कोई खोज खबर नहीं लेता।

कहने का तात्पर्य यह है कि हम दोनों भाइयों के प्रति अब उनका कोई अनुराग नहीं रह गया है। जब हम छोटे-छोटे थे, तब उन्होंने हमारा पालन-पोषण किया था। हमें पाल-पोस कर उन्होंने अनेक सुख प्रदान किए, परंतु आज ऐसा क्या हो गया है कि वह हमें विस्मरण कर बैठे हैं। जब हम गाये चराने के लिए वन को जाते थे, तब तो वह कोस-कोस भर हमें छोड़ने को पीछे दौड़े आते थे। तब तो उनको हमारे साथ इतना स्नेह था, परंतु अब न जाने क्या हो गया।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या

यहां वासुदेव और देवकी हमें अपना पुत्र कहते हैं। ये लोग हमें ब्रह्म समझ बैठे हैं और कहते हैं कि यशोदा माता ने अपनी गोद में नहीं खिलाया है। श्री कृष्ण आगे कहते हैं कि हमने इस नगर के सभी सुखों को भली प्रकार भोग लिया है।

हमारे लिए यह सुख-भोग सभी व्यर्थ हैं, क्योंकि ब्रज के सुखों की तुलना में यह सभी सुख व्यर्थ हैं। ब्रज के सुखों की तुलना में यह तो थोथे सुख महत्वहीन है, इनका कोई मूल्य नहीं है।

सूरदास जी कहते हैं कि तुम ब्रिज वासियों को हमारी कुशलता के समाचार देना और सांत्वना देते हुए कहना कि हम आजकल में ही वृंदावन आकर उनसे मिलेंगे।

दोस्तों ! संपूर्ण पद में स्मृति नामक संचारी भाव का सुंदर चित्रण हुआ है। वसुदेव देवकी ……पंक्ति में कृष्ण की नवीन नागरिक, परिस्थितियों के प्रति विरक्ति, नंद-यशोदा को वास्तविक माता-पिता समझना, उनका बाल-सुलभ भोलापन आदि विशेषताएं अभिव्यक्त होती है।


#पद : 3.

Bharmar Geet Saar Bhavarth Mool Bhaav – Ramchandra Shukla in Hindi

तबहिं उपंगसुत आय गए।
सखा सखा कछु अंतर नाही भरि-भरि अंक लए।।
अति सुंदर तन स्याम सरीखो देखत हरि पछताने।
एसे को वैसी बुधि होती ब्रज पठवै तब आने।।
या आगे रस-काव्य प्रकासे जोग-वचन प्रगटावै।
सुर ज्ञान दृढ़ याके हिरदय जुवतिन जोग सिखावै।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. उपंगसुतउद्धव
02.अंक लए आलिंगन बद्ध होना
03.सरीखो समान
04.वैसी बुधिरागात्मक चेतना
05.पठवैभेजे
06.आनेअन्य विषय को लेकर
07.रस काव्यप्रेम की कवित्वपूर्ण बातें
08. याके हिरदयइसके हृदय में

व्याख्या :

श्री कृष्ण ब्रज की स्मृतियों में डूबे हुए थे, तभी उद्धव आते हैं। दोनों में शारीरिक रूप से बिल्कुल भी अंतर नहीं दिख रहा था और दोनों परस्पर स्नेहपूर्वक आलिंगनबद्ध हो गए। एक-दूसरे से स्नेहपूर्वक मिलते हैं । उद्धव का शरीर अत्यंत सुंदर और कृष्ण के समान द्वीप्त था। यह देखकर कृष्ण मन ही मन मुस्काए। उन्होंने सोचा कि इनमें शारीरिक सौंदर्य होने के साथ बुद्धि और विवेक भी होता तो कितना अच्छा था।

अर्थात् इनकी बुद्धि ज्ञान पर आधारित न होकर, प्रेममार्गीय भक्ति भावना पर आधारित होती तो उत्तम था। इसलिए उन्होंने उद्धव को किसी अन्य कारण हेतु ब्रज भेजने का निश्चय किया। क्योंकि वहां जाने पर ही उनकी योगमार्गीय बुद्धि का संस्कार होना संभव था और तभी ये प्रेमानुभव भक्ति का भली-भांति परिपालन कर सकेंगे। यह उद्धव तो ऐसे हैं कि यदि उनके सम्मुख प्रेमरसिक्त वाणी सुनाई जाए तो ये योग की नीरस चर्चा करने लगेंगे और इस प्रकार श्रोताओं को उबा देंगे।

इनके ह्रदय में ज्ञान अर्थात् योगमार्गीय आस्था इतनी दृढ है कि यदि इन्हें ब्रज भी भेजा जाए तो ब्रजवासियों को भी योग की शिक्षा-दीक्षा ही देना प्रारंभ कर देंगे, किंतु संभव है कि वहां गोपियों का अनन्य प्रेमानुराग देखकर इनका योग खंडित हो जाए और ये प्रेममार्ग की महत्ता स्वीकार करके उसे अपना ले। दोस्तों ! यह पद भ्रमरगीत की मूल भावना को अभिव्यक्त करता है। कवि का उद्देश्य उद्धव के माध्यम से प्रेमानुराग भक्ति का प्रतिपादन करना है।


इसप्रकार आज हमने Bharmar Geet Saar भ्रमरगीत सार – संपादक रामचंद्र शुक्ल के शुरूआती 03 पदों का अर्थ और व्याख्या को विस्तार से समझा। उम्मीद है कि आपको समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई होगी। अच्छा तो फिर मिलते आगे की व्याख्या को लेकर। तब तक बने रहिये हमारे साथ !

ये भी अच्छे से समझे :


एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Bharmar Geet Saar भ्रमरगीत सार – संपादक रामचंद्र शुक्ल के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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