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Andhere Mein Kavita | ‘अंधेरे में’ कविता की व्याख्या | भाग – 4


Muktibodh Ki Andhere Mein Kavita Ki Vyakhya in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! जैसाकि हम मुक्तिबोध रचित ‘अँधेरे में’ कविता का अध्ययन कर रहे है। इस कविता के अब तक हमने 14 पदों की व्याख्या समझ ली है। आज हम इसके अगले #15-20 पदों की व्याख्या करने जा रहे है :

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Andhere Mein Kavita | ‘अंधेरे में’ कविता की विस्तृत व्याख्या


Muktibodh Krit Andhere Mein Kavita Ki Vistrit Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! गजानन माधव मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ कविता के अगले #15-20 पदों की व्याख्या निम्न प्रकार से है :

#15. व्याख्या :

Muktibodh ki Andhere Mein kavita in Hindi

वह बिठा देता है तुंग शिखर के
ख़तरनाक, खुरदरे कगार-तट पर
शोचनीय स्थिति में ही छोड़ देता मुझको।
कहता है-“पार करो पर्वत-संधि के गह्वर,
रस्सी के पुल पर चलकर
दूर उस शिखर-कगार पर स्वयं ही पहुँचो”

प्रस्तुत पंक्तियों में कवि अपनी चेतना के द्वंद को रूपाकार देने और उसके अनुसार जीवन के निर्माण की इच्छा प्रकट करते हुए कह रहे हैं कि अंतश्चेतना के द्वंदो में मेरा जो विचार रात-दिन मचलता है, वह मुझे विचारों और भावों के उच्चता के शिखरों पर बिठा देता है। अर्थात् उसके अंत: प्रेरणा से मेरे मन व मस्तिष्क में नए-नए प्रकार के उच्च विचार जागृत होने लगते हैं। वे विचार कभी-कभी बहुत ही खुरदरे यानी अटपटे और खतरनाक भी हुआ करते हैं।

इस प्रकार वह मुझे चिंतनीय स्थिति में धकेल देता है। कभी वह कहता है कि पहाड़ियों के संधि स्थलों में विद्यमान गुफाओं के खंडों को पार करो। रस्सी से बने हुए पुल पर चलकर दूर दिखाई देने वाले शिखरों की चोटियों के किनारों तक स्वयं पहुंचों।

कहने का तात्पर्य है कि वह मुझे अनेक प्रकार की विषमताओं, कठिनाइयों को पार कर अपने जीवन के उच्चतम लक्ष्य तक अकेले पहुंचने की प्रेरणा देता है। तुंग शिखर, वैचारिक और सैद्धांतिक उच्चता का प्रतीक है। पर्वत संधि के गह्वर, बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का और मन की दुविधाओं का प्रतीक है। शिखर-कगार, उच्च लक्ष्य का प्रतीक है।


#16. व्याख्या :

Andhere Mein Kavita Ka Arth or Bhaav in Hindi

अरे भाई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों की यात्रा,
मुझे डर लगता है ऊँचाइयों से
बजने दो साँकल!!
उठने दो अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले,
वह जन वैसे ही
आप चला जायेगा आया था जैसा।
खड्डे के अँधेरे में मैं पड़ा रहूँगा
पीड़ाएँ समेटे !!
क्या करूँ क्या नहीं करूँ मुझे बताओ,
इस तम-शून्य में तैरती है जगत्-समीक्षा
की हुई उसकी
(सह नहीं सकता)

तब मैं कह उठता हूं कि नहीं, मुझे शिखरों की यात्रा नहीं करनी है, किसी भी उच्च लक्ष्य को प्राप्त नहीं करना है। मुझे इन ऊंचाइयों से बहुत डर लगता है। अर्थात् ऊंचे लक्ष्यों तक पहुंचने वाले रास्ते अनेक कठिनाइयों से भरे हुए रहते हैं। अतः मुझे चेताने के लिए जो सांकल बज रही है, उसे बजने दो। जीवन के इस अंधेरे में आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाली ध्वनियों के बुलबुले बनने और बिगड़ने दो।

अर्थात् अंत: वैचारिक संघर्ष को निरंतर चलने दो। प्रेरणा देने व चेताने के लिए सांकल बजाने वाला जैसे स्वयं आया था, वैसे ही चला भी जाएगा। मैं जीवन की गहन विषमताओं के खड्डों के अंधकार में अपनी पीड़ाए समेटे ऐसे ही पड़ा रहूंगा। शायद ऐसे ही पड़ा रहना मेरी नियति है।

ओह, अब मैं क्या करूं ? क्या नहीं करूं ? कोई तो मुझे बता दे। मन की इस गहन बर्बरता में संसार की समीक्षा का उलझा हुआ भाव लगातार तैर रहा है। मैं वह सब सह पाने में असमर्थ हूं।


#17. व्याख्या :

Gajanan Madhav Muktibodh Andhere Mein Kavita Saar in Hindi

विवेक-विक्षोभ महान् उसका
तम-अन्तराल में (सह नहीं सकता)
अँधियारे मुझमें द्युति-आकृति-सा
भविष्य का नक्षा दिया हुआ उसका
सह नहीं सकता !!
नहीं, नहीं, उसको छोड़ नहीं सकूँगा,
सहना पड़े–मुझे चाहे जो भले ही।

मेरे भीतर भरे अंधेरे से निपटने के लिए प्रकाश-आकृति के जैसा भविष्य का जो नक्शा दिया है, उसकी अवमानना, उसका बिगड़ता रूप सहन नहीं किया जा सकता। नहीं -नहीं, उस वैचारिक पुरुष को, अपने प्रिय को, मैं किसी भी मूल्य पर त्याग नहीं सकता। मुझे इसके बदले अब कुछ भी सहना पड़े तो मैं सहन करूंगा।

दोस्तों ! कवि की अंतश्चेतना के द्वंद से निखरा निर्णय बहुत ही महत्वपूर्ण है और आकर्षक भी है। उससे कवि की आंतरिक ऊर्जा को रूप मिल गया है।


#18. व्याख्या :

Muktibodh Rachit Andhere Mein Kavita Arth Sahit Vyakhya in Hindi

कमज़ोर घुटनों को बार-बार मसल,
लड़खड़ाता हुआ मैं
उठता हूँ दरवाज़ा खोलने,
चेहरे के रक्त-हीन विचित्र शून्य को गहरे
पोंछता हूँ हाथ से,
अँधेरे के ओर-छोर टटोल-टटोलकर
बढ़ता हूँ आगे,

कवि पुरानी और बेकार मान्यताओं को त्यागने और नवयुग के स्वागत के बारे में अपनी अंतरात्मा की आवाज की प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। वह कहता है कि विषमताओं की मार से कमजोर पड़े अपने घुटनों को मैं बार-बार मसलता हूं अर्थात् उनमें शक्ति लाने का प्रयास करता हूं। लड़खड़ाते कदमों से नए युग के द्वार खोलने के लिए मैं उठता हूं।

कवि कह रहा है कि मैं आगे बढ़ने की चेष्टा करता हूं। मैं रक्तहीन और सूखे पड़े हुए चेहरों को एवं उन पर छाई हुई वातावरण की बर्बरता को, अपने हाथों से ही पोंछने का प्रयास करता हूं तथा मैं अंधेरे में आगे और पीछे टटोलता हुआ आगे बढ़ने की कोशिश करता हूं।


#19. व्याख्या :

Andhere Mein Kavita – Gajanan Madhav Muktibodh

पैरों से महसूस करता हूँ धरती का फैलाव,
हाथों से महसूस करता हूँ दुनिया,
मस्तक अनुभव करता है, आकाश
दिल में तड़पता है अँधेरे का अन्दाज़,
आँखें ये तथ्य को सूँघती-सी लगतीं,
केवल शक्ति है स्पर्श की गहरी।
आत्मा में, भीषण
सत्-चित्-वेदना जल उठी, दहकी।
विचार हो गए विचरण-सहचर।

मैं संपूर्ण धरती पर फैली हुई मानवता के दर्द को महसूस करता हूं। जिस भी दिशा में हाथ बढ़ाता हूं, वही दर्द महसूस करता हूं। साँसों से पूरी दुनिया के दर्द को महसूस करता हूं। मस्तक के ऊपर आकाश का भी मैं अनुभव करता हूं।

मेरा तड़पता हुआ दिल चारों ओर के विषम वातावरण का अनुमान लगाता है। मेरी आंखें भी जीवन के यथार्थ को सूंघने की कोशिश करती है। मेरे पास जीवन के विषम वातावरण के स्पर्श की शक्ति है। मेरी आत्मा में सत्य और नित्य वेदना की आग जलने लगी है। मेरे विचार ही विचारों के साथी बन गए हैं।

अंधेरे का अंदाज, अन्ध परंपराओं, मान्यताओं और अवधारणाओं के फैलाव का परिचायक है। सत्-चित्-वेदना, सहज एवं शाश्वत मानवीकरणों का प्रतीक है।


#20. व्याख्या :

Muktibodh Ki Andhere Mein Kavita Ka Vishleshan in Hindi

बढ़ता हूँ आगे,
चलता हूँ सँभल-सँभलकर,
द्वार टटोलता,
ज़ंग खायी, जमी हुई जबरन
सिटकनी हिलाकर
ज़ोर लगा, दरवाज़ा खोलता
झाँकता हूँ बाहर….

मैं आगे बढ़ता हूं और संभल-संभल कर कदम बढ़ाता हूं। बंद दरवाजे को खोलने के लिए अर्थात् चेतना के प्रकटीकरण के लिए उसे टटोलता हूं। जंग लगी पुरानी मान्यताओं को जबरन तोड़कर नवयुग देखने के लिए झांकता हूं।

दोस्तों ! भाव यह है कि पुरानी और व्यर्थ हो चुकी मान्यताओं, परंपराओं और अवधारणाओं को त्याग कर, जीवन के नव्य परिवेश को देखना-भालना ही कवि के सारे प्रयत्नों का उद्देश्य है। दरवाजा, चेतनाओं के बंद द्वार का प्रतीक है। शून्य के गहरे पद बर्बरकालीन और व्यर्थ हो चुकी प्रवृत्तियों का परिचायक है।

ज़ंग खायी, जमी हुई जबरन सिटकनी व्यर्थ हो चुकी परंपराओं और अंधविश्वासों का प्रतीक है। कवि वास्तव में परंपरागत एवं अंधशोषक परंपराओं को त्याग कर, जीवन और मानवीयता को खुली एवं संवेदनात्मक दृष्टि से देखने की प्रेरणा देता है।


तो ये थी दोस्तों ! Andhere Mein Kavita | ‘अंधेरे में’ कविता के #15-20 पदों की विस्तृत व्याख्या। उम्मीद है कि हमेशा की तरह आज भी आपको समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई होगी। फिर मिलते है अगले नए पदों की व्याख्या लेकर। धन्यवाद !

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एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Andhere Mein Kavita | ‘अंधेरे में’ कविता की व्याख्या | भाग – 4 के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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