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Uttar Kand रामचरितमानस उत्तरकाण्ड चौपाईयां व्याख्या – भाग 14


Ramcharitmanas Uttar Kand Chaupai Path in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! आज के लेख में हम तुलसीदास रचित श्री रामचरितमानस के “उत्तरकाण्ड” के अगले दोहों और चौपाईयों की विस्तृत व्याख्या पढ़ने वाले है। तो चलिये समझते है :

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Uttar Kand रामचरितमानस उत्तरकांड दोहे एवं चौपाईयां


Tulsidas Krit Ramcharitmanas Uttar Kand Chopaiyan Part 14 in Hindi : दोस्तों ! उत्तरकाण्ड के आगामी दोहों एवं चौपाइयों की विस्तृत व्याख्या इस तरह से समझिये :

वानरों और निषाद की विदाई

दोहा :

Tulsidas Rachit Uttar Kand Dohe Path in Hindi

अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव।
प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव।।18 क।।

व्याख्या :

अंगद के नम्र वचन सुनकर करुणा की सीमा प्रभु श्रीरामचंद्र जी ने उन्हें उठाकर छाती से लगा लिया। श्रीराम जी के कमल के समान नेत्रों में जल भर आया।

दोहा :

Tulsidas Rachit Uttar Kand Chopai Path in Hindi

निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ।
बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ।।18 ख।।

व्याख्या :

तब भगवान ने अपने गले की माला, वस्त्र और मणि बाली पुत्र अंगद को पहनाकर बहुत प्रकार से समझा-बुझाकर उनकी विदाई की।

चौपाई :

Uttar Kand Vanro Aur Nishad Ki Vidai Chaupai Path in Hindi

भरत अनुज सौमित्रि समेता। पठवन चले भगत कृत चेता।।
अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा।।1।।

व्याख्या :

भक्तों के उपकार को ध्यान में रखकर भरत, शत्रुघ्न और लक्ष्मण सहित श्रीराम जी उन सब को पहुँचाने चले। अंगद के हृदय में थोड़ा प्रेम नहीं है। वे फिर-फिर श्रीराम जी की ओर देखते है।

चौपाई :

Uttar Kand Ramayan Vyakhya in Hindi

बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा।।
राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी।।2।।

व्याख्या :

अंगद बार-बार प्रणाम करते है। उनके मन में ऐसा आता है कि अब श्रीराम जी मुझे रहने को कहना ही चाहते हैं। श्रीराम जी का कृपापूर्वक देखना, बोलना और हँसकर मिलने की रीति को याद कर-करके वे सोचते हैं।

चौपाई :

Uttar Kand – Ramcharitmanas Chaupai Path in Hindi

प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी। चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी।।
अति आदर सब कपि पहुँचाए। भाइन्ह सहित भरत पुनि आए।।3।।

व्याख्या :

किंतु प्रभु जी की इच्छा समझकर, बहुत प्रकार से विनय के शब्द कहकर, वे सब हृदय में श्रीराम जी के चरण कमलों को रखकर चले। अत्यंत आदर से सब वानरों को पहुँचाकर भाइयों सहित भरत जी वापस आये।

चौपाई :

Ramcharitmanas Uttar Kand Chopai Path Arth Sahit in Hindi

तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना।।
दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा।।4।।

व्याख्या :

सुग्रीव के चरण पकड़कर हनुमान जी ने अनेक प्रकार से विनती की और कहा हे देव ! 10 दिन श्रीराम जी के चरणों की सेवा करके, फिर मैं आकर आपके चरणों के दर्शन करूंगा।

चौपाई :

Uttar Kand Ki Chaupai Vyakhya Bhav Sahit in Hindi

पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा।।
अस कहि कपि सब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनहु हनुमंता।।5।।

व्याख्या :

सुग्रीव ने कहा कि हे पवन कुमार ! आप पुण्य की राशि हो, जाकर कृपा के धाम श्रीराम जी की सेवा करो। सब वानर ऐसा कहकर तुरंत ही चल पड़े। अंगद ने कहा कि हे हनुमान ! सुनो ।

वानरों और निषाद की विदाई

दोहा :

Uttar Kand Ke Dohe Vyakhya Bhav Sahit in Hindi

कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि।
बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि।।19 क।।

व्याख्या :

अंगद कहते हैं कि हे हनुमान जी ! सुनो, मैं आपसे हाथ जोड़कर कहता हूँ कि प्रभु जी से मेरा दंडवत प्रणाम कहना और श्रीरामचंद्र जी को मेरा बार-बार स्मरण दिलाते रहना।

दोहा :

Uttar Kand Vanro Aur Nishad Ki Vidai Dohe Path in Hindi

अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत।
तासु प्रीति प्रभु सन कही मगन भए भगवंत।।19 ख।।

व्याख्या :

ऐसा कहकर अंगद चले गये और हनुमान जी लौट आये। हनुमान जी ने आकर उनकी प्रीति का वर्णन प्रभु जी से किया। सुनकर भगवान श्रीराम जी प्रेम मग्न हो गये।

दोहा :

Ramcharitmanas Uttar Kand Dohe with Meaning in Hindi

कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि।
चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि।।19 ग।।

व्याख्या :

हे गरुड़ ! श्रीराम जी का चित्त, वज्र से भी कठोर और पुष्प से भी कोमल है। अब कहिए, ये किसके समझ में आ सकता है।

चौपाई :

Uttar Kand Vanro Aur Nishad Ki Vidai Chopai Path Arth in Hindi

पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा।।
जाहु भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू।।1।।

व्याख्या :

तब कृपालु श्रीराम जी ने निषाद को बुलाया और उसे भूषण, वस्त्र प्रसाद में दिये और फिर कहा कि अब तुम भी घर जाओ। मेरा स्मरण करते रहना तथा मन, कर्म और वचन से धर्म के अनुसार चलते रहना।

चौपाई :

Uttar Kand Ramayan Chopai Arth Sahit Vyakhya in Hindi

तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता।।
बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी।।2।।

व्याख्या :

श्रीराम जी कहते हैं कि तुम मेरे मित्र हो। भरत के समान भाई हो। अयोध्या में सदा आते-जाते रहना। यह वचन सुनते ही उसे बड़ा ही सुख प्राप्त हुआ। आंखों में जल भरकर वह रामजी के चरणों में गिर पड़ा।

चौपाई :

Tulsidas Krit Uttar Kand Chopai Path in Hindi

चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा।।
रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी।।3।।

व्याख्या :

श्रीराम जी के चरण-कमलों को हृदय में रखकर वह घर आया और उसने अपने कुटुम्बियों को प्रभु जी का स्वभाव सुनाया। अवधपुरवासी श्री रघुपति जी का यह चरित्र देखकर बार-बार कहते हैं कि सुख की राशि प्रभु श्रीराम जी धन्य हैं।

चौपाई :

Uttar Kand Vanro Aur Nishad Ki Vidai Chopai with Meaning in Hindi

राम राज बैठें त्रैलोका। हरषित भए गए सब सोका।
बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई।।4।।

व्याख्या :

श्रीराम जी के राजगद्दी पर बैठने से तीनों लोक हर्षित हो गये और सारे शोक जाते रहे। कोई किसी से बैर नहीं करता। श्रीराम जी के प्रताप से सबकी विषमता अर्थात् भेदभाव मिट गये।

तो इसतरह अब तक हम उत्तरकाण्ड के बहुत से दोहों और चौपाईयों की विस्तृत व्याख्या को समझ चुके है। अगले लेख में फिर से कुछ नयी चौपाईयों के साथ मिलते है।


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एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Uttar Kand रामचरितमानस उत्तरकाण्ड चौपाईयां व्याख्या – भाग 14 के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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