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Ram Ki Shakti Pooja Kavita | राम की शक्ति पूजा के पद (10-12)


नमस्कार दोस्तों ! एक बार फिर से स्वागत है आप सभी का। जैसाकि हम सूर्यकांत त्रिपाठी निराला रचित “Ram Ki Shakti Pooja Kavita | राम की शक्ति पूजा कविता” का अध्ययन कर रहे है। इसके अब तक हम 09 पदों का अध्ययन कर चुके है।

यह कविता आपको अच्छे से समझना बहुत जरूरी है। कविता अधिक महत्वपूर्ण होने के कारण हम इसके लगभग सभी पदों को समझाने की कोशिश करेंगे। अतः धैर्य के साथ बने रहिये हमारे साथ।

इसी क्रम में आज हम राम की शक्ति पूजा के अगले पदों का अध्ययन करने जा रहे है। RPSC द्वारा आयोजित होने वाली कॉलेज लेक्चरर परीक्षा के पाठ्यक्रम में होने के कारण हम इसका विस्तार से अध्ययन कर रहे है। तो चलिए शुरू करते है :

आप सूर्यकांत त्रिपाठी निराला कृत “राम की शक्ति पूजा कविता” का विस्तृत अध्ययन करने के लिए नीचे दी गयी पुस्तकों को खरीद सकते है। ये आपके लिए उपयोगी पुस्तके है। तो अभी Shop Now कीजिये :


Ram Ki Shakti Pooja Kavita | राम की शक्ति पूजा में अब तक


हम सभी जानते है कि त्रिपाठी निराला द्वारा रचित राम की शक्ति पूजा एक लम्बी कविता है। इसमें राम-रावण का युद्ध चल रहा है। श्री राम रावण को बाण नहीं लगा पा रहे है। युद्ध में रावण का साथ स्वयं देवी शक्ति दे रही है। इस वजह से युद्ध अनिर्णायक स्थिति में है।

श्री राम निराश होकर युद्ध से लौटते है और श्वेत शिला पर बैठ जाते है। सभी सेनापति, जाम्बवान, अंगद, विभीषण आदि सभी उनके चारों तरफ बैठे है। श्री राम निराशा में डूबे हुए है। हनुमान जी सेवाभाव से श्री राम के चरणों में बैठे है।

इसी बीच श्री राम की आँखों से दो बूँद आँसुओ की गिरती है। अश्रु-बूंदों को देखकर हनुमान जी बहुत व्याकुल हो उठते है। उनके मन में एक प्रलयकारी स्थिति आ जाती है। और वे सम्पूर्ण आकाश को निगलने को तैयार हो जाते है।

अब इसके आगे क्या होने वाला है ? ये सब जानने के लिए हम इसके अगले पदों का अध्ययन करने जा रहे है। ध्यान से समझने की कोशिश कीजियेगा :



Ram Ki Shakti Pooja Kavita | राम की शक्ति पूजा के पदों की व्याख्या


आज हम इस कविता के आगे के 10 से 12 तक के पदों की विस्तृत व्याख्या करने जा रहे है, जो इसप्रकार है :

पद : 10.

Nirala Krit Ram Ki Shakti Pooja Kavita Ke 10th Pad Ka Bhavarth in Hindi :

रावण-महिमा श्यामा विभावरी, अन्धकार,
यह रूद्र राम-पूजन-प्रताप तेजः प्रसार;
इस ओर शक्ति शिव की जो दशस्कन्ध-पूजित,
उस ओर रूद्र-वन्दन जो रघुनन्दन-कूजित;
करने को ग्रस्त समस्त व्योम कपि बढ़ा अटल,

लख महानाश शिव अचल, हुए क्षण भर चंचल;
श्यामा के पद तल भार धरण हर मन्द्रस्वर

बोले- “सम्बरो, देवि, निज तेज, नहीं वानर
यह, नहीं हुआ श्रृंगार-युग्म-गत, महावीर,
अर्चना राम की मूर्तिमान अक्षय-शरीर,
चिर – ब्रह्मचर्य-रत ये एकादश रूद्र, धन्य,
मर्यादा-पुरूषोत्तम के सर्वोत्तम, अनन्य

लीलासहचर, दिव्यभावधर, इन पर प्रहार
करने पर होगी देवि, तुम्हारी विषम हार;
विद्या का ले आश्रय इस मन को दो प्रबोध,
झुक जायेगा कपि, निश्चय होगा दूर रोध।”

कठिन शब्दार्थ :

क्र. सं.कठिन शब्दअर्थ
1.रावण महिमारावण को महिमावान बनाने वाली
2.श्यामा काली माँ
3.तेजः प्रसारतेज का प्रसार कर रहे थे
4.रघुनन्दन-कूजितराम नाम से गुंजायमान
5.कपि हनुमान जी
6.अटल दृढ निश्चय करके
7.लख देखना
8.हर शंकर जी
9.मन्द्रस्वर मेघ के समान
10.श्रृंगार-युग्म-गत श्रृंगार के जोड़े में
11.अक्षय शरीर अविनाशी
12.मर्यादा पुरुषोत्तमश्री राम
13.आश्रय सहारा
14.प्रबोध चैतन्य

अर्थ :

  • कवि निराला रावण और हनुमान जी की महत्ता एवं शक्ति के बारे में बता रहे है। रावण की महत्ता उसके तमोगुण के कारण थी। और हनुमान जी स्वयं रूद्र (शिवजी) के अवतार थे। जब हनुमान जी को श्री राम के आँसू दिखाई पड़ते है। तब वे सम्पूर्ण आकाश को ही निगल जाने को तत्पर हो गए। क्योंकि वे श्री राम को दुःखी नहीं देख सकते।
  • इस स्थिति को देखकर, भगवान शिवजी ने देवी शक्ति को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने दुर्गा को समझाया कि हनुमान कोई साधारण वानर नहीं है। इनका तेज सह पाना सम्भव नहीं है। दुर्गा के चरणों का बोझ अपने शरीर पर झेलने में सक्षम भोलेनाथ ने गुरु गंभीर स्वर में अपनी शक्ति को समझाया।
  • भोलेनाथ कहते है कि हे देवी ! अपनी प्रचंड शक्ति को समेटो। ये कोई साधारण कपि नहीं है। दाम्पत्य भाव द्वारा श्रृंगार रस कभी भी उनके जीवन में विघटित ही नहीं हुआ। अर्थात् हनुमान आजीवन ब्रह्मचारी है। ये श्री राम की आराधना का ही मूर्त रूप है। ये श्री राम के अनन्य भक्त है। इनका ब्रह्मचर्य अखंड है। ये मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के एकांत दास और भक्ति के उत्कृष्ट भाव को धारण करने वाले है।
  • इन पर प्रहार करने पर आपको पराजय का मुँह देखना पड़ सकता है। अतः आप स्वयं सात्विक ज्ञान और विवेक का आधार लो और स्वयं को सयंत करो। ऐसा करने से हनुमान स्वतः ही विनम्रता से नत हो जायेगा और आपके मार्ग का अवरोध हट जायेगा।

विशेष :

यहाँ रूपक और मानवीकरण अलंकार का प्रयोग हुआ है।



पद : 11.

Nirala Krit Ram Ki Shakti Pooja Kavita Ke 11th Pad Ka Arth in Hindi :

कह हुए मौन शिव; पतन-तनय में भर विस्मय
सहसा नभ से अंजना-रूप का हुआ उदय;

बोली माता – “तुमने रवि को जब लिया निगल
तब नहीं बोध था तुम्हें; रहे बालक केवल,
यह वही भाव कर रहा तुम्हें व्याकुल रह-रह
यह लज्जा की है बात कि माँ रहती सह-सह;

ये महाकाश, है जहाँ वास शिव का निर्मल-
पूजते जिन्हें श्रीराम उसे ग्रसने को चल
क्या नहीं कर रहे तुम अनर्थ? सोचो मन में;

क्या दी आज्ञा ऐसी कुछ श्री रघुनन्दन ने?
तुम सेवक हो, छोड़कर धर्म कर रहे कार्य-
क्या असम्भाव्य हो यह राघव के लिये धार्य?”

कपि हुए नम्र, क्षण में माता छवि हुई लीन,
उतरे धीरे-धीरे गह प्रभुपद हुए दीन।

अर्थ :

  • भगवान शिवजी देवी को यह सब समझाकर मौन हो गए। हनुमान जी आकाश में अपनी माता अंजना को प्रकट होते देख आश्चर्यचकित हो जाते है। अब देवी हनुमान को उसीप्रकार प्रबोधित करती है, जिसप्रकार एक माँ अपने उद्दंड पुत्र को उपदेश देती है। वे हनुमान जी को समझाती है कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं ?
  • वे कहती है कि जब तुमने सूरज को निगला था तब तुम छोटे बालक थे। उस समय तुम्हे ज्ञान का बोध नहीं था। अब भी तुम्हे वहीँ भाव रह-रह कर व्याकुल करता है। ये तुम्हारे लिए शर्म या लज्जा की बात है। और मैं बार-बार तुम्हारी गलती या उद्दंडता को देखकर मौन रह जाती हूँ।
  • यह महाकाश है, जहाँ भगवन शिवजी निवास करते है। श्री राम भी जिन शिवजी की उपासना करते है। तुम उन्हीं शिवजी को निगलने को तैयार हो गए हो। क्या तुम्हारा यह कार्य अन्यायपूर्ण या गलत नहीं है।
  • जरा अपने मन में सोच-विचार तो करो कि तुम मात्र सेवक हो और सेवक का धर्म छोड़कर तुम ये अनुचित कार्य करने चले हो। अर्थात् जो कार्य तुम अपने स्वामी श्री राम की आज्ञा के बिना ही करने जा रहे हो, वह पापपूर्ण है। क्या श्री राम तुम्हारे इस कार्य को स्वीकार करेंगे ?
  • ” कभी नहीं करेंगे। ” ऐसा कहकर माता अंजनी लीन हो गयी। माता अंजना की उपदेशपूर्ण बाते सुनकर हनुमान जी नम्र हो गए और आकाश से धीरे-धीरे नीचे उतर गए। उन्होंने धरती पर आकर सेवक या दीनभाव से स्वयं को श्री राम के चरणों में झुका दिया।

विशेष :

इस पद में स्मरण, सेवाभक्ति, पुनरुक्ति और विषम अलंकारों का प्रयोग हुआ है।



पद : 12.

Nirala Krit Ram Ki Shakti Pooja Kavita Ke 12th Pad Ki Vyakhya in Hindi :

राम का विषण्णानन देखते हुए कुछ क्षण;
“हे सखा” विभीषण बोले “आज प्रसन्न-वदन

वह नहीं देखकर जिसे समग्र वीर-वानर-
भल्लुक विगत-श्रम हो पाते जीवन निर्जर;

रघुवीर, तीर सब वही तूण में हैं रक्षित,
है वही वक्ष, रण-कुशल-हस्त, बल वही अमित;

हैं वही सुमित्रानन्दन मेघनाद-जित् रण,
हैं वही भल्लपति, वानरेन्द्र सुग्रीव प्रमन,
ताराकुमार भी वही महाबल श्वेत धीर,

अर्थ :

  • कवि निराला श्री राम की उदास मनोदशा को अभिव्यक्त कर रहे है। राम का मन शंकाओं और निराशाओं से घिरा हुआ है। वे सोच नहीं पा रहे है कि रावण पर विजय कैसे प्राप्त की जाए। इस वेदना से भरी दशा में जब विभीषण श्री राम के उदास मुख को देखते है, तब उनसे कहने लगते है कि हे सखा ! आज आप इतने उदास और चिंतित क्यों दिखायी दे रहे है ? आज आप पहले की भांति प्रसन्न क्यों नहीं दिख रहे है ?
  • आपके प्रसन्न मुख को देखकर सम्पूर्ण वानर सेना, रीछ सेना एवं सभी लोग परिश्रम की थकान से मुक्ति पाते है। आपके प्रसन्न मुख को देखकर ही तो सभी लोग अपने जीवन को धन्य मानते है।
  • विभीषण कहते है कि श्री राम आपके तूणीर में आज भी दिव्य बाण सुरक्षित है। वे नष्ट नहीं हुये है। जब ऐसा है तो आपके दुःख का कारण क्या है, प्रभु ! कुछ समझ में नहीं आ रहा है। आपका वक्षस्थल भी पहले की भांति आज भी दृढ और विशाल दिखायी दे रहा है। आपके हाथ आज भी वैसे ही रण-कौशल दिखाने वाले है। अर्थात् जब आपका कौशल, आपकी शक्ति, आपका वक्ष और रण-कौशल सुरक्षित है तो फिर आप निराश क्यों हो रहे हो ?
  • युद्धभूमि में मेघनाथ जैसे बलशाली को पराजित करने वाले सुमित्रानंदन लक्ष्मण भी है। जाम्बवान और वानरेन्द्र सुग्रीव भी आपके साथ है। गौरवपूर्ण महाशरीर वाला और धैर्यवान महाबलशाली अंगद भी अभी तक वैसा ही बना हुआ है।


पद-अर्थ : 12 :

अप्रतिभट वही एक अर्बुद-सम महावीर
हैं वही दक्ष सेनानायक है वही समर,
फिर कैसे असमय हुआ उदय यह भाव-प्रहर!

रघुकुल-गौरव लघु हुए जा रहे तुम इस क्षण,
तुम फेर रहे हो पीठ, हो रहा हो जब जय रण।
कितना श्रम हुआ व्यर्थ, आया जब मिलन-समय,
तुम खींच रहे हो हस्त जानकी से निर्दय!

रावण? रावण-लम्पट, खल कल्म्ष-गताचार,
जिसने हित कहते किया मुझे पाद-प्रहार,
बैठा उपवन में देगा दु:ख सीता को फिर,

कहता रण की जय-कथा पारिषद-दल से घिर,
सुनता वसन्त में उपवन में कल-कूजित-पिक
मैं बना किन्तु लंकापति, धिक राघव, धिक्-धिक्?

  • करोडो योद्धाओं के समान हनुमान जी अभी भी बल, विक्रम और साहस आदि में पहले की ही तरह दिखाई दे रहे है। आपके सेनानायक भी पूरी कुशलता के साथ युद्धरत है और युद्ध भी ठीक चल रहा है। तो फिर आपके हृदय में निराशा के भाव का होना समझ में नहीं आता है। आप इतने विचलित क्यों हो रहे है ?
  • जब युद्ध में रावण के सभी योद्धा मारे जा चुके है। और जब रावण अकेला ही बचा हुआ है। तब आप पीठ फेर रहे हो। इतने दिनों तक जो श्रम लगा, उसे व्यर्थ कर रहे हो। जब सीता से मिलने का समय नज़दीक आ रहा है, तब आप अपना हाथ पीछे खींच रहे हो।
  • वह रावण तो लम्पट, पापी है। वह दुष्ट और आचरणविहीन है। जिस रावण का मैं हितोपदेशी हूँ, उसने मुझ पर भरी सभा में पैर से प्रहार किया। ऐसा दुराचारी, अनाचारी रावण फिर से उपवन में बैठकर सीता को दुःख देगा।
  • विभीषण आगे अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहते है कि वो रावण फिर से अपने मंत्रियों की सभा से घिरकर, अपने युद्ध की बातें सुनायेगा। तो क्या, मैं लंकापति ऐसे ही बन जाऊँगा अर्थात् मैं विभीषण लंकापति कैसे बन सकूँगा ?

विशेष :

इस पद में वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।


इसप्रकार दोस्तों ! आज हमने Ram Ki Shakti Pooja Kavita | राम की शक्ति पूजा कविता के आगे के 10 से 12 तक के पदों का विस्तृत अध्ययन किया है। उम्मीद है कि आप इस कविता को समझ पा रहे होंगे। साथ ही पढ़ने में भी आनंद की अनुभूति हो रही होगी। आगे के पदों को लेकर फिर मिलते है, अगले नोट्स में। तब तक बने रहिये हमारे साथ।


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