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Ram Ki Shakti Pooja – Nirala | राम की शक्ति पूजा कविता के पद


दोस्तों! RPSC द्वारा आयोजित कॉलेज लेक्चरर सीरीज में आज हम सूर्यकांत त्रिपाठी निराला द्वारा रचित Ram Ki Shakti Pooja – Nirala | राम की शक्ति पूजा कविता के पदों का अध्ययन कर रहे हैं। पिछले नोट्स में हमने 1 से 4 पदों का अध्ययन किया था। इसी क्रम में आगे बढ़ते हुए आज हम आगे के पदों (5 से 9) का अध्ययन करेंगे।

पिछले नोट्स में हमने पढ़ा था कि राम-रावण का युद्ध चल रहा है, जिसमें रावण का साथ देवी शक्ति दे रही थी। जिससे राम के बाण अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर रहे थे। अर्थात् रावण को कोई बाण नहीं लग रहा था और इससे युद्ध एक निर्णायक स्थिति में पहुंच गया है। श्री राम का कमल समान मुख झुका हुआ है और चिंतित स्थिति में वे श्वेत शिला पर एकटक दृष्टि लगाए बैठे हुए है।

सुग्रीव, विभीषण, अंगद, हनुमान, जाम्बवान आदि सभी श्री राम को घेर कर बैठे हैं और उनके कमल रूपी मुख को देख रहे हैं। यहां तक हमने पिछले नोट्स में पढ़ा था। इसके बाद आगे क्या हुआ? इसका अध्ययन हम आगे के पदों में करने जा रहे है :

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Ram Ki Shakti Pooja – Nirala | राम की शक्ति पूजा के पदों की व्याख्या


दोस्तों ! सूर्यकांत त्रिपाठी निराला कृत “राम की शक्ति पूजा कविता” के अगले 05 से 09 तक के पदों की विस्तृत व्याख्या और अर्थ इस प्रकार है : Ram Ki Shakti Pooja Kavita Ke 5 to 9 Pado Ki Vyakhya :

पद : 5.

है अमानिशा, उगलता गगन घन अन्धकार,
खो रहा दिशा का ज्ञान, स्तब्ध है पवन-चार,

अप्रतिहत गरज रहा पीछे अम्बुधि विशाल,
भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल।

स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर-फिर संशय
रह-रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय,

जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपु-दम्य-श्रान्त,
एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रान्त,
कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार-बार,
असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार-हार।

अर्थ :

  • अमावस्या की रात है और आकाश में घोर अंधकार छाया हुआ है। इतना गहरा अंधकार छाया है कि दिशाओं का भी ज्ञान नहीं रहा है। वायु भी आज नहीं चल रही है।
  • श्री राम श्वेत शिला पर बैठे हैं। उनके पीछे समंदर भी लगातार गर्जना कर रहा है। ऐसा लग रहा है, जैसे कोई विशाल पर्वत ध्यान में मग्न हो और केवल मशाल जल रही हो। अर्थात् राम के हृदय में निराशा रूपी अंधकार छाया है और रावण विशाल समंदर की तरह गरज रहा है। चारों तरफ अंधकार है, परंतु श्रीराम के ह्रदय में आशा रूपी मशाल जल रही है।
  • ऐसे स्थिर एवं धीर श्री राम को कुछ ऐसा संशय है, जो बार-बार हिला रहा है। संपूर्ण वातावरण में रावण की विजय का संशय रह-रह कर श्री राम के मन में आ रहा है।
  • जो राम का हृदय आज तक अनेक शत्रुओं का दमन करने पर भी थका नहीं है। चाहे दस हजार लोग हो या लाख शत्रुओं से सामना हुआ हो, पर आज तक श्री राम का हृदय भय से व्याप्त नहीं हुआ। लेकिन कल के युद्ध में लड़ने के लिए वह बार-बार व्याकुल हो रहा है। उनके मन में संशय हो रहा है कि कहीं कल युद्ध में हार ना जाए।


पद : 6.

Ram Ki Shakti Pooja Kavita Ke Pado Ka Bhaav in Hindi :

ऐसे क्षण अन्धकार घन में जैसे विद्युत
जागी पृथ्वी तनया कुमारिका छवि अच्युत
देखते हुए निष्पलक, याद आया उपवन
विदेह का, प्रथम स्नेह का लतान्तराल मिलन
नयनों का नयनों से गोपन प्रिय सम्भाषण

पलकों का नव पलकों पर प्रथमोत्थान-पतन,
काँपते हुए किसलय, झरते पराग समुदय,
गाते खग नव-जीवन परिचय, तरू मलय-वलय,

ज्योतिः प्रपात स्वर्गीय, ज्ञात छवि प्रथम स्वीय,
जानकी-नयन-कमनीय प्रथम कम्पन तुरीय।

अर्थ :

  • ऐसे क्षण में श्री राम के मन में सीता की छवि जागृत होती है। श्री राम एकटक दृष्टि लगाए हुए है और उन्हें राजा जनक का वो उपवन याद आता है। जब पहली बार श्री राम ने जनक वाटिका में सीता जी को देखा था। लताओं के अंतराल में दोनों का मिलन हो रहा था। राम और सीता जी का नयनों का नयनों से गोपनीय संभाषण अर्थात् मुँह से कुछ नहीं बोलकर आँखों ही आँखों में बात होती थी।
  • स्थिति ऐसी हो गई कि सीता जी के कांपते होठों की लालिमा ऐसी लग रही है, जैसे पराग का समूह ही झर रहा हो। वातावरण ऐसा था कि पक्षी कोलाहल कर रहे थे। ऐसा लगता है, जैसे श्री राम का किसी नए जीवन से परिचय हुआ हो।
  • वृक्ष फूल-पत्तियों से आच्छादित हैं। सीता जी के नयन श्री राम के मुख पर ऐसे रुक गए कि उन्हें किसी और चीज का ध्यान ही नहीं रहा। वे ऐसी स्थिति में पहुँच गयी कि पलक झपकाना ही भूल गयी। ऐसी स्थिति में श्री राम को पहली बार अपनी सुंदर छवि का ज्ञान होता है।

विशेष :

  • इसमें विरोधाभास अलंकार है।
  • यहाँ श्रृंगार रस प्रयुक्त हुआ है।

पद : 7.

Ram Ki Shakti Pooja 05 to 09 Pado Ka Arth Bhavarth in Hindi :

सिहरा तन, क्षण-भर भूला मन, लहरा समस्त,
हर धनुर्भंग को पुनर्वार ज्यों उठा हस्त,
फूटी स्मिति सीता ध्यान-लीन राम के अधर,

फिर विश्व-विजय-भावना हृदय में आयी भर,
वे आये याद दिव्य शर अगणित मन्त्रपूत,
फड़का पर नभ को उड़े सकल ज्यों देवदूत,
देखते राम, जल रहे शलभ ज्यों रजनीचर,
ताड़का, सुबाहु, बिराध, शिरस्त्रय, दूषण, खर;

फिर देखी भीम मूर्ति आज रण देखी जो
आच्छादित किये हुए सम्मुख समग्र नभ को,
ज्योतिर्मय अस्त्र सकल बुझ-बुझ कर हुए क्षीण,
पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए लीन;

लख शंकाकुल हो गये अतुल बल शेष शयन,
खिंच गये दृगों में सीता के राममय नयन;
फिर सुना हँस रहा अट्टहास रावण खलखल,
भावित नयनों से सजल गिरे दो मुक्तादल।


अर्थ :

  • सीता जी को याद करते ही उनका शरीर सिहर उठता है। उनके मन में कई प्रकार की लहरें उठ रही है। श्री राम को वह साहस याद आया, जब ऐसी सीता को देखकर उन्होंने धनुष को तोड़ दिया था। उसी प्रकार उनके हाथ उसी साहस के साथ पुनः खड़े हो गए। सीता की याद में फिर उनके होठों पर एक मीठी सी मुस्कान फैल गई।
  • जब सीता की छवि उन्हें याद आई तो विश्व-विजय की भावना उनके मन में भर गई। वे एक सकारात्मक भाव से भर गए कि संपूर्ण संसार को ही वह जीत लेंगे। अनगिनत बाण जो मंत्रों से अभिभूत थे, उन्हें वे बाण याद आ गए। ये बाण किसी देवदूत की तरह आकाश में फड़फड़ा रहे थे। श्री राम देख रहे है कि सभी राक्षस एक पतंगे की तरह रण में जल रहे हैं ।
  • उसी क्षण वह दैवीय शक्ति दिखाई देती है। जैसे संपूर्ण आकाश में वह शक्ति फैली है और वह एक भी बाण रावण तक नहीं पहुंचने देती है। उस शक्ति के गर्भ में जाकर श्री राम के प्रकाशमय अस्त्र-शस्त्र बुझ-बुझ कर क्षीण हो रहे थे।
  • ऐसा देखकर श्री राम भी शंका से भर गए। तभी श्री राम की आंखों में सीता जी के वे नयन छा गए, जिनमें केवल श्री राम ही बसे हैं। ऐसी छवि श्री राम को याद आती है। फिर वे सुनते है कि रावण अट्टहास करके खल-खल हँस कर रहा है। तभी राम की आंखों से दो आंसू रुपी मोती गिरते हैं।


पद : 8.

Suryakant Tripathi Nirala Krit Ram Ki Shakti Pooja Kavita in Hindi :

बैठे मारुति देखते राम-चरणारविन्द,
युग ‘अस्ति-नास्ति’ के एक रूप, गुण-गण-अनिन्द्य;

साधना-मध्य भी साम्य-वाम-कर दक्षिणपद,
दक्षिण-कर-तल पर वाम चरण, कपिवर गद् गद्
पा सत्य सच्चिदानन्द रूप, विश्राम-धाम,
जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम-नाम।

युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल,
देखा कपि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल;
ये नहीं चरण राम के, बने श्यामा के शुभ,
सोहते मध्य में हीरक युग या दो कौस्तुभ;

टूटा वह तार ध्यान का, स्थिर मन हुआ विकल,
सन्दिग्ध भाव की उठी दृष्टि, देखा अविकल
बैठे वे वहीं कमल-लोचन, पर सजल नयन,
व्याकुल-व्याकुल कुछ चिर-प्रफुल्ल मुख निश्चेतन।

अर्थ :

  • श्री राम के आंसुओं का ध्यान होते ही, उनकी सेवा में रत हनुमान जी के मन की स्थिति का निराला ने मार्मिक चित्रण किया है। हनुमान जी का भक्ति एवं श्री राम के अनन्य सेवक वाला रूप, यहां स्पष्ट दिखाई दे रहा है। श्री राम के चरणों पर दृष्टि लगाए हनुमान जी बैठे हैं। श्री राम के चरणों में उनको नास्ति विषयक, सगुण-निर्गुण सभी का साकार रूप दिखाई दे रहा है।
  • हनुमान जी सेवा-साधना में रत थे। फिर भी वे दाहिने चरण पर बायाँ हाथ और बायें चरण पर दाहिना हाथ रखे हुए थे। हनुमान जी इस प्रकार सेवा-साधना करके कृतज्ञता का अनुभव भी कर रहे थे। सत-चित-आनंद के एकमात्र आधार श्री राम के नाम को भक्ति-पूर्वक जपते हुए, अपनी चेतना को विभाजित किए हुए थे।
  • जब वे दोनों अश्रु-बिंदु श्री राम के नेत्रों से निकलकर उन पर गिरे तो हनुमान जी की दृष्टि उन पर पड़ी। उन्हें ऐसा लगा जैसे चरण रूपी आकाश में दो तारे चमक उठे हो। हनुमान जी ने कल्पना की कि वे चरण श्री राम के नहीं “कालिका माता” के हैं। इन चरणों में दो हीरे सुशोभित हैं।
  • अचानक उनका ध्यान टूटा। उन्होंने संशयालु नेत्रों को ऊपर उठाकर देखा तो वहां कालिका नहीं, उनके आराध्य भगवान श्री राम ही विद्यमान थे। उनके कमल रूपी नेत्र आंसुओं से भीगे हुए थे। और उनका सदैव हर्षोल्लास से युक्त मुख-मंडल कुछ कुम्हलाया हुआ सा लग रहा था।


पद : 9.

Nirala Rachit Ram Ki Shakti Pooja Kavita Bhaav in Hindi :

“ये अश्रु राम के” आते ही मन में विचार,
उद्वेल हो उठा शक्ति-खेल-सागर अपार,
हो श्वसित पवन-उनचास, पिता पक्ष से तुमुल

एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प को उड़ा अतुल,
शत घूर्णावर्त, तरंग-भंग, उठते पहाड़,
जलराशि राशिजल पर चढ़ता खाता पछाड़,

तोड़ता बन्ध-प्रतिसन्ध धरा हो स्फीत वक्ष
दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष,
शत-वायु-वेग-बल, डूबा अतल में देश-भाव,
जलराशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव

वज्रांग तेजघन बना पवन को, महाकाश
पहुँचा, एकादश रूद्र क्षुब्ध कर अट्टहास।

अर्थ :

  • श्री राम के निराशा पूर्ण आंसुओं को देखकर हनुमान जी पर हुई मानसिक प्रतिक्रिया का चित्रण करते हुए निराला कह रहे हैं कि “यह आंसू श्री राम के हैं “ऐसा विचार मन में आते ही हनुमान जी बहुत व्याकुल हो उठे। पिता पवन देव की प्रेरणा से बाह्य जगत में भी उनचासों प्रकार के सभी रण डोल उठे।
  • ऐसा लग रहा था जैसे वाष्प के समान सबको उड़ा ले जाएगी। सैकड़ों भँवरे उठने लगे हैं। समुद्री तरंग भंग होकर उठ रही है और ऐसा लग रहा है कि समुद्र की लहरें ज्वार-भाटा की स्थिति में पछाड़ खा रही हैं।
  • मानो आज पूरी धरती में दरारे पड़ जायेगी। आज समंदर की सीमाएं टूट गई है और पृथ्वी में दरारे ही दरारे आ जाती है। ऐसा लगता है कि हनुमान जी का वक्षस्थल तेज से भर गया है और फूट पड़ेगा। प्रतीत होता है कि पूरी हवा का जो महान शोर है, वो संपूर्ण जल राशि में व्याप्त हो रहा है।
  • ग्यारहवें रूद्र अवतार के रूप में हनुमान जी को माना जाता है। चारों तरफ से भयंकर प्रलयकारी तूफान दिखाई दे रहा है। ऐसी स्थिति हनुमान जी के मन की हो रही है। यह देखकर कि मेरे होते हुए मेरे स्वामी श्री राम की आंखों में आंसू है। ये भाव जब उनके मन में आते हैं तो वे प्रलय मचाने के लिए तैयार हो जाते हैं। तब सृष्टि में प्रलय की स्थिति बन जाती है। श्रीराम के आंसुओं को देखकर ऐसा भाव हनुमान जी के मन में आ रहा है।

विशेष :

  • यहाँ रौद्र रस प्रयुक्त हुआ है।

अंतिम शब्द :

इसप्रकार दोस्तों ! आज हमने Ram Ki Shakti Pooja – Nirala | राम की शक्ति पूजा कविता के 05 से 09 तक के पदों को समझ लिया है। आपको पढ़कर अच्छा जरूर लगा होगा। आप इन महत्वपूर्ण पदों को बार-बार पढ़िए और अपने जहन में उतारने की कोशिश कीजिये।

ये भी अच्छे से समझे :


एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Ram Ki Shakti Pooja – Nirala | राम की शक्ति पूजा कविता के पद के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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