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Ram Ki Shakti Puja Pad | राम की शक्ति पूजा के पद (20-23)


दोस्तों! आज हम कॉलेज लेक्चरर के पाठ्यक्रम में लगी कविता Ram Ki Shakti Puja Pad | राम की शक्ति पूजा के अंतिम पदों का अध्ययन करने जा रहे है। अब तक हमने कुल 19 पदों का अध्ययन कर लिया है। उम्मीद है कि आपको अच्छे से समझ में आ गए होंगे। इसी क्रम में अगले और अंतिम 20 से 23 पदों की व्याख्या करने जा रहे है :

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Ram Ki Shakti Puja Pad | राम की शक्ति पूजा में अब तक :

सूर्यकांत त्रिपाठी निराला कृत “राम की शक्ति पूजा” एक लंबी कविता है। इसमें राम रावण का युद्ध चल रहा है। रावण का साथ स्वयं महाशक्ति देती है, जिससे राम रावण पर विजय प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं। युद्ध अनिर्णायक स्थिति में रहता है। इस कारण श्री राम बहुत अधिक उदास हो जाते हैं।

और सीता की चिंता करते हैं कि सीता को रावण से मुक्त कैसे किया जाये ? ऐसे में जामवंत श्री राम को सुझाव देते हैं कि उन्हें भी महाशक्ति की आराधना करनी चाहिए। ताकि महाशक्ति प्रसन्न होकर उनका साथ दे सके।

श्री राम महा शक्ति की आराधना करने के लिए सामग्री जुटाते हैं। और हनुमान जी को 108 नीलकमल लाने को कहते हैं। अब आगे हम इसके अंतिम पदों का अध्ययन करेंगे, जो परीक्षा की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं :



Ram Ki Shakti Puja| राम की शक्ति पूजा के अंतिम पदों की व्याख्या


दोस्तों ! अब हम Ram Ki Shakti Puja Pad | राम की शक्ति पूजा के अंतिम 20 से 23 तक के पदों की विस्तृत व्याख्या करने जा रहे है। आप इन्हें ध्यान से समझने की कोशिश कीजियेगा :

पद : 20.

Ram Ki Shakti Pooja Kavita Ke 20 to 23 Pado Ki Vyakhya in Hindi

निशि हुई विगतः नभ के ललाट पर प्रथम किरण
फूटी रघुनन्दन के दृग महिमा ज्योति हिरण।

अर्थ :

  • निराला द्वारा रचित “राम की शक्ति पूजा” कविता में निराला कह रहे हैं कि अमावस्या के अंधकार में रात व्यतीत हुई। अर्थात् श्री राम के मन में जो निराशा और अवसाद का भाग था, वह अब समाप्त हो चुका है। श्री राम की आंखों में विश्वास और आत्म गौरव के प्रकाश का आभास हो रहा है । ठीक वैसे ही जैसे, आकाश के विशाल मस्तक पर सूर्य की प्रथम किरण ने प्रकाश का तिलक लगा दिया हो। श्री राम महाशक्ति की आराधना में लीन हैं।

हैं नहीं शरासन आज हस्त तूणीर स्कन्ध
वह नहीं सोहता निविड़-जटा-दृढ़-मुकुट-बन्ध,
सुन पड़ता सिंहनाद,-रण कोलाहल अपार,
उमड़ता नहीं मन, स्तब्ध सुधी हैं ध्यान धार,

अर्थ :

  • आज उनका वेश वीर जैसा नहीं है। आज उनके हाथों में ना तो धनुष है, ना ही तुणीर है। युद्ध में जाने से पहले जिन जटाओं का मुकुट वह बांधा करते थे, वह भी आज बंधा हुआ नहीं है। जो युद्ध का कोलाहल होता है, उसे सुनकर भी वह व्यग्र नहीं होते। श्री राम महाशक्ति का ध्यान करते हुए निश्चल रूप में विराजमान है।

पूजोपरान्त जपते दुर्गा, दशभुजा नाम,
मन करते हुए मनन नामों के गुणग्राम,
बीता वह दिवस, हुआ मन स्थिर इष्ट के चरण
गहन-से-गहनतर होने लगा समाराधन।

अर्थ :

  • श्री राम शक्ति के 10 भुजाओं वाले रूप की मन ही मन कल्पना करते हुए उनका कीर्तन कर रहे हैं। मन ही मन में महाशक्ति के अनंत गुणों का गान करते हैं।


पद : 21.

Ram Ki Shakti Pooja kavita ke 20-23 pado ka bhaav Saar in Hindi

इस पद में निराला जी कह रहे हैं कि श्री राम शक्ति की पूजा के लिए साधनारत है। वे रावण पर विजय प्राप्त करना चाहते हैं, इसलिए वे महाशक्ति की पूजा करते हैं। वे 108 नीलकमल चढ़ाकर पूजा करना चाहते हैं।

यह अन्तिम जप, ध्यान में देखते चरण युगल
राम ने बढ़ाया कर लेने को नीलकमल।
कुछ लगा न हाथ, हुआ सहसा स्थिर मन चंचल,

अर्थ :

  • वे एक-एक कमल चढ़ाते जा रहे थे। किंतु जब अंतिम बार वे कमल चढ़ाने के लिए हाथ बढ़ाते हैं, तब उस एक कमल पुष्प की चोरी हो गई। दुर्गा ने उसे चुरा लिया। राम का हाथ खाली रह गया और उनके हाथ कुछ नहीं लगा।
  • इसी स्थिति को कवि ने इस पद में चित्रित किया है। श्री राम सोचते हैं कि अब मेरी साधना का अंतिम जप और रह गया है। आंखें बंद किए ध्यान अवस्था में दुर्गा के चरणों में झुकते है। और अंतिम नीलकमल को चढ़ाने के लिए लेने को हाथ बढ़ाते है। लेकिन उनके हाथ में कुछ भी नहीं आता। उनका पूजा में लीन चित्त पुनः विचलित होने लगता है।

ध्यान की भूमि से उतरे, खोले पलक विमल।
देखा, वह रिक्त स्थान, यह जप का पूर्ण समय,
आसन छोड़ना असिद्धि, भर गये नयनद्वय,

अर्थ :

  • कमल के पुष्प को किसने उठा लिया ? अब दूसरा कमल का पुष्प कहाँ से लाये ? जप का समय भी पूर्ण होने वाला है। यदि पीठ पर से हटते हैं तो सिद्धि प्राप्त नहीं होगी। महाशक्ति रुष्ठ हो जाएगी। उन्होंने अपने निष्पाप नेत्रों को कुछ देर खोल लिया।
  • उन्होंने देखा कि जहां वह कमल पुष्प था, वह जगह खाली है। यदि साधना खंडित होती है तो उल्टे साधक का ही अनर्थ कर देती है। ऐसा सोचते-सोचते राम के नेत्रों में आंसू छलक पड़े।

“धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध,
धिक् साधन जिसके लिए सदा ही किया शोध
जानकी! हाय उद्धार प्रिया का हो न सका,
वह एक और मन रहा राम का जो न थका,
जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय,
कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय,

अर्थ :

  • ऐसा सोचकर वह मन ही मन कहने लगे। धिक्कार है मेरे इस जीवन को ! जो आज तक सभी का विरोध सहन करता आया। उन समस्त साधनों को धिक्कार है, जिनके लिए मैं सदा खोज करता हूं।
  • अर्थात् जीवन साधनों की खोज में ही पूरा हो गया। सिद्धि आज तक प्राप्त नहीं हो सकी। मैंने अपनी प्रिया जानकी को भी सदा दु:ख के अलावा कुछ नहीं दिया। जब वे शत्रु के हाथों में थी तो भी मैं उन्हें छुड़ा पाने में असमर्थ रहा हूं।
  • अर्थात् राम को अपने पिछले दिनों में असफलता, विरोध, अभाव के अलावा कुछ नहीं मिला। इसलिए वे दुखी हो रहे थे। राम का मन उदास था। आत्मग्लानि और अवसाद से भी भरा हुआ था। जिसमें कभी भी अभाव, कलेश और दीनता जैसे भाव उत्पन्न नहीं हुये थे। आज राम का मन अवसाद से भर उठा।

विशेष :

  • लोकोक्ति और रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है।


पद : 22.

Ram Ravan Yudh Pad 20 to 23 in Ram Shakti Puja in Hindi

यह पद राम की शक्ति पूजा कविता के अंतिम भाग से अवतरित है। यह वह स्थल है, जब श्री राम दुर्गा के पुष्प चुरा ले जाने पर विषाद से भर गये थे। थोड़ी देर के लिए हताश हो जाते हैं। किंतु उनका मन सदैव अपराजित रहा और प्रबल हो उठा। जैसे ही राम के मन में आत्मविश्वास की भावना जागृत हुई, वैसे ही उनकी चेतना पर पड़े हुए माया के सभी आवरण हटने लगे।

बुद्धि के दुर्ग पहुँचा विद्युतगति हतचेतन
राम में जगी स्मृति हुए सजग पा भाव प्रमन।

अर्थ :

  • इसी के बारे में कवि निराला कह रहे हैं कि संकट से, चेतना से रहित हुए राम के मन ने बुद्धि का आश्रय लिया। जैसे बादलों में बिजली का प्रकाश कौंधता है, वैसे ही उन्हें एक उपाय सूझा। उन्हें अपने बचपन की घटनाओं की स्मृति होने लगी।

“यह है उपाय”, कह उठे राम ज्यों मन्द्रित घन-
“कहती थीं माता मुझे सदा राजीवनयन।
दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण
पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।”

अर्थ :

  • श्री राम फिर स्वतः ही बोल उठे। एक उपाय है, जिससे मैं खोये हुये कमल पुष्प की कमी पूरी कर सकता हूं। माता मुझे शैशवावस्था में राजीव नयन कहकर पुकारा करती थी। वे दोनों ही नीलकमल मेरे पास सुरक्षित है। इनमें से एक को महाशक्ति को अर्पित करके अपनी अधूरी साधना को पूरी करूंगा। अतः हे माता ! उनमें से एक कमल को स्वीकार कर लो।

कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर रहा झलक,
ले लिया हस्त, लक-लक करता वह महाफलक।
ले अस्त्र वाम पर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन
अर्पित करने को उद्यत हो गये सुमन

अर्थ :

  • यह कहकर राम ने अपनी तुणीर की ओर देखा, जिसमें ब्रह्म बाण रखा हुआ था। वह ब्रह्म बाण ब्रह्म मंत्रों से अभिषित था। उस बाण की धार अत्यंत तेज और प्रशस्त थी। उन्होंने बायें हाथ से बाण को थाम लिया और दाहिने हाथ से दायीं ओर के नेत्र को समर्पित करने के लिए प्रस्तुत हो गये।

जिस क्षण बँध गया बेधने को दृग दृढ़ निश्चय,
काँपा ब्रह्माण्ड, हुआ देवी का त्वरित उदय-

अर्थ :

  • जैसे ही उन्होंने अपना दक्षिण नेत्र निकालकर देवी के चरणों मे निवेदित करने का संकल्प किया, वैसे ही उनके संकल्प की दृढ़ता को देखकर संपूर्ण ब्रह्मांड आश्चर्य और भय से कम्पित हो गया। महाशक्ति से यह सब देखा नहीं गया और तुरंत ही पूजा की वेदी पर राम के सामने प्रकट हो गई।

“साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम!”
कह, लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।

अर्थ :

  • जब श्रीराम ने महाशक्ति के चरणों में समर्पित करने के लिए अपने दायें नेत्र को निकालने का संकल्प किया तो देवी ने प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और कहा कि है धैर्यवान साधक राम! तुम्हारा कल्याण हो।
  • तुमने धैर्य और धर्म रूपी धन को धारण करके स्वयं को धन्यवाद का पात्र बना लिया। ऐसा कहते हुए महाशक्ति दुर्गा ने राम का हाथ पकड़ लिया, जो कि ब्रह्म बाण से अपने दायें नेत्र को निकालने के लिए उन्होंने उठा रखा था।

विशेष :

  • इस पद में रूपक, उपमा, श्लेष, पुनरुक्ति एवं स्वभावोक्ति अलंकारों का प्रयोग हुआ है।


पद : 23.

Suryakant Tripathi Nirala Krit Ram Ki Shakti Pooja Kavita 20-23 Pad Bhavarth in Hindi

राम की शक्ति पूजा का यह अंतिम पद्यांश है। जहां एक ओर श्री राम की विजय को सुनिश्चित करा देता है और कृति को सुखांत बना देता है। तभी निराला ने देवी शक्ति के प्रत्यक्ष दर्शन कराकर अपनी इस कृति को सार्थकता प्रदान की है।

यहां निराला दुर्गा माँ के व्यक्तित्व को निरूपित कर रहे हैं। और साथ ही साथ यह भी बतला रहे हैं कि श्री राम अवतारी पुरुष हैं। उन्होंने दुर्गा की आराधना करके स्वयं ही विजय का आशीर्वाद प्राप्त कर लिया है।

देखा राम ने, सामने श्री दुर्गा, भास्वर
वामपद असुर-स्कन्ध पर, रहा दक्षिण हरि पर।
ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र सज्जित,
मन्द स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित

अर्थ :

  • कवि निराला कह रहे हैं कि राम ने प्रत्यक्ष देखा कि स्वतः प्रकाशित दुर्गा अपना बायां चरण महिषासुर के कंधे पर रखे हुये थी और दाहिने चरण को सिंह पर टिकाये खड़ी थी। उनका रूप दिव्य आलोकमय था। उनके दसों हाथों में अनेक अस्त्र सुशोभित थे। मुख पर मंद मुस्कान थी। उनके इस रूप को देखकर संपूर्ण जगत की लक्ष्मी भी लजा सकती है।

हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,
दक्षिण गणेश, कार्तिक बायें रणरंग राग,
मस्तक पर शंकर! पदपद्मों पर श्रद्धाभर
श्री राघव हुए प्रणत मन्द स्वर वन्दन कर।

अर्थ :

  • उनके दायीं ओर लक्ष्मी जी और बायीं ओर शारदा जी शोभायमान थी। दक्षिण पार्श्व में गणेश जी विराजमान थे। बायें पार्श्व में युद्धोत्सव में अनुरक्त रहने वाले स्वामी कार्तिकेय जी सुशोभित थे। और उनके सिर पर भोलेनाथ विराजमान थे। श्रद्धा से श्री राम जी ने उनके चरणों में प्रणाम किया।

होगी जय, होगी जय, हे पुरूषोत्तम नवीन।”
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन।”

अर्थ :

  • महाशक्ति ने राम को आशीर्वाद देते हुये कहा कि राम तुम्हारी सदैव विजय होगी। ऐसा कहते हुये शक्ति की साकार एवं सजीव प्रतिमा – जगदम्बा दुर्गा जी राम के मुख में समा गई।


तो ये लीजिये दोस्तों ! आज हमने Ram Ki Shakti Puja Pad | राम की शक्ति पूजा कविता के सम्पूर्ण पदों को विस्तार से समझा दिया है। उम्मीद करते है कि आपको हमारा ये प्रयास अच्छा तो जरूर लगा होगा।

आप इन सभी पदों को बार-बार दोहराये ताकि आपको परीक्षा में मदद मिल सके। ये कविता बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसीलिए हमने इसके सभी पदों को समझाने का प्रयास किया है। अच्छा तो फिर मिलते है, किसी नये टॉपिक के साथ।

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