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Nirala Krit Ram Ki Shakti Pooja | राम की शक्ति पूजा के पद (16-19)


Nirala Krit Ram Ki Shakti Pooja 16-19 Pad in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! जैसाकि हम सूर्यकांत त्रिपाठी निराला कृत राम की शक्ति पूजा कविता का अध्ययन कर रहे है। इसी क्रम में आज हम इसके अगले 16 से 19 तक के पदों की व्याख्या करने जा रहे है। अब तक हम इसके कुल 15 पदों को विस्तार से समझ चुके है। तो चलिए शुरू करते है :

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Ram Ki Shakti Pooja | राम की शक्ति पूजा के पदों की व्याख्या (16-19)


दोस्तों ! आज के नोट्स में हम Nirala Krit Ram Ki Shakti Pooja | राम की शक्ति पूजा के अगले 16 से 19 तक के पदों की विस्तार से व्याख्या करने जा रहे है :

पद : 16.

Ram Ki Shakti Pooja Kavita Ke 16 to 19 Pado Ki Vyakhya in Hindi

विचलित लख कपिदल क्रुद्ध, युद्ध को मैं ज्यों-ज्यों,
झक-झक झलकती वहिन वामा के दृग त्यों-त्यों;

पश्चात्, देखने लगीं मुझे बँध गए हस्त,
फिर खिंचा न धनु, मुक्त ज्यों बँधा मैं, हुआ त्रस्त!”

अर्थ :

  • कवि निराला श्री राम के माध्यम से कह रहे हैं कि युद्ध में वानर सेना अपना धैर्य खो चुकी थी। उन्हें देखकर मैं जैसे-जैसे क्रुद्ध होकर प्रहार करने के लिए उद्धत होता था, वैसे ही मुझे महाशक्ति के नेत्रों में जलती ज्वाला दिखाई देती थी। ये ज्वाला उनके प्रतिशोध की परिचायक थी।
  • फिर महाशक्ति ने अपनी दृष्टि मुझ पर जमा दी। इससे मेरे हाथ बंध गए गये और धनुष की प्रत्यंचा फिर मुझसे खिच ही नहीं पायी। स्वतंत्र होने के बाद भी, मैं खुद को बंधा हुआ महसूस करने लगा।

कह हुए भानु-कुल-भूषण वहाँ मौन क्षण भर,
बोले विश्वस्त कण्ठ से जाम्बवान, “रघुवर,
विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण,
हे पुरुषसिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण,
आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर,

अर्थ :

  • इतना कहकर श्री राम क्षण भर के लिए मौन हो गये। श्री राम के मौन हो जाने के बाद, जामवंत आत्मविश्वास से भरे शब्दों में राम से कहते हैं कि हे राम ! मैं अस्थिर और व्याकुल होने का कोई कारण इसमें नहीं देखता हूँ। उसी महाशक्ति का तुम भी ध्यान करो । दृढ़ अर्चना से मां शक्ति को प्रसन्न करो।

तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर,
रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सका त्रस्त
तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त;


शक्ति की करे मौलिक कल्पना; करो पूजन,
छोड़ दो समर जब तक न सिद्ध हो, रघुनन्दन!

अर्थ :

  • रावण के अनुशासन रहित जीवन को तुम अपने अनुशासित जीवन से पराजित कर सकते हो। यदि अपवित्र होकर भी रावण तुम्हें आतंकित कर सकता है तो अपनी पवित्र साधना से तुम निश्चित ही उस पर विजय प्राप्त कर सकते हो।
  • तुम शक्ति के एक अभूतपूर्व स्वागत की कल्पना करो। उसकी आराधना करो। जब तक इस आराधना में तुम्हें सफलता नहीं मिलती, तब तक के लिए आप श्री राम युद्ध समर को छोड़ दो।


पद : 17.

Ram Ki Shakti Pooja Kavita Ke 16-19 Pado Ka Bhaav Saar in Hindi

तब तक लक्ष्मण हैं महावाहिनी के नायक
मध्य मार्ग में अंगद, दक्षिण-श्वेत सहायक,
मैं, भल्ल सैन्य; हैं वाम-पार्श्व में हनुमान,
नल, नील और छोटे कपिगण – उनके प्रधान;
सुग्रीव, विभीषण, अन्य यूथपति यथासमय
आयेंगे रक्षा हेतु जहाँ भी होगा भय।”

अर्थ :

  • जामवंत आगे कह रहे है कि महाशक्ति की पूजा तक लक्ष्मण महासेना के नायक रहेंगे, जबकि मध्य मार्ग में अंगद और दक्षिण में श्वेत सहायक एवं मैं (जामवंत) तथा बायें भाग में हनुमान जी, नल, नील और छोटे वानर रहेंगे। इनके प्रधान सुग्रीव, विभीषण आदि जब भी भय होगा, यथा समय आ जायेंगे।

खिल गयी सभा। “उत्तम निश्चय यह, भल्लनाथ!”
कह दिया ऋक्ष को मान राम ने झुका माथ।
हो गए ध्यान में लीन पुन: करते विचार,
देखते सकल – तन पुलकित होता बार-बार।

अर्थ :

  • राम की शक्ति पूजा कविता से अवतरित इस पद में कवि निराला यह प्रतिपादित कर रहे हैं कि श्री राम को जामवंत ने शक्ति की आराधना करने का सुझाव दिया। संपूर्ण सभा के द्वारा यह सुझाव स्वीकार कर लिया गया और स्वयं राम ने भी वह सुझाव स्वीकार कर लिया।
  • श्री राम कहते हैं कि मैं ऐसा ही करूंगा। इस सुझाव को स्वीकार करके जामवंत को सभी कहने लगे कि आपका यह सुझाव बहुत अच्छा है। राम ने भी वयोवृद्ध जामवंत के सामने अपना मस्तक झुका लिया। उनका शरीर बार-बार रोमांचित हो रहा था।

कुछ समय अनन्तर इन्दीवर-निदित लोचन
खुल गए, रहा निष्पलक भाव में मज्जित मन,
बोले आवेग-रहित स्वर में विश्वास-स्थित –
“मात:, दशभुजा, विश्व-ज्योति; मैं हूँ आश्रित;

हो विद्ध शक्ति से है महिषासुर खल मर्दित;
जनरंजन-चरण-कमल-तल, धन्य सिंह गर्जित!
यह, यह मेरा प्रतीक मात: समझा इंगित;
मैं सिंह, इसी भाव से करूँगा अभिनन्दित।”

अर्थ :

  • नील कमलों से भी सुन्दर श्री राम के नेत्र कुछ देर बाद खुलते हैं। परंतु पलके स्थिर हैं और उनका मन वैसे ही किसी ध्यान में डूबा है। श्री राम ने निष्ठा भाव से मन को स्थिर करके कहा कि हे दस भुजाओं वाली मां ! सारे जगत को आलोकित करने वाली मां ! मैं आप पर ही निर्भर हूं।
  • आपकी शक्ति से दुष्ट महिषासुर पराभूत हो सका था। आपके चरण कमलों के नीचे सिंह गर्जना कर रहा है। हे मां ! इसी सिंह की भांति मैंने भी आपके चरणों में शरण ले ली है। इसी सिंह के रूप में, मैं अपने आप पर आपकी शक्ति का अवतरण चाहता हूं।

विशेष :

  • लुप्तोपमा और श्लेष अलंकार का चमत्कार है।


पद : 18.

Ram Ravan Yudh Prasang 16 to 19 in Ram Shakti Puja in Hindi

कुछ समय तक स्तब्ध हो रहे राम छवि में निमग्न,
फिर खोले पलक-कमल-ज्योतिर्दल ध्यान-लग्न;

अर्थ :

  • इस भाग में श्री राम जामवंत की प्रेरणा पाकर शक्ति की आराधना के लिए तैयार हो जाते हैं। यद्यपि उनकी आराधना अभी तक आरंभ नहीं हुई है, फिर भी उनके मुख की मुद्राएं आराधना के भाव से भरी है। वे पूर्ण आस्था और भक्ति से स्वयं को मां की आराधना में समर्पित कर रहे हैं।

हैं देख रहे मन्त्री, सेनापति, वीरासन
बैठे उमड़ते हुए, राघव का स्मित आनन।
बोले भावस्थ चन्द्र-मुख निन्दित रामचन्द्र
प्राणों में पावन कम्पन भर स्वर-मेघमन्द्र –

“देखो, बन्धुवर, सामने स्थिर जो वह भूधर
शोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुन्दर,
पार्वती कल्पना हैं इसकी मकरन्द-विन्दु;
गरजता वरण-प्रान्त पर सिंह वह, नहीं सिन्धु,

अर्थ :

  • वे कहते हैं कि मैं मां के चरणों में इस प्रकार झुके रहूंगा, जैसे उनका वाहन उनके चरणों में नत रहता हैं। उनके मन में पवित्र भावधारा का आगमन हो रहा था । उस समय श्री राम मेघ के समान धीर और गंभीर स्वर में कहने लगे कि
  • हे बंधुवर ! देखो, सामने जो यह पर्वत स्थित है, जो सैकड़ों हरे-भरे पेड़ों से सुशोभित है, वह निश्चय ही पार्वती का ही कल्पित स्वरूप है तथा शीतलता प्रदायक और प्राणवान है। उस पर्वत रूपी पार्वती के निम्न भाग में जो समुद्र अविरल तरंगित रहता है, वह वास्तव में समुद्र नहीं, बल्कि महाशक्ति के चरणों में बैठा हुआ उनका वाहन सिंह है।

दशदिक समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर,
अम्बर में हुए दिगम्बर अर्चित शशि-शेखर;
लख महाभाव-मंगल पद-तल धँस रहा गर्व –
मानव के मन का असुर मन्द हो रहा खर्व।”

अर्थ :

  • और जो दसों दिशाएं हैं, वह पार्वती के विशाल हाथ हैं। उनके ऊपर आकाश में देखो, दिगंबर वेशधारी, मस्तक पर चंद्र को धारण करने वाले शिव शोभायमान है। और संसार के मानव की आसुरी वृत्तियों का विनाश हो रहा है। शिव और पार्वती के दर्शन मात्र से ही मानव के हृदय की सभी कुप्रवृतियां और कुसंस्कार विनष्ट हो रहे हैं।

विशेष :

  • अलंकृत बिम्ब योजना का आकर्षण है।


पद : 19.

Suryakant Tripathi Nirala Krit Ram Ki Shakti Pooja Kavita 16-19 Pad Bhavarth in Hindi

फिर मधुर दृष्टि से प्रिय कपि को खींचते हुए
बोले प्रियतर स्वर में अन्तर सींचते हुए –

“चाहिए हमें एक सौ आठ, कपि, इन्दीवर,
कम-से-कम, अधिक और हों, अधिक और सुन्दर,
जाओ देवीदह, उष:काल होते सत्वर
तोड़ो; लाओ वे कमल, लौटकर लड़ो समर।”

अर्थ :

  • इस पद में यह बताया गया है कि श्री राम महाशक्ति की आराधना के लिए तत्पर हो रहे हैं। वे महाशक्ति की मौलिक कल्पना करते हैं और उनका ध्यान करते हैं। अपनी पूजा और आराधना के लिए संपूर्ण सामग्री जुटाना चाहते हैं। सामग्री जुटाने के लिए वह हनुमान की तरफ देखते हैं। इससे यह पता चलता है कि राम का हनुमान पर न केवल अपार स्नेह है बल्कि उनकी शक्ति पर पूरा विश्वास भी है।
  • श्री राम हनुमान जी से कहते हैं कि हमें शक्ति की आराधना के लिए 108 कमलों की आवश्यकता है। कम से कम 108 कमल तो होने ही चाहिए। इससे और भी अधिक कमल ला सको तो अच्छा होगा। हनुमान जी को श्री राम कहते हैं कि तुम प्रात:काल होते ही देवीदह सरोवर की तरफ प्रस्थान कर जाना और उन कमल के फूलों को लाकर विश्वस्त होकर युद्ध करना।

अवगत हो जाम्बवान से पथ, दूरत्व, स्थान,
प्रभु-पद रज सिर धर चले हर्ष भर हनूमान।
राघव ने विदा किया सबको जानकर समय,
सब चले सदय राम की सोचते हुए विजय।

अर्थ :

  • हनुमान जी ने जामवंत से देवीदह सरोवर का मार्ग, दूरी और स्थान से परिचय प्राप्त किया। फिर रास्ते का पता लगाकर श्री राम के चरणों की पवित्र धूलि माथे से लगाकर हर्षित मन से अपने कार्य को करने के लिए चल दिये। उधर श्री राम ने विश्राम करने के लिए सभी को विदा कर दिया। सभी लोग विजय की कामना करते हुए चले गये।

विशेष :

  • स्वभावोक्ति अलंकार प्रयुक्त हुआ है।
  • अनुप्रास और पुनरुक्तिप्रकाश का भी प्रयोग हुआ है।

इसप्रकार आज हमने Nirala Krit Ram Ki Shakti Pooja | राम की शक्ति पूजा के 16-19 पदों को विस्तार से समझ लिया है। आपने अगर अभी तक इसके पिछले पदों का अध्ययन नहीं किया है। तो आप इन्हे जरूर से तैयार कर लेवें। विषय की महत्ता को देखते हुए ही हम इसके पदों का विस्तृत वर्णन कर रहे है। उम्मीद है की आप इसकी उपयोगिता को अवश्य समझेंगे।


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एक गुजारिश :

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