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Kamayani Ke Chinta Sarg Ka Arth | कामायनी का चिंता सर्ग भाग – 7


नमस्कार दोस्तों ! जैसाकि हम कॉलेज लेक्चरर सीरीज में जयशंकर प्रसाद कृत कामायनी के चिंता सर्ग के पदों का अध्ययन कर रहे है। आज हम Kamayani Ke Chinta Sarg Ka Arth | कामायनी का चिंता सर्ग के अगले पद संख्या 41-46 तक की व्याख्या करने जा रहे है। तो चलिए समझते है :

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Kamayani | कामायनी के चिंता सर्ग के पदों का अर्थ एवं व्याख्या


Jaishankar Prasad Krit Kamayani Ke Chinta Sarg Ka Arth in Hindi : कामायनी महाकाव्य के प्रथम चिंता सर्ग के 41-46 पदों की विस्तृत व्याख्या कुछ इसप्रकार से है :

पद : 41.

Kamayani Ke Pratham Chinta Sarg Ke 41 to 46 Pado Ki Vyakhya

विकल वासना के प्रतिनिधि, वे सब मुरझाये चले गये।
आह जले अपनी ज्वाला से, फिर वे जल में गले, गये।

अर्थ :

मनु कह रहे हैं कि अतृप्त वासनाओं के प्रतीक देवताओं का आज नाश हो गया है। उन्होंने स्वयं को अपने द्वारा जगाई गई वासना की आग में जलाकर राख कर लिया है । इसके बाद वे इस अपार जल राशि में हमेशा के लिए विलीन हो गए हैं ।



पद : 42.

Kamayani ke 41 to 46 Pado ka Arth Bhaav in Hindi

अरी उपेक्षा-भरी अमरते, री अतृप्ति निबार्ध विलास।
द्विधा-रहित अपलक नयनों की, भूख-भरी दर्शन की प्यास।

अर्थ :

मनु कहते हैं कि देवता खुद को अमर समझते थे। और इसलिए उन्होंने अपने जीवन में सभी की उपेक्षा ही की है। उन्होंने निरंतर भोग-विलास को ही जीवन का साध्य समझा है। परंतु उनकी तृष्णा शांत नहीं हुई । वे उत्तरोत्तर विलासिता में ही लीन रहने लगे। उन्हें किसी बात की चिंता नहीं थी।

उन्हें इस काम क्रीड़ा के अलावा कोई काम भी नहीं था। इस प्रकार वे हमेशा प्रेम की प्यास के लिए वासना से भरे हुए नैत्रों से, देव बालाओं के दर्शनों के लिए उत्सुक रहते थे। दोस्तों ! इन पंक्तियों में लाक्षणिक पदावली का प्रयोग किया गया है।


पद : 43.

Kamayani Mahakavya ka Pahla Chinta Sarg 41-46 Pad in Hindi

बिछुड़े तेरे सब आलिंगन, पुलक-स्पर्श का पता नहीं।
मधुमय चुंबन कातरतायें, आज न मुख को सता रहीं।

अर्थ :

मनु कहते हैं कि वह सभी दृश्य आज समाप्त हो गए हैं । देव बालाओं का आलिंगन करते समय जो रोमांच उनके शरीर में हो जाया करता था, वह भी अब समाप्त हो गया। देवता प्रेमातुर होकर देव बालाओं के अधरों का मधुर चुंबन लेने के लिए छटपटाया करते थे।

वे बार-बार देव बालाओं से चुंबन के लिए विनय करते थे। परंतु चुंबनों की अधिकता से कामनियाँ भी तंग हो उठती थी और उनका अनुरोध अस्वीकार कर दिया करती थी। अतः देवताओं के मुख पर कातरता झलक उठती थी । परंतु यह दृश्य अब दिखाई नहीं देते हैं। दोस्तों ! इन पंक्तियों में प्रेम-क्रीडा का स्वभाविक चित्रण हुआ है।



पद : 44.

Jai Shankar Prasad Krit Kamayani Mahakavya Ka Arth in Hindi

रत्न-सौंध के वातायन, जिनमें आता मधु-मदिर समीर।
टकराती होगी अब उनमें, तिमिंगिलों की भीड़ अधीर।

अर्थ :

मनु यह कह रहे हैं कि जब प्रलय के बाद देव सृष्टि नष्ट हो चुकी। और जिन रत्नों जड़ित भवनों के झरोखों में से सुगंधित पवन बहा करती थी, आज उन झरोखों में तिमिंगल नामक अनेक समुद्री मछलियां टकरा रही होंगी। दोस्तों ! इन पंक्तियों में उपमा अलंकार का प्रयोग हुआ है।


पद : 45.

Jai Shankar Prasad – Kamayani Ke Chinta Sarg Ka Arth in Hindi

देवकामिनी के नयनों से, जहाँ नील नलिनों की सृष्टि।
होती थी, अब वहाँ हो रही, प्रलयकारिणी भीषण वृष्टि।

अर्थ :

मनु विगत स्मृतियों में लीन होकर सोचना शुरु कर देते हैं। उन सुंदर देव बालाओं के नेत्र सुंदर नीले कमल के समान थे। वे जिस ओर भी दृष्टि फेर लेती थी, उधर ही नीले कमलों का संसार झलकने लगता था। परंतु आज जल प्रलय के कारण इनका विनाश हो गया है और अब उन नीलकमल के स्थान पर भीषण प्रलयकारी वर्षा हो रही है। प्रस्तुत पंक्तियों में देव बालाओं की सुंदरता का वर्णन किया गया है।



पद : 46.

Kamayani Ke Chinta Sarg Ka Arth Mool Bhaav Vyakhya in Hindi

वे अम्लान-कुसुम-सुरभित, मणि-रचित मनोहर मालायें।
बनीं श्रृंखला, जकड़ी जिनमें, विलासिनी सुर-बालायें।

अर्थ :

मनु कहते हैं कि खिले हुए सुगंधित फूलों और मणियों की जो मालाएं, देव बालाओं के शरीर पर श्रृंगार का, सुंदरता का काम करती थी, वही मालाएं आज जंजीर के समान प्रतीत हो रही हैं। ऐसा लगता है कि उन मालाओं रूपी जंजीरों में वे जकड़ दी गई है। इन पंक्तियों में विभावना अलंकार की व्यंजना हुई है।


अच्छा तो दोस्तों ! अब आप Kamayani Ke Chinta Sarg Ka Arth | कामायनी के चिंता सर्ग के भाग – 7 को समझ चुके है। इसमें हमने अगले 41-46 तक के पदों की व्याख्या प्रस्तुत की है। उम्मीद है कि आपको अच्छे से समझ आया होगा। आप इन पदों को तैयार अवश्य करते चले ताकि आपको परीक्षा में कोई परेशानी ना हो।

ये भी अच्छे से समझे :


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