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Jaishankar Prasad – Kamayani | कामायनी का चिंता सर्ग भाग – 5


नमस्कार दोस्तों ! जैसाकि हम जयशंकर प्रसाद रचित कामायनी के चिंता सर्ग का अध्ययन कर रहे है। हमने अब तक इसके कुल 24 पदों को समझ लिया है। आज हम “Jaishankar Prasad – Kamayani | कामायनी के चिंता सर्ग के अगले पदों का अध्ययन करने जा रहे हैं। तो चलिए शुरू करते है :

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Kamayani | कामायनी के चिंता सर्ग के पदों की व्याख्या


Jaishankar Prasad – Kamayani | कामायनी महाकाव्य के चिंता सर्ग के 25-32 पदों की विस्तृत व्याख्या इसप्रकार से है :

पद : 25.

Jaishankar Prasad – Kamayani Chinta Sarg Arth in Hindi

“वह उन्मुक्त विलास हुआ क्या, स्वप्न रहा या छलना थी
देवसृष्टि की सुख-विभावरी, ताराओं की कलना थी।

अर्थ :

मनु अब देवताओं के विलासपूर्ण जीवन के बारे में कटु आलोचना करते हुए कह रहे हैं कि अब देवताओं का भोग विलास कहां चला गया ? क्या यह सब स्वपन मात्र ही था ? मनु कहते हैं कि देवताओं के संसार की सुख रात्रि तारों से परिपूर्ण थी और जिस प्रकार से तारों की कोई गिनती नहीं हो पाती, उसी प्रकार देवताओं के भोग विलास की भी कोई सीमा नहीं थी।



पद : 26.

Kamayani ke 25 to 32 Pado ka Arth Bhaav in Hindi

चलते थे सुरभित अंचल से, जीवन के मधुमय निश्वास,
कोलाहल में मुखरित होता, देव जाति का सुख-विश्वास।

अर्थ :

मनु कह रहे हैं कि देवता नारियों के सुगन्धित आँचलों की छाया में मादकतापूर्ण सांस लिया करते थे अर्थात् वे हमेशा ही विलास में रहते थे। विलास और वैभवपूर्ण वातावरण में सुख और स्वच्छंदता के साथ वे अपना जीवन जीते थे।


पद : 27.

Kamayani Ke Pratham Chinta Sarg Ke 25 to 32 Pado Ki Vyakhya

सुख, केवल सुख का वह संग्रह, केंद्रीभूत हुआ इतना,
छायापथ में नव तुषार का, सघन मिलन होता जितना।

अर्थ :

मनु कह रहे हैं कि देवताओं के जीवन का लक्ष्य केवल सुखों का भोग ही था और उन्होंने विभिन्न सुखों को अपने पास उसी प्रकार एकत्र कर लिया था, जिस प्रकार नवीन बर्फ कणों की तरह चमकने वाले अनेकानेक तारे आकाशगंगा में दिखाई देते हैं।

दोस्तों ! सुखों को केंद्रीभूत करने की ये प्रवृत्ति सूक्ष्म मानस व्यापार है और कवि इसे स्थूल प्राकृतिक दृश्य से व्यंजित करके उक्ति में मनोहरता ले आये है।



पद : 28.

Kamayani Mahakavya ka Pahla Chinta Sarg 25-32 Pad in Hindi

सब कुछ थे स्वायत्त,विश्व के-बल, वैभव, आनंद अपार,
उद्वेलित लहरों-सा होता, उस समृद्धि का सुख संचार।

अर्थ :

मनु कह रहे हैं कि संसार का समस्त बल, वैभव और आनंद देवगणों के ही अधिकार में था। इसी कारण उनका जीवन अपूर्व सुखमय और समृद्धशाली हो गया था। जिस प्रकार आज समुद्र की लहरें उमड़-घुमड़ कर अपनी सत्ता और समृद्धि का परिचय दे रही है, उसी प्रकार से देवता भी अपनी सत्ता का परिचय देते थे।


पद : 29.

Jaishankar Prasad – Kamayani Chinta Sarg Pad Mul Bhaav in Hindi

कीर्ति, दीप्ति, शोभा थी नचती, अरुण-किरण-सी चारों ओर,
सप्तसिंधु के तरल कणों में, द्रुम-दल में, आनन्द-विभोर।

अर्थ :

मनु कहते हैं कि देवताओं का यश, तेज और शोभा प्रातः कालीन सूर्य की किरणों की समान चारों ओर व्याप्त थी। इतना ही नहीं, देवता सप्तसिंधु के तरल कणों और वृक्षों के झुंड में आनंदमग्न होकर घूमा करते थे।



पद : 30.

Jaishankar Prasad – Kamayani Pratham Sarg Pad Arth in Hindi

शक्ति रही हाँ शक्ति-प्रकृति थी, पद-तल में विनम्र विश्रांत,
कँपती धरणी उन चरणों से होकर, प्रतिदिन ही आक्रांत।

अर्थ :

मनु आगे कहते है कि देवताओं में अपूर्व शक्ति विद्यमान थी। प्रकृति भी पराजित होकर नम्रता के साथ उनके चरणों में झुक गई थी एवं धरती भी उनके चरणों से पद दलित होकर प्रतिदिन कांपती रहती थी।

वस्तुतः प्रकृति के पराजित होने का अभिप्राय यह है कि देवताओं ने समस्त प्राकृतिक वस्तुओं पर अपना अधिकार कर लिया था और कम्पित धरणी से तात्पर्य है कि देवता जहां भी आक्रमण करते थे, वहां के निवासी भयभीत होकर अपनी पराजय स्वीकार कर लेते थे।


पद : 31.

Jaishankar Prasad – Kamayani Mahakavya Pad Vyakhya in Hindi

स्वयं देव थे हम सब, तो फिर क्यों न विश्रृंखल होती सृष्टि?
अरे अचानक हुई इसी से, कड़ी आपदाओं की वृष्टि।

अर्थ :

मनु कहते हैं कि देवताओं में अहंकार उत्पन्न हो गया था। उन्होंने ये समझ लिया था कि वे स्वयं ही अपने कर्मों के नियामक है और वे कुछ भी करने में स्वतंत्र है। इसप्रकार उनकी संयमहीनता के कारण संसार की सारी व्यवस्था ही छिन्न-भिन्न होने लगी और उन पर आपत्तियों की भयंकर वर्षा हुई अर्थात् उन्हें अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा।



पद : 32.

Jaishankar Prasad – Kamayani Mahakavya Chinta Sarg Saar in Hindi

गया, सभी कुछ गया,मधुर तम, सुर-बालाओं का श्रृंगार,
ऊषा ज्योत्स्ना-सा यौवन-स्मित, मधुप-सदृश निश्चित विहार।

अर्थ :

मनु कह रहे हैं कि देवताओं का समस्त ऐश्वर्य और आनंद विहार नष्ट हो गया । साथ ही देव बालाओं का श्रृंगार एवं ऊषा के समान यौवन भी नष्ट हो गया। इतना ही नहीं, चांदनी के समान उनकी मुस्कुराहट और मतवाले भँवरों के समान उनका निश्चित भोग विलास भी नष्ट हो गया।

इसप्रकार दोस्तों ! आज हमने Jaishankar Prasad – Kamayani | कामायनी के चिंता सर्ग के 25-32 पदों का विस्तृत अर्थ जाना।उम्मीद है कि आपको अब तक बताये गए सभी पदों का अर्थ अच्छे से समझ में आ ही गया होगा। फिर मिलते है, आगे के कुछ पदों की व्याख्या के साथ।


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एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Jaishankar Prasad – Kamayani | कामायनी का चिंता सर्ग भाग – 5 के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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