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भ्रमरगीत सार व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya by Shukla


भ्रमरगीत सार व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya by Shukla in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! आज के लेख में हम रामचंद्र शुक्ल द्वारा संपादित “भ्रमरगीत सार” के पद संख्या #36-38 की विस्तृत व्याख्या समझने का प्रयास करेंगे तो चलिए जल्दी से शुरू करते है :

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भ्रमरगीत सार व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya [पद #36-38]


भ्रमरगीत सार व्याख्या Shukla Ke Bhramar Geet Saar Ki Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! शुक्ल जी द्वारा सम्पादित भ्रमर गीत सार के 36-38 पदों की व्याख्या इसप्रकार है :

#पद : 36.

भ्रमरगीत सार व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya by Shukla Raag Vihagaro Arth in Hindi

राग विहागरो
बरु वै कुब्जा भलो कियो।
सुनि सुनि समाचार ऊधो मो कछुक सिरात हियो।।
जाको गुन, गति, नाम, रूप हरि, हार्‌यो फिरि न दियो।

तिन अपनो मन हरत न जान्यो हँसि हँसि लोग जियो।।
सूर तनक चंदन चढ़ाय तन ब्रजपति बस्य कियो
और सकल नागरि नारिन को दासी दाँव लियो।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. बरु बल्कि
02. भलो अच्छा
03. मो मुझे
04.सिरातशीतल होता है
05. हियो हृदय
06. हार्‌यो हर लिया
07. तिन उन्होंने
08. बस्य कियो वश में कर लिया
09. सकल भारी सभी
10.नागरिनगर में रहने वाली नारियां
11. दासी कुब्जा
12.दाँवदाँव, घात

व्याख्या :

दोस्तों ! प्रस्तुत पद में कुब्जा के द्वारा श्रीकृष्ण को वश में किये जाने पर गोपियाँ प्रसन्नता व्यक्त कर रही है। गोपियाँ उद्धव से कह रही है कि हे उद्धव ! उस कुब्जा ने अच्छा काम किया है। यह समाचार सुनकर हमारा ह्रदय शीतल हो जाता है कि उन्होंने एक बार जिसका तन, मन, नाम, रूप, गुण आदि का हरण कर लिया है, उसे फिर लौटाकर नहीं दिया और आज वही श्री कृष्ण अपने मन का हरण होते हुये जान भी नहीं पाये। कुब्जा ने उनके मन को हर लिया, फिर भी श्रीकृष्ण यह जान नहीं पाये।

श्री कृष्ण की इस पराजय की बात सुनकर सभी लोग हँस-हँसकर जीवित रहते है अर्थात् खूब हँसी मजाक करते हैं। सूरदास जी कहते हैं कि उस कुब्जा ने तो श्री कृष्ण के शरीर पर थोड़ा सा चंदन का लेप क्या कर दिया, उस चंदन के लेप से कुब्जा ने अपने वश में कर लिया और इस प्रकार संपूर्ण नगर की नारियों को पराजित करके उस दासी ने उनके ऊपर विजय प्राप्त कर ली है।

कहने का तात्पर्य यह है कि दासी कुब्जा ने उस नगर की सभी चतुर स्त्रियों को पराजित करके दाँव मार लिया है। एक दासी अन्य स्त्रियों से जीत गई और इस प्रकार उस दासी की विजय हुई।

भ्रमरगीत सार व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya by Shukla

दोस्तों ! प्रस्तुत पद में गोपियों द्वारा श्री कृष्ण पर विजय को बताते हुये सूरदास जी दुर्जन दोष न्याय पद्धति की व्याख्या कर रहे हैं। दुर्जन दोष न्याय पद्धति से तात्पर्य है कि विपक्षी को हराने के लिए उसके तर्क की पुष्टि की जाती है और उसी के दाँव पर उसे हरा दिया जाता है। गोपियाँ कहती है कि जो श्री कृष्ण जब गोपियों के तन, मन, प्राण, रूप, गुण आदि का हरण कर लिया करते थे, अंत में उन्हें एक दासी के हाथों हार स्वीकार करनी पड़ी।

गोपियाँ श्री कृष्ण पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देती थी और उसी बीच श्री कृष्ण उन्हें छोड़कर मथुरा चले गये। जिस उद्देश्य से वे मथुरा गये थे, वह उद्देश्य पूर्ण हो जाने पर भी वे उनकी सुधि नहीं लेते हैं और कुब्जा के द्वारा शरीर पर थोड़ा सा चंदन चढ़ा देने पर वे इतने अधिक वश में हो गये है कि वहां से लौटकर उनसे मिलने भी नहीं आ पा रहे है।


#पद : 37.

भ्रमरगीत सार व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya by Shukla Raag Sarang Arth with Hard Meaning in Hindi

राग सारंग
हरि काहे के अंतर्यामी ?
जौ हरि मिलत नहीं यहि औसर, अवधि बतावत लामी।।
अपनी चोप जाय उठि बैठे और निरस बेकामी ?
सो कह पीर पराई जानै जो हरि गरुड़ागामी।।
आई उघरि प्रीति कलई सी जैसे खाटी आमी
सूर इते पर अनख मरति हैं, उधो पीवत मामी।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. अंतर्यामी सर्वज्ञ
02. यहि इस
03. औसर अवसर
04. अवधि समय
05. बतावत बताते है
06. लामी लम्बी
07. चोप चाह
08. निरस नीरस
09.बेकामीनिष्काम
10. पीर दर्द
11.पराईदूसरे का
12. उघरि खुली, स्पष्ट
13. खाटी खट्टी
14.आमीअमिया
15. अनख अनखनाकर, कुढ़कर
16. पीवत मामी बात को पी जाना, चुप्पी साध जाना

व्याख्या :

दोस्तों ! गोपियाँ उद्धव से कह रही है कि हे उद्धव ! हरि कैसे अंतर्यामी हैं ? यदि वे हमारे ह्रदय की बात ही नहीं जानते तो इस अवसर पर आकर हमसे मिलते बल्कि इसके विपरीत वे तो अपने आने की और भी लंबी अवधि बता रहे हैं अर्थात् संदेश भेजते हैं कि मैं कुछ दिनों बाद आऊंगा। यहाँ से अपनी इच्छा के अनुसार ही उठकर वहां जाकर बैठ गये हैं और वहां जाकर पूर्णत: नीरस और निष्काम हो गये है।

अर्थात् उनके ह्रदय में हम गोपियों से मिलने की कामना ही नहीं रही। जो गरुड़ पर सवारी करने वाले हैं, जो कभी पैदल नहीं चलते, वो कैसे हमारी पीड़ा को समझ सकते हैं ? पैदल चलने वाली हम अभागी की कटी बिवाईयों के कष्ट को वो क्या जान सकते हैं अर्थात् श्री कृष्ण को वहां कुब्जा का प्रेम प्राप्त हो गया और वे हमें भूल गये हैं।

उन्हें तो वहां पर प्रेम मिल गया इसलिए उन्हें हमारी याद नहीं आती। हमारी वेदना नहीं सताती और फिर वे वेदना के कष्ट को कैसे अनुभव कर सकते हैं ? किस प्रकार खट्टे आम के द्वारा बर्तनों पर चढ़ाई गई कलई उतर जाती है और बर्तन का असली रूप सामने आ जाता है। उसीप्रकार अब हमारे सामने उनके प्रेम की असलियत आ गई है। उनकी कलई खुल गई है। सत्यता तो यह है कि वह हमसे प्रेम ही नहीं करते थे। प्रेम की बनावटी बातें बताकर हमें बहलाये रहते थे।

सूरदास जी कहते हैं कि गोपियाँ उद्धव से कह रही है कि इतना जान लेने के बाद हम इस बात पर घुट-घुटकर के मर रही है कि श्री कृष्ण हमारे प्रेम के संबंध में मौन साधकर बैठे है। ना तो ये कहते है कि हमसे प्रेम नहीं करते और ना ही ये कहते है कि हमसे प्रेम करते है। वे तो मौन साध कर बैठ गये है।


#पद : 38.

भ्रमरगीत सार व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya by Shukla Shabdarth Sahit in Hindi

बिलग जनि मानहु, ऊधो प्यारे !
वह मथुरा काजर की कोठरि जे आवहिं ते का।।
तुम कारे, सुफलकसुत कारे, कारे मधुप भँवारे।
तिनके संग अधिक छबि उपजत कमलनैन मनिआरे।।
मानहु नील माट तें काढ़े लै जमुना ज्यों पखारे
ता गुन स्याम भई कालिंदी सूर स्याम-गुन न्यारे।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. बिलग बुरा
02. जनि मत
03. काजर काजल
04. कोठरि कोठरी, छोटा कमरा
05. आवहिं आते है
06. कारे काले
07. सुफलकसुत अक्रूर
08. मधुप भौंरा
09. उपजत उत्पन्न होता है
10. मनिआरे मणिधारी, काला सर्प
11. काढ़े निकाले
12. पखारे धोये
13. कालिंदी यमुना

व्याख्या :

गोपियाँ उद्धव को खरी-खोटी सुनाते हुये कह रही है कि वे उनकी बात का बुरा ना माने। हे उद्धव ! तुम हमारी बातों का बुरा मत मानना। तुम हमें ज्ञान योग की शिक्षा देने आये हो। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। दोष तो उस मथुरा का है। ये मथुरा तो काजल की कोठरी के समान है, वहां से जो भी कोई आता है, वो हर व्यक्ति काला होता है।

अब देखो तुम भी काले हो। अक्रूर जी भी काले हैं और मथुरा की ओर से उड़कर आने वाले भँवरे भी काले हैं। इन सब काले लोगों के साथ कमल के समान नेत्रों वाले श्री कृष्ण भी मणिधारी सर्प के समान काले हैं, क्योंकि उन्होंने हमें डस करके अपने विरह रुपी विष से व्याकुल कर दिया है। ऐसा प्रतीत होता है कि तुम सभी लोगों को किसी नीले मटके में से निकालकर और यमुना जल से धोकर के साफ करने का प्रयास किया है।

तुम तो साफ नहीं हुये लेकिन यमुना का जल तुम लोगों के संपर्क के कारण काला पड़ गया है। सूरदास जी कहते हैं कि तुम काले लोगों के तो गुण ही अलग होते है। तुम खुद तो काले होते ही हो। दूसरों को भी काला कर देते हो।

दोस्तों ! आज हमने Bhramar Geet Saar Vyakhya by Shukla भ्रमरगीत सार के 38 पदों की विस्तृत व्याख्या को समझा। उम्मीद है कि आपको समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई होगी।

ये भी अच्छे से समझे :


एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको भ्रमरगीत सार व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya by Shukla के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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