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भ्रमरगीत सार Bhramar Geet Saar by Ramchandra Shukla


भ्रमरगीत सार Bhramar Geet Saar by Ramchandra Shukla in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! आज हम रामचंद्र शुक्ल द्वारा संपादित “भ्रमरगीत सार” के पद संख्या #33-35 की विस्तृत व्याख्या समझने वाले है। तो चलिए जल्दी से शुरू करते है :

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Bhramar Geet Saar by Ramchandra Shukla भ्रमरगीत सार व्याख्या


भ्रमरगीत सार Bhramar Geet Saar by Ramchandra Shukla Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! “भ्रमरगीत सार” के 33-35 तक के पदों की व्याख्या को इसतरह से समझे :

#पद : 33.

भ्रमरगीत सार Bhramar Geet Saar by Ramchandra Shukla Raag Malaar Arth Vyakhya in Hindi

राग मलार
स्याममुख देखे ही परतीति
जो तुम कोटि जतन करि सिखवत जोग ध्यान की रीति।।
नाहिंन कछू सयान ज्ञान में यह हम कैसे मानैं।
कहौ कहा कहिए या नभ को कैसे उर में आनैं।।
यह मन एक, एक वह मूरति, भृंगकीट सम माने।
सूर सपथ दै बूझत ऊधो यह ब्रज लोग सयाने।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01.परतीति विश्वास
02.कोटि करोड़
03.जतनयत्न
04. सयान चालाकी
05.नभ शून्य
06.उर में आनैंविश्वास करें
07. आनैं लाए
08.भृंगकीटबिलनी नामक एक कीड़ा
जिसके संबंध में प्रचलित है कि
यह अन्य कीड़ों को पकड़कर
उन्हें अपने रूप में परिवर्तित कर लेता है
09.सम समान
10.बूझत समझते हैं

व्याख्या :

दोस्तों ! गोपियाँ उद्धव की सारी बातें बड़े धैर्य से सुन कर कहती है कि हे उद्धव ! अब तो श्री कृष्ण के दर्शन करने पर ही हमें विश्वास होगा कि वास्तविकता क्या है ? भले ही तुम अनेक प्रश्नों के द्वारा करोड़ों युक्तियां करके हमें ज्ञान और योग की पद्धतियों की शिक्षा देना चाहते हो, किन्तु जिन पर हमारा मन स्थिर नहीं हो पाता, हम यह कैसे स्वीकार कर ले कि तुम जो यह ज्ञानोपदेश दे रहे हो, इसमें कहीं कोई खोट या चालाकी का समावेश नहीं है। हमें तो यह स्पष्ट लग रहा है कि तुम हमें श्री कृष्ण प्रेम से उदासीन करके अपनी कोई स्वार्थ सिद्धि करना चाहते हो। इससे तुम्हारा छल ही प्रकट होता है।

गोपियाँ पूछती है कि हे उद्धव ! यह बताओ किसी आकाश जैसे विस्तृत ब्रह्म को हम अपने हृदय में किस प्रकार समेटे ? किस प्रकार इसे आत्मसात करें ? हमारे पास एक ही ह्रदय है और इसमें पहले से ही एक मूर्ति विराजमान है। इस ह्रदय में जो श्री कृष्ण की मूर्ति पहले से ही विराजमान है, वह और हृदय दोनों मिलकर भृंगकीट के समान एक हो चुके हैं अर्थात् हमारे हृदय पूर्ण रूप से कृष्णमय बन गये हैं।

भ्रमरगीत सार व्याख्या Bhramar Geet Saar by Ramchandra Shukla

अब यह असंभव है कि इसमें आकाश जैसे विस्तृत ब्रह्म को हम समेट पाये। इसलिए अब यह ज्ञानवान ब्रजवासी तुम्हें शपथ देकर यह जानना चाहते हैं कि क्या इनके कृष्णमय ह्रदयों में निर्गुण ब्रह्म के लिए कोई स्थान शेष हो सकता है ? क्या इनके लिए निर्गुण ब्रह्म की साधना करना संभव है ? यह बात तुम्हें समझ लेनी चाहिए कि जब इन का हृदय कृष्णमूर्ति के साथ एकाकार हो चुका है तो इन्हें ब्रह्म की साधना असंभव ही जान पड़ती है।

इन पंक्तियों में गोपियों के द्वारा योग साधना का तिरस्कार किया गया है। गोपियों के अनन्य प्रेम की व्यंजना की गई है। भृंगकीट सम से। अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार प्रेम की अनन्यता में प्रेमी और प्रेमिका एक हो जाते हैं, उसी प्रकार उपासक और उपास्य भी एकरूप हो जाते हैं। उनमें भी कोई अंतर नहीं रहता है।


#पद : 34.

भ्रमरगीत सार Bhramar Geet Saar by Ramchandra Shukla Raag Dhanashri Arth with Hard Meaning in Hindi

राग धनाश्री
लरिकाई को प्रेम, कहौ अलि, कैसे करिकै छूटत ?
कहाँ कहौं ब्रजनाथ-चरित अब अँतरगति यों लूटत।।
चंचल चाल मनोहर चितवनि, वह मुसुकानि मंद धुनि गावत।
नटवर भेस नंदनंदन को वह बिनोद गृह बन तें आवत।।
चरनकमल की सपथ करति हौं यह सँदेस मोहिं बिष सम लागत।
सूरदास मोहि निमिष बिसरत मोहन सूरति सोवत जागत।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. लरिकाई बचपन
02. अलि भौंरा
03. चितवनिचितवन
04.भेसवेश
05. मोहिंमुझे
06. निमिषपल, क्षण
07.बिसरतभूलता है
08. सूरति रूप

व्याख्या :

दोस्तों ! गोपियाँ उद्धव से कह रही है कि हमारा और श्री कृष्ण का जो संबंध है, वह बालपन से ही रहा है, इसलिए इसे भुला पाना सरल नहीं है। गोपियाँ अपनी बात पर जोर देते हुये कहती है कि हे उद्धव ! यह बताओ कि बालपन से साथ-साथ रहते हुए जो प्रेम उत्पन्न हुआ है, वह किस प्रकार छूट सकता है ? यह तो असंभव है कि हम श्री कृष्ण की क्रीड़ाओं का, उनके चरित्रों का कहाँ तक वर्णन करें ?

अब तो उनके इन चरित्रों का ध्यान भी हमारे मन को सहज रूप में उन्हीं की ओर आकर्षित करता रहता है। उनकी वह चंचल गति, वह मनोहर चितवन, वह मोहक मुस्कान, मंद एवं मधुर स्वर जो उनका गान है, इन सब बातों को कभी भी भुला नहीं सकती।

नंद जी के सुपुत्र श्री कृष्ण का नटवर वेश धारण किए हुये और हास्य विनोद करते हुये वन से घर की ओर लौटना, हमारे मन में सदैव छाया रहता है। हम उन चरण-कमलों की सौगंध खाकर कहती है कि जो तुम्हारा यह निर्गुण ब्रह्म की साधना करने का संदेश है। हमें विष के समान अत्यंत कड़वा और घातक प्रतीत होता है। हमें तो सोते-जागते शरीर की समस्त अवस्थाओं में श्री कृष्ण की मनोहर मूर्ति क्षण-भर के लिए भी नहीं भूलती है। वही हमारे आराध्य हैं। उन्हें भुला पाना संभव नहीं है।


#पद : 35.

भ्रमरगीत सार Bhramar Geet Saar by Ramchandra Shukla Vyakhya Shabdarth Sahit in Hindi

राग सोरठ
अटपटि बात तिहारी ऊधो सुनै सो ऐसी को है ?
हम अहीरि अबला सठ, मधुकर ! तिन्हैं जोग कैसे सोहै ?
बूचिहि खुभी आँधरी काजर, नकटी पहिरै बेसरि
मुँडली पाटी पारन चाहै, कोढ़ी अंगहि केसरि।।
बहिरी सों पति मतो करै सो उतर कौन पै पावै ?
ऐसो न्याव है ताको ऊधो जो हमैं जोग सिखावै।।
जो तुम हमको लाए कृपा करि सिर चढ़ाय हम लीन्ह।
सूरदास नरियर जो बिष को करहिं बंदना कीन्ह।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. अटपटि बेकार, व्यर्थ
02. बूचिहि कनकटी
03. खुभी लौंग
04. आँधरी अंधी
05. बेसरि नथ
06. मुँडली जिसका सिर मुंडा हो
07. पाटी पारन बालों में मांग निकालना
08. मतो करै सलाह करे
09. उतर उत्तर
10. नरियर नारियल

व्याख्या :

उद्धव से गोपियाँ कहती है कि हे उद्धव ! यहां ऐसी कोई नहीं है जो तुम्हारी योग की अटपटी बातें सुनकर उन पर ध्यान दें। हमें तुम्हारा यह योग किस प्रकार शोभा दे सकता है ? यह बात उसी प्रकार असंभव है, जिस प्रकार कनकटी स्त्री कानों में लौंग पहनने का प्रयास करे या फिर अंधी स्त्री अपनी आंखों में काजल डालने का प्रयास करें या जिसका नाक कटा हुआ है, वह नथ पहनने का प्रयास करें।

गंजी स्त्री अपने सिर पर बालों की मांग निकालने का प्रयास करें और कोढ़ी अपने कोढ़ से गलते हुये अंगों को केसर से श्रृंगार करने का प्रयत्न करें, यह उसी के समान है। यदि कोई पति अपनी बहरी पत्नी से कुछ विचार-विमर्श करने की कोशिश करे तो क्या उसे उत्तर प्राप्त होगा ? बहरी पत्नी कुछ भी सुन नहीं पाती और वह क्या उत्तर देगी ?

भ्रमरगीत सार व्याख्या Bhramar Geet Saar by Ramchandra Shukla

जिस प्रकार यह सारी बातें असंभव है, उसी प्रकार हे उद्धव ! हमारे लिए ये योग साधना भी असंभव है, जो हमें योग सिखाने का प्रयास करेगा, उसकी स्थिति भी बैरी के समान शोचनीय होगी। इसप्रकार तुम्हारा यह प्रयास व्यर्थ है।

गोपियाँ कहती है कि उद्धव तुम श्रीकृष्ण की ओर से हमारे लिए जो कुछ भी लाये हो, उसे हमने आदर सहित अपने सिर पर चढ़ाकर के स्वीकार कर लिया है, परंतु तुम्हारा जो यह योग का उपदेश है, हमारे लिए विष से भरे हुये नारियल के समान है। इसे दूर से ही नमस्कार किया जा सकता है। इसे यदि स्वीकार कर लिया जाये तो प्राण संकट में पड़ जायेंगे।

इसलिए तुम्हारा यह योग संदेश श्री कृष्ण द्वारा भेजा गया होने पर भी हमारे लिए वंदनीय तो है परंतु स्वीकार करने के योग्य नहीं है। क्योंकि यह हमें प्रियतम श्री कृष्ण को छोड़ने और निर्गुण ब्रह्म की साधना करने के लिए कहता है। इसलिए हम विष से भरे हुये नारियल के समान, इसे दूर से ही प्रणाम करती है। इसे हम स्वीकार नहीं कर सकती।

दोस्तों ! आज तक हमने Bhramar Geet Saar by Ramchandra Shukla भ्रमरगीत सार के 35 पदों की विस्तृत व्याख्या समझ ली है। इसी क्रम में अगले कुछ पदों की व्याख्या आने वाले लेख में देखेंगे।

ये भी अच्छे से समझे :


एक गुजारिश :

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