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Vinay Patrika Pad विनय पत्रिका के पद संख्या 142 की व्याख्या


Vinay Patrika Pad 142 Vyakhya by Tulsidas in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! आज हम पढ़ेंगे श्री गोस्वामी तुलसीदास रचित “विनय-पत्रिका” के 142वें पद की व्याख्या। आप सभी इन पदों को अच्छे से तैयार अवश्य कर लेवें। तो बिना देरी के शुरू करते है :

श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत “विनय-पत्रिका” के पदों का विस्तृत अध्ययन करने के लिये आप
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Vinay Patrika Ki Vyakhya विनय पत्रिका के पद संख्या 142 की व्याख्या


Tulsidas Krit Vinay Patrika Ke Pad 142 Ki Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! विनय पत्रिका के 142वें पद की भावार्थ सहित व्याख्या इसप्रकार है :

#पद :

Vinay Patrika Pad Sankhya 142 Ki Vyakhya in Hindi

सकुचत हौं अति राम कृपानिधि! क्यों करि बिनय सुनावौं।
सकल धरम बिपरीत करत, केहि भाँति नाथ! मन भावौ ।।1।।

जानत हौं हरि रूप चराचर, मैं हठि नयन न लावौं।
अंजन-केस-सिखा जुवती, तहँ लोचन-सलभ पठावौं ।।2।।

स्त्रवननिको फल कथा तुम्हारी, यह समुझौं, समुझावौं।
तिन्ह स्त्रवननि परदोष निरंतर सुनि सुनि भरि भरि तावौं ।।3।।

व्याख्या :

तुलसीदास जी कहते हैं कि हे कृपानिधि श्रीराम जी ! मुझे बड़ा संकोच हो रहा है कि कैसे आपसे विनती करूं ? क्योंकि मैं जो कुछ भी करता हूं, वह धर्म विरुद्ध ही करता हूं। इसलिए भला मैं आपको क्यों अच्छा लगने लगा ? कहने का आशय है कि आपको तो धर्मात्मा ही प्यारे हो सकते हैं। मुझ जैसे पापी नहीं। इसलिए आपके सामने आने में मुझे संकोच होता है।

यद्यपि मैं जानता हूं कि भगवान सर्वत्र व्याप्त हैं। जड़-चेतन सबमें व्याप्त है, परंतु मैं अपने हठ के कारण उस चराचर रूप की ओर ध्यान नहीं दे पाता हूं। मैं अपने नेत्र रूपी पतंगों को कामिनी रूपी अग्निशिखा में जलने के लिये भेजता हूं अर्थात् मेरे नेत्र आपके चराचर रूप को नहीं देखते हैं। वे तो कामिनियों के दर्शन करते हैं।

तुलसीदास जी कहते हैं कि मैं यह जानता हूं और दूसरों को भी समझाता हूं। आपकी कथा सुनने में ही इन कानों की सार्थकता है, परंतु इन कानों से हमेशा दूसरों के दोष सुन-सुनकर, उन्हें मन में दृढ़ता से भर-भर कर रखता हूं। और अपने हृदय में फूला नहीं समाता हूं।


#पद :

Tulsidas Ji Rachit Vinay Patrika Ke Pad 142 Ki Arth Sahit Vyakhya in Hindi

जेहि रसना गुन गाइ तिहारे, बिनु प्रयास सुख पावौं।
तेहि मुख पर-अपवाद भेक ज्यों रटि-रटि जनम नसावौं ।।4।।

करहु हृदय अति बिमल बसहिं हरि, कहि कहि सबहिं सिखावौं।
हौं निज उर अभिमान-मोह-मद खल-मंडली बसावौं ।।5।।

जो तनु धरि हरिपद साधहिं जन, सो बिनु काज गँवावौं।
हाटक-घट भरि धर् यो सुधा गृह, तजि नभ कूप खनावौं ।।6।।

व्याख्या :

जिस जीभ से आपके गुणों का गान गाकर मैं बिना परिश्रम के ही परमानंद को प्राप्त कर सकता हूं अर्थात् इस जिह्वा से आप के गुणगान करके, मैं बिना प्रयास से ही सुख को पा सकता हूं। लेकिन उसी मुख और उसी जिह्वा से मेंढक की तरह दूसरों की निंदा करता रहता हूं और इस जन्म को नष्ट करता रहता हूं। इस जीभ को परदोष कहने के लिये ही मान रखा है।

आगे तुलसीदास जी कहते हैं कि मैं यह बात सबको समझा-समझा कर सिखाता रहता हूं कि हृदय को शुद्ध बनाकर रखो, क्योंकि तभी उसमें ईश्वर जी बसते हैं। लेकिन अपने हृदय में अहंकार, मोह, मद जैसे दुष्टों की मंडली को बसाये रखता हूँ। मैं स्वयं तो महाविषयी हूँ, लेकिन सज्जन बनने का दूसरों को उपदेश देता हूं।

आगे तुलसीदास जी कहते हैं कि इस शरीर को धारण करके भक्तजन वैष्णव पद, मुक्तिपद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। इस शरीर को मैं बेकार ही खो रहा हूँ। घर में सोने के घड़े में अमृत भरा हुआ है। फिर उसे छोड़कर आकाश में कुआं खुदवा रहा हूँ। कहने का तात्पर्य है कि इस सोने सी देह में आत्मा रूपी अमृत भरा हुआ है, उसे छोड़कर कामरूपी जल की खोज में मारा-मारा फिरता हूँ।

#पद :

Vinay Patrika Pad Sankhya 142 Bhavarth Sahit Vyakhya in Hindi

मन-कर्म-बचन लाइ कीन्हे अघ, ते करि जतन दुरावौं।
पर-प्रेरित इरषा बस कबहुँक किय कछु सुभ, सो जनावौं ।।7।।

बिप्र-द्रोह जनु बाँट पर् यो, हठि सबसों बैर बढ़ावौ।
ताहूपर निज मति-बिलास सब संतन माँझ गनावौं ।।8।।

निगम सेस सारद निहोरि जो अपने दोष कहावौं।
तौ न सिराहिं कलप सत लगि प्रभु, कहा एक मुख गावौं ।।9।।

व्याख्या :

तुलसीदास जी कह रहे हैं कि मन-वचन-कर्म से मैंने जो भी पाप किये हैं, उन्हें बड़े प्रयत्न के साथ छुपाता रहता हूं। कभी मैंने कोई अच्छा काम किया तो मैं उसका ढिंढोरा पीटते रहता हूँ।

आगे कहते हैं कि ब्राह्मणों के साथ द्रोह करना जैसे मेरे हिस्से में ही आ गया है। मैं सब से बैर करता फिरता हूँ। इतना सब होने पर भी अपनी बुद्धि का प्रयोग करके मैं अपने आप को संतो की श्रेणी में गिनता हूं।

तुलसीदास जी कहते हैं कि वेद, शेषनाग और सरस्वती जी का निहोरा करके भी यदि मैं अपने दोषों का बखान कराऊँ तो भी ये सौं कल्पों तक समाप्त नहीं होंगे। इतने दोष मुझमें भरे पड़े हैं तो फिर मैं एकमुख से उनका क्या वर्णन करूँ ?

#पद :

Vinay Patrika Pad Sankhya 142 Vyakhya – Tulsidas in Hindi

जो करनी आपनी बिचारौं, तौं कि सरन हौं आवौं।
मृदुल सुभाउ सील रघुपतिको, सो बल मनहिं दिखावौं ।।10।।

तुलसिदास प्रभु सो गुन नहिं, जेहि सपनेहुँ तुमहिं रिझावौं।
नाथ-कृपा भवसिंधु धेनुपद सम जो जानि सिरावौं ।।11।।

व्याख्या :

तुलसीदास जी आगे कहते हैं कि यदि मैं अपनी करनी पर विचार करने लगूँ तो क्या मैं आपकी शरण में आ सकता हूँ ? कहने का आशय यह है कि मैं बहुत बड़ा पापी हूं। मैं आपकी शरण में आ ही नहीं सकता हूँ। लेकिन तुलसीदास जी कहते हैं कि रघुनाथ जी का स्वभाव बहुत कोमल है। उनका शील असीम है। इसलिए यह बल अपने मन को दिखाता रहता हूं ।

कहने का तात्पर्य है कि जब रघुनाथ जी इतने कोमल स्वभाव वाले और दयालु है तो वो मुझ जैसे पापी का उद्धार क्यों नहीं करेंगे ? ये ही सोचकर अपने मन को हिम्मत देता रहता हूँ।

आगे तुलसीदास जी कहते हैं कि हे प्रभु ! इस तुलसीदास के पास एक भी गुण ऐसा नहीं है, जिसके बल पर आपको सपने में भी प्राप्त कर सकूँ, लेकिन हे नाथ ! आपकी कृपा के आगे यह संसार गाय के खुर के समान हैं। यह सोचकर मैं मन में संतोष कर लेता हूँ कि अपने में कोई साधन ना होने पर भी मैं, आपकी कृपा से इस संसार सागर को अनायास ही पार कर जाऊंगा।

इसप्रकार दोस्तों ! ये थी विनय पत्रिका से पद संख्या 142 की व्याख्या। फिर मिलते है कुछ नये पदों की व्याख्या के साथ। धन्यवाद !


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एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Vinay Patrika Pad विनय पत्रिका के पद संख्या 142 की व्याख्या के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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