Uttar Kand Saar रामचरितमानस उत्तरकांड व्याख्या – भाग 11


Ramcharitmanas Uttar Kand Saar in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! आज के लेख में हम तुलसीदास रचित श्री रामचरितमानस के “उत्तरकाण्ड” के आगामी दोहों की व्याख्या करने वाले है तो ध्यान से समझियेगा :

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Uttar Kand Saar रामचरितमानस उत्तरकांड व्याख्या


Ramcharitmanas Uttar Kand Saar Part 11 in Hindi : दोस्तों ! उत्तरकाण्ड के आगामी दोहों एवं छन्दों की विस्तृत व्याख्या निम्नप्रकार से है :

राम राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुति

दोहा :

Uttar Kand Dohe Saar Vyakhya in Hindi

सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार।
अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार।।13 क।।

बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर।
बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर।।13 ख।।

व्याख्या :

तुलसीदास जी कहते हैं कि ये सब देखते हुये वेदों ने यह श्रेष्ठ विनती की और वे अंतर्ध्यान हो गये तथा ब्रह्मलोक को चले गये।

हे गरुड़ ! सुनिये, तब वहाँ शिवजी आये, जहाँ श्रीराम जी थे और गदगद वाणी से विनय करने लगे। उनका शरीर पुलकावली से पूर्ण हो गया। शिवजी विनय करते हुये कहते हैं।

छंद :

Uttar Kand Chhand Saar in Hindi

जय राम रमारमनं समनं। भवताप भयाकुल पाहि जनं।।
अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो।।1।।

दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा।।
रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे।।2।।

व्याख्या :

भगवान शंकर जी कहते हैं कि हे राम ! हे रमारमन ! इस संसार के ताप को नष्ट करने वाले राम जी ! आपकी जय हो। आवागमन के भय से व्याकुल, इस सेवक की रक्षा कीजिए। हे अयोध्या नाथ ! हे देवताओं के स्वामी ! हे रमापति ! मैं शरणागत आपसे यही मांगता हूं। हे विभो !मेरी रक्षा कीजिए।

10 सिर और 20 भुजाओं वाले रावण का विनाश करने वाले, पृथ्वी के महारोग को दूर करने वाले राम जी ! राक्षसों के समूह रूपी जो पतंगे थे, वे आपके बाण रूपी अग्नि के प्रचंड तेज से भस्म हो गये।

छंद :

Ramcharitmanas Uttar Kand Chhand Saar in Hindi

महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं।
मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी।।3।।

मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए।।
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावँर भूलि परे।।4।।

व्याख्या :

आप पृथ्वी मंडल के अत्यंत सुंदर भूषण हैं। आप श्रेष्ठ बाण, धनुष और तरकश धारण किये हुये हैं। मद, मोह और महा ममता रूपी रात्रि के अंधकार का नाश करने के लिये आप सूर्य की तेजोमय किरणों के समान है।

कामदेव रूपी भील ने मनुष्य रूपी हिरणों के ह्रदय में कुभोग रूपी बाण मारकर उन्हें गिरा दिया है। उसे मारकर हे नाथ ! विषय रूपी वन में भूले पड़े इन पामर अनाथ जीवों की रक्षा कीजिए।

छंद :

Tulsidas Uttar Kand Chhand Saar in Hindi

बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए।।
भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते।।5।।

अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह कें पद पंकज प्रीति नहीं।।
अवलंब भवंत कथा जिन्ह कें। प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें।।6।।

व्याख्या :

तुलसीदास जी कहते हैं कि लोग बहुत से रोगों और वियोगों से मारे हुये हैं। ये आपके चरणों के निरादर के फल हैं। जो आपके चरण कमलों से प्रेम नहीं करते, वे मनुष्य अथाह भवसागर में पड़े हैं।

जिनकी आपके चरण कमलों में प्रीति नहीं है, वे अत्यंत दीनहीन, मलीन एवं दु:खी रहते हैं। जिन्हें आपकी कथा का ही आधार है, उन्हें संत और भगवान सदा अत्यंत प्रिय लगते हैं।

छंद :

Ramcharitmanas Uttar Kand Chhand Arth Saar in Hindi

नहिं राग न लोभ न मान सदा। तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा।।
एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा।।7।।

करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ।।
सम मानि निरादर आदरही। सब संतु सुखी बिचरंति मही।।8।।

व्याख्या :

तुलसीदास जी कह रहे हैं कि उन्हें ना राग है, ना लोभ है, ना मान और ना मद। उनके लिये संपत्ति और विपत्ति समान है। इसी से मुनि लोग योग का भरोसा हमेशा के लिये त्याग देते हैं और प्रसन्नता के साथ आपके सेवक हो जाते हैं।

वे निरंतर नियम लेकर शुद्ध हृदय से आपकी सेवा करते रहते हैं। अपमान और सम्मान को समान मानकर वे सब संत सुखी होकर पृथ्वी पर विचरण करते हैं।

छंद :

Ramcharitmanas Uttar Kand Chhand Bhavarth Saar Vyakhya in Hindi

मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे।।
तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी।।9।।

गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं।।
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं।।10।।

व्याख्या :

हे मुनियों के मन रूपी कमल के भ्रमर ! हे महारणधीर और अजेय श्रीराम जी ! मैं आपको भजता हूँ । हे हरि ! आपका नाम जपता हूँ और आपको नमस्कार करता हूँ। आप जन्म-मरण रूपी रोग की औषधि और अभिमान के शत्रु हैं।

आप गुण, शील और कृपा के परम स्थान है। हे लक्ष्मीरमण ! मैं निरंतर आपको प्रणाम करता हूँ। हे रघुनंदन ! मेरे द्वंद समूह का नाश कीजिए। पृथ्वी की पालना करने वाले हे राजन ! आप इस दीनजन पर भी दृष्टि डालिए।

दोस्तों ! आज हमने उत्तरकाण्ड के कुछ दोहों और छंदों को विस्तारपूर्वक समझा है। इसी तरह से आगे भी हम इसे विस्तार से समझने वाले है। जो टॉपिक परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी होता है, उसे हम आपके हित को ध्यान में रखते हुये पूरा ही समझाने का प्रयास करते है। इसलिए धैर्य बनाये रखे और हमारा सहयोग करे।


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एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Uttar Kand Saar रामचरितमानस उत्तरकांड व्याख्या – भाग 11 के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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