Uttar Kand Bhavarth रामचरितमानस उत्तरकांड – भाग 10


Ramcharitmanas Uttar Kand Bhavarth Meaning in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! जैसाकि हम तुलसीदास रचित श्री रामचरितमानस के “उत्तरकाण्ड” का विस्तार से अध्ययन कर रहे है। इसी श्रृंखला में हम इसके आगामी दोहों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत कर रहे है। तो चलिए समझ लेते है :

आप गोस्वामी तुलसीदास कृत “श्री रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड” का विस्तृत अध्ययन करने के लिए नीचे दी गयी पुस्तकों को खरीद सकते है। ये आपके लिए उपयोगी पुस्तके है। तो अभी Shop Now कीजिये :


Uttar Kand Bhavarth रामचरितमानस उत्तरकांड व्याख्या


Ramcharitmanas Uttar Kand Bhavarth Part 10 in Hindi : दोस्तों ! उत्तरकाण्ड के आगामी दोहों की विस्तृत व्याख्या इसप्रकार से है :

राम राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुति

दोहा :

Uttar Kand Dohe Bhavarth Vyakhya in Hindi

वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस।
बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस॥12 क॥

भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम।
बंदी बेष बेद तब आए जहँ श्रीराम॥12 ख॥

प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान।
लखेउ न काहूँ मरम कछु लगे करन गुन गान॥12 ग॥

व्याख्या :

हे गरुड़ ! वह शोभा, वह समाज और वह सुख मुझसे कहते नहीं बनता। सरस्वती, शेष और वेद निरंतर उसका वर्णन करते हैं और उसका रस शिवजी ही जानते हैं।

सब देवता अलग-अलग स्तुति करके अपने-अपने लोक को चले गये। तब भाटों का वेश धारण करके वेद वहां आये, जहां श्रीराम थे।

सर्वज्ञ  और कृपा के धाम प्रभु श्री राम ने उनको भोज के लिये आदर किया। यह रहस्य किसी ने कुछ भी नहीं जाना। वे गुणगान करने लगे।

छंद :

Uttar Kand Chhand Bhavarth Saar in Hindi

जय सगुन निर्गुन रूप रूप अनूप भूप सिरोमने।
दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने।।
अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दु:ख दहे।
जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे।।1।।

तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे।
भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे।।
जे नाथ करि करुना बिलोकि त्रिबिधि दु:ख ते निर्बहे।
भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे।।2।।

व्याख्या :

सगुण और निर्गुण रूप वाले हे राजाओं के शिरोमणि श्रीराम जी ! आपकी जय हो। आपने रावण आदि प्रचंड राक्षसों और बड़े बलिद्ध दुष्टों को अपने भुजबल से मार डाला। आपने मनुष्य का अवतार लेकर संसार के भार को नष्ट करके, अत्यंत कठोर दु:खों को जला दिया है। हे शरणागतों को पालने वाले ! हे दयालु प्रभु ! आपकी जय हो, मैं शक्ति सहित अर्थात् सीता सहित आपको नमस्कार करता हूं।

तुलसीदास जी कहते हैं कि हे हरि ! आपके विषम माया के वश में देवता, असुर, नाग, नर, चर और अचर सब हैं। ये सब काल-कर्म और गुणों से भरे हुये रात-दिन संसार के आवागमन के मार्ग में भटक रहे हैं। इनमें से जिनको आपने दया करके देखा, वे तीनों प्रकार के दुखों से छुटकारा पा गये। संसार के दुखों को नष्ट करने में कुशल श्रीराम जी हमारी रक्षा कीजिए। हम आपको नमस्कार करते हैं।

छंद :

Ramcharitmanas Uttar Kand Chhand Bhavarth in Hindi

जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी।
ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी।।
बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे।
जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे।।3।।

व्याख्या :

दोस्तों ! जो मिथ्या ज्ञान के अभिमान में मतवाले हैं और संसार के दुखों को हरने वाली आपकी भक्ति का आदर नहीं करते। हे हरि ! वे देव-दुर्लभ पद पाकर भी उस पद से गिर पड़ते हैं। यह हम देख रहे हैं।

और जो सब प्रकार की आशाएं छोड़कर, आप पर विश्वास करके आपका दास होकर रहते हैं। वे केवल आपका नाम जप करके ही भवसागर से तर जाते हैं। हे नाथ ! ऐसे हम आपका स्मरण करते हैं।

छंद :

Tulsidas Uttar Kand Chhand Bhavarth in Hindi

जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी।
नख निर्गता मुनि बंदिता त्रैलोक पावनि सुरसरी।।
ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे।
पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे।।4।।

व्याख्या :

जो चरण शिवजी और ब्रह्माजी को भी पूज्य हैं तथा जिन चरणों की शुभ रज के स्पर्श से गौतम मुनि की पत्नी अहिल्या, जो शिला बनी हुई थी, वो भी तर गई।

जिन चरणों के नख से मुनियों द्वारा वंदना की गयी, त्रैलोक को पवित्र करने वाली गंगाजी निकलीं तथा ध्वजा, वज्र अंकुश और कमल आदि चिह्नों से युक्त जिन चरणों में वन में फिरते समय काँटे चुभ गये। हे मुकुन्द ! हे श्रीराम ! हे रमापति ! आपके उन्हीं दोनों चरणकमलों को हम रोजाना भजते रहते हैं।

छंद :

Ramcharitmanas Uttar Kand Chhand Bhavarth Arth Vyakhya in Hindi

अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने।
षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने।।
फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।
पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे।।5।।

जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं।
ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं।।
करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं।
मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं।।6।।

व्याख्या :

वेदों में कहा गया है कि जिसका मूल अव्यक्त है, अनादि है, जिसके चार त्वचाएँ, छह तने, पच्चीस शाखाएँ है तथा जिसके अनेकों पत्ते और बहुत से फूल हैं, जिसके फल कड़वे और मीठे दोनों प्रकार के है, जिस पर एक ही बेल आश्रित रहती है, जिस पर रोजाना नए पत्ते और फूल निकलते रहते हैं, ऐसे वृक्ष स्वरूप संसार अर्थात् विश्व रूप में प्रकट श्री राम जी को हम नमस्कार करते हैं।

जो ब्रह्म अजन्मा है, अद्वैत है और केवल अनुभव से ही जाना जा सकता है तथा मन से परे है, ऐसे ब्रह्म का जो ध्यान करते हैं, वे ऐसा कहा करें और जाना करें, लेकिन हे नाथ ! हम तो रोजाना आपके सगुण यश का गान करते है।

हे करुणा के धाम प्रभु ! हे सद्गुणों की खान ! हम आपसे यह वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्म से विकारों का त्याग करके, आपके चरणों का ही अनुराग करे अर्थात् आपके चरण कमलों से ही प्रेम करे।

इसप्रकार दोस्तों ! आज हमने उत्तरकाण्ड के आगामी दोहों और छंदों को विस्तारपूर्वक जाना और समझा। फिर से मिलते है अगले अंक में।


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एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Uttar Kand Bhavarth रामचरितमानस उत्तरकांड – भाग 10 के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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