Contents

Surdas Ka Bharmar Geet Saar | भ्रमरगीत सार के पदों की व्याख्या


Surdas Ka Bharmar Geet Saar in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! आज हम सूरदास रचित और रामचंद्र शुक्ल द्वारा संपादित “भ्रमरगीत सार” के पद संख्या #30-32 की विस्तृत व्याख्या कर रहे है। ध्यान से समझने की कोशिश कीजियेगा :

आप रामचंद्र शुक्ल द्वारा सम्पादित भ्रमरगीत सारका विस्तृत अध्ययन करने के लिए नीचे दी गयी पुस्तकों को खरीद सकते है। ये आपके लिए उपयोगी पुस्तके है। तो अभी Shop Now कीजिये :


Surdas Ka Bharmar Geet Saar | भ्रमरगीत सार व्याख्या [#30-32 पद]


Surdas Ka Bharmar Geet Saar Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! “भ्रमरगीत सार” के 30-32 तक के पदों की व्याख्या इसप्रकार से है :

#पद : 30.

Surdas Ka Bharmar Geet Saar Raag Dhanashri Arth Vyakhya in Hindi

राग धनाश्री
हमतें हरि कबहूँ न उदास।
राति-खवाय पिवाय अधररस सो क्यों बिसरत ब्रज को वास।।
तुमसों प्रेमकथा को कहिबो मनहुँ काटिबो घास।
बहिरो तान-स्वाद कह जानै, गूँगो बात-मिठास।।
सुनु री सखी, बहुरि फिरि ऐहैं वे सुख बिबिध विलास।
सूरदास ऊधो अब हमको भयो तेरहों मास।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. कबहूँकभी भी
02. रातिप्रेमपूर्वक
03. पिवायपिलाकर
04.अधरहोंठ
05.बिसरतभूलना
06.काटिबोघास काटना
07.तान-स्वादसंगीत का आनंद
08. बहुरिफिर
09.तेरहों मासअवधि बीत जाना

व्याख्या :

गोपियाँ उधर से कहती है कि हे उद्धव ! हमारे प्रभु हमसे कभी उदासीन नहीं हो सकते, क्योंकि वे ब्रजभूमि में अपना बिताया हुआ समय कभी भी भूल नहीं पायेंगे। जब वे हमारे पास थे तो हमने उन्हें प्रेमपूर्वक माखन खिलाया था और प्रेम की अवस्था में, हमने अपने अधरों से प्रेम के रस का पान कराया था। इसलिए वे इस ब्रजभूमि का निवास कभी भी भूल नहीं पायेंगे।

लेकिन तुम्हारे सामने तो इस प्रेम कथा का वर्णन करना मानो घास काटने के समान है। अर्थात् तुमसे माथापच्ची करना व्यर्थ है, क्योंकि ना तो तुम इसके महत्व को जान सकते हो और ना ही इससे आनंदित हो सकते हो। तुम्हारी मति तो उस बहरे के समान है, जो संगीत के उतार-चढ़ाव से विस्मृत मधुर तानों का स्वाद नहीं जानता और गूंगा व्यक्ति प्रेमालाप से उत्पन्न रस को ग्रहण नहीं कर सकता। इसलिए या तो तुम बहरे हो या गूंगे हो। या तो तुम्हारी मति उस बहरे मनुष्य के समान है अथवा गूंगे व्यक्ति के समान है।

एक गोपी अपनी सखी अर्थात् दूसरी गोपी से कहती है कि हे सखी ! सुनो, क्या हमारे जीवन में पुन: वही सुख, अनेक प्रकार की प्रेमकलियाँ कभी आयेंगी ? क्या हमारे श्री कृष्ण पुन: ब्रज आयेंगे और हमारे साथ वही प्रेमक्रीड़ाये करेंगे ? अब तो उनके आने का समय भी आ गया है।

सूरदास जी कहते हैं कि अब तो श्री कृष्ण के आने का समय भी आ गया है, क्योंकि जितने समय के लिए वे गये थे, वो अवधि अब समाप्त हो गई है। इसलिए हमें यह आशा है कि वे शीघ्र ही लौट आयेंगे।


#पद : 31.

Surdas Ka Bharmar Geet Saar Arth with Hard Meaning in Hindi

तेरो बुरो न कोऊ मानै।
रस की बात मधुप निरस, सुनु, रसिक होत सो जानै।।
दादुर बसै निकट कमलन के जन्म न रस पहिंचानै।
अलि अनुराग उड़न मन बाँध्यो कहे सुनत नहिं कानै।।
सरिता चलै मिलन सागर को कूल मूल द्रुम भानै
कायर बकै, लोह तें भाजै, लरै जो सूर बखानै।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01.मधुपभौंरा
02.निरसनीरस
03.रसिकप्रेमी
04.दादुरमेंढक
05. अलिभौंरा
06.अनुरागप्रेम
07.मूलजड़ सहित
08. भानै नष्ट करना
09.लोहलोहा
10.लरैयुद्ध करें
11. सूर वीर
12.बखानैवर्णन करना

व्याख्या :

दोस्तों ! गोपियाँ उद्धव के ज्ञानोपदेश पर व्यंग्य कर रही हैं। भ्रमर को आधार बनाकर, उद्धव को लक्ष्य करके कहती हैं कि हे नीरस स्वभाव वाले भ्रमर ! सुन, तेरी बात का बुरा यहां कोई नहीं मानता, क्योंकि प्रेम की रस भरी बातें वही समझ सकता है, जो स्वयं प्रेमी और रसिक हो।

गोपियाँ उद्धव से कहती है कि जो मेंढक होता है, वह अपना पूरा जीवन कमल के फूलों के निकट बिताता है, किंतु फिर भी कमल के पराग से प्राप्त रस को पहचानने में सर्वथा असमर्थ होता है। जो भ्रमर होता है, वह कमल के रस के पराग को पहचानता है। वह उसका सच्चा पारखी है और इसलिए वह उससे अनुराग रखता है।

वास्तव में उसका मन कमल में बंधकर रह जाता है, इसलिए वह कहीं भी हो, कमल के पास तत्काल उड़ कर आ जाता है। मार्ग में वह किसी भी बाधक की बिल्कुल भी परवाह नहीं करता है और ना ही किसी की बातों की परवाह करता है।

सूरदास जी कहना चाहते हैं कि उद्धव का जीवन मेंढक के समान बेकार है, क्योंकि वह श्री कृष्ण रूपी कमल के पास रहते हुये भी उनकी रसिक वृत्ति से परिचय प्राप्त नहीं कर सका और जीवन भर प्यासा ही रहा। जबकि गोपियों का मन भ्रमर के समान उनके प्रेम के मर्म को जानता है। तभी तो सदा उनके पास उड़कर जाना चाहता है और ऐसा करने में वह किसी लोक मर्यादा, कुल आदि के गौरव की किसी भी बाधा की तनिक भी परवाह नहीं करता।

Surdas Ka Bharmar Geet Saar in Hindi

सूरदास जी कहते हैं कि सरिता की गति भौरे के समान ही है। जब वह अपने प्रियतम – सागर के प्रेमवश उससे मिलने के लिए चल पड़ती है, तब मार्ग की बाधाएं –किनारे पर उत्पन्न लताक्रमों को उखाड़ कर नष्ट कर देती है। तुम्हारे जैसा व्यक्ति ही विचार-विमर्श करता है, परंतु हम जैसी जो प्रेमजन है, वे लोक-मर्यादाओं को त्यागकर अपने प्रिय से एकाकार हो जाती है।

सूरदास जी कहते हैं कि कायर व्यक्ति केवल बातों का धनी होता है। लोहा देखकर या हथियार देखकर वह भाग खड़ा होता है। वस्तुतः वीर तो वही है, जो युद्ध में सम्मुख होकर संघर्ष करता है और विजयश्री का वरण करता है।

कवि कहना चाह रहे हैं कि उद्धव वस्तुतः कायर है, क्योंकि वह योगज्ञान से प्राप्त ब्रह्म संबंधी कोरी बातों में विश्वास करता है और अपने निकट बसने वाले श्री कृष्ण को पहचानने का प्रयत्न नहीं करता। उनसे प्रेम की लौ लगाकर अपना जीवन सफल नहीं करना चाहता। प्रेम करना रण क्षेत्र के युद्ध के समान साहस का कार्य है। तभी तो कोरी बातों का सहारा लेने वाला उद्धव प्रेम के क्षेत्र में गोपियों की समानता नहीं कर सकता।


#पद : 32.

Surdas Ka Bharmar Geet Saar Vyakhya Shabdarth Sahit in Hindi

घर ही के बाढ़े रावरे
नाहिंन मीत बियोगबस परे अनवउगे अलि बावरे !
भुखमरि जाय चरै नहिं तिनुका सिंह को यहै स्वभाव रे।
स्रवन सुधामुरली के पोषे जोग-जहर न खवाव, रे !
ऊधो हमहि सीख का दैहो ? हरि बिनु अनत न ठाँव रे !
सूरदास कहा लै कीजै थाही नदिया नाव, रे !

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. बाढ़े बढ़-चढ़ कर बातें करने वाले
02.रावरेतुम, प्रिय
03. अलि भौंरा
04.बावरेपगला
05. तिनुका घास
06. स्रवन कान
07. सुधा-मुरली मुरली की धुन रूपी अमृत
08.पोषेपोषण किये गये
09. खवाव खिलाओ
10. ठाँव स्थान
11.थाहीउथली
12. नदिया नदी

व्याख्या :

दोस्तों ! गोपियाँ उद्धव से कह रही है कि तुम घर के ही शेर हो अर्थात् बढ़-चढ़कर बातें ही करने वाले हो । तुम बातों के शेर हो। तुम्हारे जैसे ज्ञान योग का गुणगान करने वाले घर पर बैठे-बैठे ही बड़ी-बड़ी बातें बनाते हैं और कोई काम उनसे नहीं होता। हे बावरे भ्रमर ! सुनो, तुमने अभी तक अपने प्रिय का वियोग नहीं सहा। जब तुम यह वियोग सहोगे, जब तुम्हारे लिए ऐसा अवसर आयेगा, तभी तुम जान पाओगे कि वियोग को सहना कितना दुखदायी और प्राणान्तक होता है।

गोपियाँ कहती है कि हे उद्धव ! शेर का ऐसा स्वभाव होता है कि वह चाहे भूखो मर जाये किंतु वह घास नहीं खायेगा और ना ही वह किसी अन्य के किये हुये शिकार से अपने पेट की भूख को शांत करेगा। वह खुद का शिकार करके ही अपने पेट की भूख को शांत करता है। सिंह के समान ही हम भी अपने श्री कृष्ण प्रेम में दृढ है। चाहे इस प्रेम के वियोग की व्यथा से हमारे प्राण निकल जाये, किंतु हम श्री कृष्ण के प्रेम को नहीं छोड़ेंगे और तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म को स्वीकार नहीं करेंगे।

हमारे लिए श्री कृष्ण ही सब कुछ है। हमारे कान हमेशा श्री कृष्ण की मुरली की अमृत के समान मधुर तान से पोषण प्राप्त करते रहे हैं और ये अब उन तत्वों के सुनने के अभ्यस्त हो चुके हैं। तुम इन्हें विष के समान कटु योग की बातें सुनाकर व्यथित मत करो। हे उद्धव ! तुम हमें क्या शिक्षा दोगे ? क्या उपदेश दोगे ? हे उद्धव ! हमारे लिए तो भगवान श्री कृष्ण ही एकमात्र आसरा है। उनके अतिरिक्त हमें शरण पाने के लिए अन्य कोई स्थान है ही नहीं।

Surdas Ka Bharmar Geet Saar in Hindi

हम तो श्री कृष्ण में ही मग्न है। हमारे लिए यह संसार ऐसी उथली नदी के समान है, जिसको पार करने के लिए किसी नाव रूपी सहारे की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए हमारे लिए तुम्हारा योग रूपी सम्बल बेकार है। हम उसको लेकर क्या करेंगे ? वास्तव में हमें इसकी कोई आवश्यकता ही नहीं है। यह हमारे लिए निरर्थक है।

दोस्तों ! सूरदास जी कहना चाहते हैं कि यह संसार उद्धव जैसे ज्ञानियों के लिए अथाह और अगम्य हो सकता है और उसे पार करने के लिए, उन्हें निर्गुण ब्रह्म रूपी सहारे की आवश्यकता हो सकती है, किंतु श्री कृष्ण के प्रेम में लीन गोपियों के लिए यह संसार उथली नदी के समान है, सहज है, जिसे भक्ति और विश्वास से ही तैरा जा सकता है।

दोस्तों ! इस पद में योगमार्गियों द्वारा भवसागर को पार करना कठिन बताया जाने वाला जो सिद्धांत है, उस पर व्यंग्य किया गया है। जो प्रेममार्गी संत हैं, संसार को सरल, ग्राह्य और मधुर स्वीकार करते हैं। प्रस्तुत पद में सहज प्रेम को ही भक्ति बताया गया है।

दोस्तों ! अब तक हमने Surdas Ka Bharmar Geet Saar | भ्रमरगीत सार के कुल 32 पदों की विस्तृत व्याख्या समझ ली है। उम्मीद है कि आपको समझने में कोई कठिनाई नहीं हो रही होगी। आगे की व्याख्या के साथ फिर से मिलते है।

ये भी अच्छे से समझे :


एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Surdas Ka Bharmar Geet Saar | भ्रमरगीत सार के पदों की व्याख्या के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

नोट्स अच्छे लगे हो तो अपने दोस्तों को सोशल मीडिया पर शेयर करना ना भूले I नोट्स पढ़ने और HindiShri पर बने रहने के लिए आपका धन्यवाद..!


Leave a Comment

error: Content is protected !!