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Surdas – Bhramar Geet Saar | भ्रमरगीत सार के पदों की व्याख्या


Surdas – Bhramar Geet Saar in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! हमने रामचंद्र शुक्ल द्वारा संपादित “भ्रमरगीत सार” के अब तक कुल 20 पदों का अध्ययन कर लिया है। इसी क्रम में आज हम पद संख्या #21-23 की व्याख्या करने जा रहे है :

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Surdas – Bhramar Geet Saar | भ्रमरगीत सार व्याख्या [#21-23 पद]


Surdas – Bhramar Geet Saar Vyakhya : दोस्तों ! “भ्रमरगीत सार” के 21-23 तक के पदों की विस्तृत व्याख्या निम्नप्रकार से है :

#पद : 21.

Surdas – Bhramar Geet Saar Raag Kedar Vyakhya Bhavarth in Hindi

राग केदार
गोकुल सबै गोपाल-उपासी
जोग-अंग साधत जे ऊधो ते सब बसत ईसपुर कासी।।
यद्यपि हरि हम तजि अनाथ करि तदपि रहति चरननि रस-रासी
अपनी सीतलताहि न छाँड़त यद्यपि है ससि राहु-गरासी
का अपराध जोग लिखि पठवत प्रेमभजन तजि करत उदासी
सूरदास ऐसी को बिरहिन माँगति मुक्ति तजे गुनरासी ?

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01.सबैसभी
02.उपासीउपासना करने वाले
03. जोग-अंगयोग के आठ अंग
04.ईसपुरशिवपुरी ,महादेव की नगरी
05.तजिछोड़कर
06.रस-रासीरस में छंकि
07.ससिचाँद
08.गरासीग्रसित
09.उदासीउदास, विरागी
10. गुनरासीगुण-समूह

व्याख्या :

गोपियां उद्धव से कहती है कि गोकुल में सभी नर-नारी उस गोपाल के उपासक हैं। हे उद्धव ! जो लोग तुम्हारे इस अष्टांग योग की साधना करने वाले हैं, वे यहां नहीं रहते हैं। वे सब शिव नगरी में निवास करते हैं। यद्यपि श्री कृष्ण ने हमें त्याग दिया है और अनाथ कर दिया है, फिर भी हम उनके चरणों की रूपराशि में ही रत हैं। श्री कृष्ण में ही हमारा अनुराग है। उनसे ही हमें प्रेम है।

यह उसी प्रकार संभव है, जिस प्रकार चंद्रमा राहु के द्वारा ग्रसित हो जाने पर भी अपनी शीतलता नहीं छोड़ता है, जो उसका स्वाभाविक गुण है। उसी प्रकार चाहे श्री कृष्ण हमें त्याग दें, परंतु हम अपना स्वाभाविक धर्म नहीं छोड़ेंगी। उनके चरणों में ही ध्यान मग्न रहेंगी। हमें यह समझ नहीं आता कि हमारे किस अपराध के दंड के रूप में श्री कृष्ण ने हमारे लिए योग का संदेश लिख भेजा है। वे हमें इस प्रकार हरिभक्ति छोड़कर संसार से विरक्त हो जाने को कहना चाहते हैं।

सूरदास जी कहते हैं कि ब्रज में ऐसी कौन विरहिणी है, जो गुणों की खान को छोड़कर अर्थात् श्रीकृष्ण को छोड़कर मुक्ति की कामना करती हो अर्थात् श्री कृष्ण के प्रेम के सम्मुख गोपियों के लिए निर्गुण की उपासना से प्राप्त मुक्ति का कोई महत्व नहीं है। हम सब के लिए तो श्री कृष्ण प्रेम-प्राण के समान है।


#पद : 22.

Surdas – Bhramar Geet Saar Raag Dhanashri Arth with Hard Meaning in Hindi

राग धनाश्री
जीवन मुँहचाही को नीको
दरस परस दिनरात करति हैं कान्ह पियारे पी को।।
नयनन मूँदि मूँदि किन देखौ बँध्यो ज्ञान पोथी को
आछे सुंदर स्याम मनोहर और जगत सब फीको।।
सुनौ जोग को का लै कीजै जहाँ ज्यान है जी को?
खाटी मही नहीं रुचि मानै सूर खवैया घी को।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. मुँहचाही प्रियतम को प्रिय
02.नीकोअच्छा
03.दरसदर्शन
04.परसस्पर्श
05. ज्ञान पोथी कोपुस्तकीय ज्ञान
06.आछेअच्छे
07.मनोहरमनमोहक
08.जगतसंसार
09.ज्यानजियान, हानि
10.महीमट्ठा, छाछ
11.खवैयाखाने वाला

व्याख्या :

गोपियाँ उद्धव से कह रही हैं कि हे उद्धव ! अपने प्रियतम को अच्छी लगने वाली प्रेमिका का ही जीवन अच्छा है। प्रियतम के मन में समाने के कारण, वह संसार के जीवन का फल भोग लेती है, इसलिए उसी का जीवन अच्छा है, उसी का जीवन सफल है। कुब्जा से ईर्ष्या का भाव प्रकट करते हुए गोपियां कहती हैं कि जीवन तो उस कुब्जा का ही सफल है, क्योंकि वह श्री कृष्ण की चहेती प्रेमिका है। वह अपने प्रियतम कन्हैया का प्रतिदिन दर्शन करती है अर्थात् उनको स्पर्श करती है और उनके स्पर्श से उसे शारीरिक सुख, आनंद भी प्राप्त होता है।

हे उद्धव ! ऐसा कौन है, जिसने आंखें मूंद-मूंद कर पुस्तक के ज्ञान को प्राप्त कर लिया हो अर्थात् आंखें खोलकर अध्ययन करने से ही पुस्तक ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है, उसी प्रकार प्रियतम के पास रहने से, दर्शन और स्पर्श से ही जीवन सफल नहीं होता। यह तो तभी संभव है, जब वह प्रेम की रीति से परिचित हो और प्रियतम को रिझाने में समर्थ हो। इसलिए कुब्जा को श्री कृष्ण के पास रहकर भी इतना सुख और आनंद प्राप्त नहीं होता, क्योंकि वह प्रेम करने की उचित रीति से परिचित नहीं है। जीवन तो सफल तभी होगा, जब वह प्रेम की उचित रीति से परिचित हो और प्रियतम को रिझाने में सफल हो।

Surdas – Bhramar Geet Saar

आगे गोपियां उद्धव से कहती है कि हम तुम्हारे ज्ञान योग को लेकर क्या करें ? यह हमारे किसी काम का नहीं है, क्योंकि इससे तो हमारा प्राण हानि का भय है। कवि कहना चाहते हैं कि योग साधना पर अमल करने से हमें हमारे प्राणप्रिय श्री कृष्ण से बिछड़ना पड़ेगा और यदि हम उनसे बिछड़ गए तो हमारा जीवित रहना संभव नहीं है, इसलिए तुम्हारे इस योग को अपना लेने में प्राणों की हानि का भय है।

सूरदास जी कहते हैं कि जिस प्रकार कोई व्यक्ति शुद्ध घी का प्रयोग करता है, वह व्यक्ति खट्टी छाछ पीकर प्रसन्न नहीं हो सकता, उसी प्रकार श्री कृष्ण के प्रेम-अमृत का पान करने वाला हमारा हृदय है, ये आपके योग की नीरस बातें सुनकर आनंदित नहीं होगा।


#पद : 23.

Surdas – Bhramar Geet Saar Raag Kaafi Shabdarth Sahit in Hindi

राग काफी
आयो घोष बड़ो ब्योपारी।
लादि खेप गुन ज्ञान-जोग की ब्रज में आय उतारी।।
फाटक दै कर हाटक माँगत भोरै निपट सु धारी
धुर ही तें खोटो खायो है लये फिरत सिर भारी।।
इनके कहे कौन डहकावै ऐसी कौन अजानी ?

अपनो दूध छांडि को पीवै खार कूप को पानी।।
ऊधो जाहु सबार यहाँ तें बेगि गहरु जनि लावौ।
मुँहमाँग्यो पैहो सूरज प्रभु साहुहि आनि दिखावौ।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01.घोषअहीरो की बस्ती
02.खेपमाल का बोझ
03.फाटकतत्वहीन
04.हाटकस्वर्ण
05.धारीसमझकर
06.धुरमूल
07. डहकावैधोखा खाए
08.अजानीमूर्ख अज्ञानी
09.खारखारा
10. कूपकुआं
11. सबारसवेरे
12. साहुहि साहूकार
13.आनिआकर

व्याख्या :

दोस्तों ! निर्गुण ब्रह्म की उपासना की शिक्षा देने आये उद्धव को गोपियां खरी-खोटी सुनाती है और कहती है कि आज हमारी इस अहीरों की बस्ती में एक बहुत बड़ा व्यापारी आया हुआ है। उसने ज्ञान और योग के गुणों से युक्त गठरी लाकर यहां ब्रज में उतार दी है। उसने हमें तो बिल्कुल भोला और अज्ञानी समझ लिया है। वह हमें फाटक देखकर हाटक चाहता है अर्थात् फ़टकन के समान जो तत्वहीन पदार्थ है, उसे देकर बदले में स्वर्ण चाहता है अर्थात् स्वर्ण के समान बहुमूल्य श्रीकृष्ण को मांग लिया है।

ऐसा लगता है कि इसने आरंभ से ही लोगों को ठगा है। तभी तो यह इस भारी बोझ को सिर पर लिए घूम रहा है। इस व्यापारी का सामान बिल्कुल व्यर्थ है। इसी कारण यह बिक नहीं रहा है और इसे हानि उठानी पड़ रही है। इसका सामान कोई भी नहीं खरीद रहा है। यहाँ हम में से ऐसी कौन अज्ञानी है, जो इसका माल खरीद कर धोखा खा जायेगी। आज तक ऐसा मूर्ख हमने कोई नहीं देखा, जो दूध छोड़कर के खारे कूंए का जल पियेगा।

हे उद्धव ! तुम यहां से शीघ्र ही चले जाओ और तुम्हारा जो महाजन है, यदि तुम उनसे हमें मिला दो, उनके दर्शन तुम करा दो तो तुम्हें मुंह मांगा पुरस्कार प्राप्त होगा अर्थात् तुम अपने सेठ रूपी श्री कृष्ण को लाकर के हमें उनके दर्शन करा दो तो तुम्हें मुंह मांगा इनाम मिलेगा।

दोस्तों ! आज हमने Surdas – Bhramar Geet Saar | भ्रमरगीत सार के 21 से 23 तक के पदों की व्याख्या को समझा । उम्मीद है कि आपको इन सभी पदों को समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई होगी। फिर से रूबरू होंगे नए पदों की व्याख्या के साथ।

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एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Surdas – Bhramar Geet Saar | भ्रमरगीत सार के पदों की व्याख्या के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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