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Shukla Ka Bharmar Geet Saar | भ्रमरगीत सार के पदों की व्याख्या


Shukla Ka Bharmar Geet Saar in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! आज के इस लेख में हम रामचंद्र शुक्ल द्वारा संपादित “भ्रमरगीत सार” के पद संख्या #27-29 की विस्तृत व्याख्या लेकर आये है। तो चलिए समझते है :

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Shukla Ka Bharmar Geet Saar | भ्रमरगीत सार व्याख्या [#27-29 पद]


Shukla Ka Bharmar Geet Saar Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! “भ्रमरगीत सार” के 27-29 तक के पदों की व्याख्या को निम्नप्रकार से समझिये :

#पद : 27.

Shukla Ka Bharmar Geet Saar Raag Malaar Arth Vyakhya in Hindi

राग मलार
हमरे कौन जोग ब्रत साधै?
मृगत्वच, भस्म, अधारि, जटा को को इतनो अवराधै?
जाकि कहूं थाह नहिं पैए अगम, अपार, अगाधै
गिरिधर लाल छबीले मुख पर इते बाँध को बाँधै?
आसन, पवन विभूति मृगछाला ध्याननि को अवराधै?
सूरदास मानिक परिहरि कै राख गाँठि को बाँधै?

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01.हमरेहमारे
02.साधैसाधन करें
03.अवराधैलकड़ी
04.अगाधैअथाह
05. बाँधबंधन
06.पवनवायु
07.विभूति राख
08.मानिकमोती
09. परिहरित्याग कर

व्याख्या :

इस पद में गोपियां कहती है कि हे उद्धव ! परमप्रिय सुंदर श्री कृष्ण को छोड़कर निर्गुण ब्रह्म की साधना करना, हम गोपियों के लिए पूर्णत: असंभव है। योग साधना की कठिनाइयों और बाहरी बंधनों एवं प्रयत्नों की आलोचना करती हुई गोपियां उद्धव से कहती है कि हे उद्धव ! हमारे यहाँ तुम्हारे योग व्रत की साधना कौन करे ? मृगशाला, भस्म आदि वस्तुओं को इकट्ठा करता कौन फिरे ? और अपने सिर पर जटाओं को कौन बांधे ?

तुम्हारा ब्रह्म तो ऐसा है, जिसकी कहीं भी थाह नहीं पाई जा सकती है। जो अगम्य, अथाह और अपार है। फिर कौन इतनी मुसीबत का सामना करते हुए उसकी आराधना करें ? फिर ऐसे ब्रह्म को कैसे प्राप्त किया जा सकता है ? इसलिए यह सब प्रयत्न करना व्यर्थ है।

हमारे सुंदर सजीले श्री कृष्ण के सुंदर मुख के दर्शन करने के लिए आसन, प्राणायाम, भस्म, मृगशाला आदि को एकत्र करना और फिर उनका ध्यान करना, इन सब बातों की बिल्कुल भी जरूरत नहीं पड़ती है। गोपियां कहना चाहती है कि जब तुम्हारे ब्रह्म का ध्यान करने के लिए इन सारी वस्तुओं को जुटाना आवश्यक है तो फिर ऐसा कौन मूर्ख होगा, जो इन प्रपंचो में पड़ करके उसकी साधना करता फिरे ?

ऐसा कौन मूर्ख है, जो अपने माणिक्य को त्याग कर उसके स्थान पर राख को अपनी गाँठ में बांधे ? हमारे श्री कृष्ण तो माणिक्य के समान अमूल्य हैं और तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म राख के समान तुच्छ है। सूरदास जी सगुणमार्गीय भक्ति का पक्ष लेते हुए इसे सरल और सहज बताते हैं, जबकि योगमार्गीय भक्ति को कठिन और असहज बताते हैं।


#पद : 28.

Shukla Ka Bharmar Geet Saar Raag Dhanashri Arth with Hard Meaning in Hindi

राग धनाश्री
हम तो दुहूं भाँति फल पायो।
जो ब्रजनाथ मिलैं तो नीको, नातरु जग जस गायो।।
कहँ वै गोकुल की गोपी सब बरनहीन लघुजाती
कहँ वै कमला के स्वामी सँग मिलि बैठीं इक पाँती।।

निगमध्यान मुनिज्ञान अगोचर, ते भए घोषनिवासी
ता ऊपर अब साँच कहो धौं मुक्ति कौन की दासी?
जोग-कथा, पा लागों उधो, ना कहु बारंबार।
सूर स्याम तजि और भजै जो तानी जननी छार।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01.हम तोहमने तो
02. दुहूं भाँतिदोनों तरह से
03.नीकोअच्छा
04. बरनहीननीच कुल की
05. लघुजातीनीची जाति की
06.कमला के स्वामीलक्ष्मी के पति
07. पाँतीपंक्ति
08.निगम वेद
09.अगोचरअप्राप्त
10.घोषनिवासीअहीरों की बस्ती में रहने वाले
11.छारराख

व्याख्या :

दोस्तों ! गोपियाँ उद्धव से कहती है कि हे उद्धव ! श्री कृष्ण-प्रेम का फल तो हमें दोनों ही ओर से प्राप्त हो जायेगा। यदि हमें हमारी इस विरह के अंत में ब्रजनाथ श्री कृष्ण मिल जाए तो बहुत अच्छी बात है और नहीं भी मिल पाते हैं तो मरने के बाद यह सारा संसार हमारा यश गान करेगा। इस पंक्ति का अर्थ यह भी लिया जा सकता है कि ब्रजनाथ श्रीकृष्ण मिल गए तो ठीक है; नहीं तो इस संसार में उनका यश गान ही सही, यश को गाकर ही संतुष्ट हो जाएंगे ।

कहाँ तो हम गोकुल की गोपियां जो वर्णहीन और लघु जाति की है अर्थात् नीच कुल और नीच जाति में जन्म लेने वाली है और कहाँ वह लक्ष्मीपति ब्रह्म स्वरूप श्री कृष्ण है। यह तो हमारा परम सौभाग्य ही था कि हमने उनसे प्रेम किया, हमें यह अवसर मिला और उन्होंने भी हमें प्रेम के योग्य समझा। हम उनके साथ एक पंक्ति में बैठ सकी अर्थात् उन्होंने हमें समानता का दर्जा दिया।

Shukla Ka Bharmar Geet Saar Vyakhya :

जिन भगवान का ध्यान वेद भी करते हैं, जिन्हें ज्ञानी मुनि भी प्रयत्न करने पर प्राप्त नहीं कर पाते, जो मुनियों के लिए भी अगोचर है, वह भगवान हम अहीरों की बस्ती में आकर के रहे। अब आप हमें यह बताओ कि मुक्ति किसकी दासी है ? यदि मुक्ति ब्रह्म की दासी है तो वह ब्रह्म श्री कृष्ण हैं। हम आपके पांव पड़ती हैं, आपकी इस योग की कथा को बार-बार हमें मत सुनाओ।

सूरदास जी लिखते हैं कि गोपियाँ कहती है कि हे उद्धव ! जो श्री कृष्ण को त्याग कर किसी और की उपासना करता है, उसकी जन्म देने वाली माता भी धिक्कार योग्य है। दोस्तों ! प्रस्तुत पद में ज्ञान योग पर भक्ति की विजय स्पष्ट दिखाई देती है। सूक्ष्म भाव की सहज और प्रभावी अभिव्यक्ति की गई है। श्री कृष्ण के प्रति गोपियों के अनन्य प्रेम को दर्शाया गया है।


#पद : 29.

Shukla Ka Bharmar Geet Saar Raag Kaanharo Arth Shabdarth Sahit in Hindi

राग कान्हरो
पूरनता इन नयन न पूरी
तुम जो कहत स्रवननि सुनि समुझत, ये याही दुख मरति बिसूरी
हरि अंतर्यामी सब जानत बुद्धि बिचारत बचन समूरी
वै रस रूप रतन सागर निधि क्यों मनि पाय खवावत धूरी
रहु रे कुटिल, चपल, मधुलंपट, कितव सँदेस कहत कटु कूरी
कहँ मुनिध्यान कहाँ ब्रजयुवती! कैसे जात कुलिस करि चूरी।
देखु प्रगट सरिता, सागर, सर सीतल सुभग स्वाद रुचि रूरी
सूर स्वातिजल बसै जिय चातक चित लागत सब झूरी।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01.पूरनतापूर्णता
02.नयनआखं
03.न पूरीनहीं जँचती
04. स्रवननिकानो से
05. याहीयह ही
06. बिसूरीबिलख-बिलख कर
07.समूरीपूर्ण रूप से
08.धूरीधूल-मिट्टी
09.चपलचंचल
10.मधुलंपटरस के लोभी
11.कूरीक्रूर, निष्ठुर
12.सरतालाब
13.सीतलठंडा
14. सुमधुर
15.रूरीअच्छी
16.चितमन
17.झूरीनीरस

व्याख्या :

इस पद में उद्धव के ज्ञानोपदेश को सुनकर गोपियाँ नाराज और खींची हुई है। वे कहती है कि हे उद्धव ! तुमने पूर्ण ब्रह्म का जो वर्णन किया है, उसकी अपूर्णता हमारे नेत्रों में नहीं समा पाती, वह हमें जँचती नहीं है। तुमने जो भी ब्रह्म की पूर्णता के बारे में बताया है, वह हम इन कानो से सुनकर समझने की कोशिश कर रही हैं, परंतु हमारी आंखें दुखने लगती है और बिलख-बिलख कर मरी जा रही हैं ।

इस बिलखने के दो कारण हो सकते हैं : एक तो यह कि इन्हें तुम्हारे बताए गए ब्रह्म की पूर्णता कहीं भी नजर नहीं आती है, दूसरा इन्हें भय है कि कहीं हम तुम्हारी बातों में आकर श्री कृष्ण को न छोड़ दे और तुम्हारे ब्रह्म को स्वीकार न कर ले।

गोपियाँ कहती है कि सभी को यह पता है कि भगवान अंतर्यामी है, बुद्धि द्वारा विचार करने पर हमें भी तुम्हारा यह वचन सत्य प्रतीत होता है, इस बात पर विश्वास होने लगता है। किंतु हमारे श्री कृष्ण तो प्रेम रूप और रत्नों के सागर हैं, वे अत्यंत मूल्यवान है। ऐसे माणिक को प्राप्त कर लेने पर तुम हमें धूल के समान तुच्छ अपने निर्गुण ब्रह्म को अपना लेने का उपदेश क्यों दे रहे हो ? तुम्हारा यह उपदेश व्यर्थ ही जाएगा, क्योंकि अब हम अपना धर्म बदलने वाली नहीं है।

भँवरे को संबोधित करते हुए उद्धव को खरी-खोटी सुनाते हुए गोपियाँ कहती है कि छली, चंचल, रस के लोभी, धूर्त भँवरे ठहर ! तू हमें इस तरह योग का कटु संदेश क्यों सुना रहा है ? हमें यह तो बता कि कहाँ मुनियों की ब्रह्म विषयक कटु साधना और कहाँ हम कोमलांगी ब्रज की युवतियां ? क्या तुझे कहीं भी समानता दिखाई देती है ?

Shukla Ka Bharmar Geet Saar Vyakhya :

क्या कठोर वज्र को तोड़कर चकनाचूर करना संभव है ? नहीं ना । उसी प्रकार हमारे लिए भी इस योग को करना असंभव है। संसार में सरिता, सागर और तालाब का जल मीठा, निर्मल और शीतल होता है। यह देखकर भी स्वाति जल के प्रेमी चातक के हृदय में तो केवल स्वाति नक्षत्र के समय, जो जल उपलब्ध होता है, उसी के प्रति प्रेम होता है। वह उसी का पान करके अपनी तृष्णा को शांत करता है।

अन्य जो स्रोत हैं, उनसे प्राप्त जल भले ही शीतल और मधुर हो, चातक के लिए वह नीरस है, उसी प्रकार तुम्हारा निर्गुण ब्रह्म निश्चय ही मुक्ति देने वाला हो सकता है, किंतु हमें तो केवल श्री कृष्ण प्रिय लगते हैं। हमें मुक्ति नहीं चाहिए, हमें तो श्री कृष्ण चाहिए। अतः हम तुम्हारे ब्रह्म को स्वीकार नहीं कर सकती। दोस्तों ! गोपियों ने चातक को आधार बनाकर अपने प्रेम की अनन्यता की घोषणा की है।

दोस्तों ! आज हमने Shukla Ka Bharmar Geet Saar | भ्रमरगीत सार के 27 से 29 तक के पदों की विस्तृत व्याख्या को जाना और समझा। अगले पदों को लेकर फिर मिलते है। धन्यवाद !

ये भी अच्छे से समझे :


एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Shukla Ka Bharmar Geet Saar | भ्रमरगीत सार के पदों की व्याख्या के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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