Contents

Ramcharitmanas Uttar Kand रामचरितमानस उत्तरकांड व्याख्या


Ramcharitmanas Uttar Kand in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! आज के अध्याय में हम तुलसीदास गोस्वामी रचित श्री रामचरितमानस के एक काण्ड या सोपान की व्याख्या प्रस्तुत करने जा रहे है। इस कांड का नाम है : उत्तरकाण्ड। ये कांड श्री राम कथा का उपसंहार भाग है। तो चलिये हम उत्तरकाण्ड को विस्तार से समझने की कोशिश करते है :

आप गोस्वामी तुलसीदास कृत “श्री रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड” का विस्तृत अध्ययन करने के लिए नीचे दी गयी पुस्तकों को खरीद सकते है। ये आपके लिए उपयोगी पुस्तके है। तो अभी Shop Now कीजिये :


Ramcharitmanas Uttar Kand रामचरितमानस उत्तरकांड अर्थ सहित


Ramcharitmanas Uttar Kand Arth Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! प्रस्तुत है – श्री रामचरित मानस के उत्तरकाण्ड के श्लोक, दोहे एवं चोपाईयों की विस्तृत व्याख्या :

सप्तम सोपान-मंगलाचरण

श्लोक :

Ramcharitmanas Uttar Kand Shlok Arth in Hindi

केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं
शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्।
पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं
नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम्।।1.।।

व्याख्या :

दोस्तों ! तुलसीदास जी कह रहे हैं कि मोर के कंठ की आभा के समान नीलवर्ण देवताओं में श्रेष्ठ, ब्राह्मण के चरण कमल के चिन्ह से सुशोभित, शोभा से पूर्ण, पीताम्बरधारी, कमलनेत्र, सदा प्रसन्न रहने वाले, हाथ में बाण और धनुष लिये हुये, वानर समूह से युक्त, भाई लक्ष्मण से सेवित, स्तुति किये जाने योग्य, सीतापति रघुश्रेष्ठ, पुष्पक विमान पर सवार श्री रामचंद्र जी को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक :

Ramcharitmanas Uttar Kand Shlok Bhavarth in Hindi

कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ।
जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसड्गिनौ।।2.।।

व्याख्या :

कौशलदेश के स्वामी श्री रामचंद्र जी के सुंदर और कोमल दोनों चरण कमल, जो ब्रह्मा और शिव जी से वन्दित है तथा सीता जी के कर कमलों से धुलवाये हुये हैं और ध्यान धरने वाले के मन रूपी भँवरे के सदा साथी है।

श्लोक :

Ramcharitmanas Uttar Kand Shlok Vyakhya in Hindi

कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्।
कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शंकरमनंगमोचनम्।।3.।।

व्याख्या :

तुलसीदास जी कहते हैं कि कुंद (एक प्रकार का फूल), चंद्रमा और शंख के समान गोरे और सुंदर, जगत जननी श्री पार्वती के पति, उचित फल देने वाले, दया करने वाले, सुंदर कमल के समान नेत्र वाले, कामदेव से छुड़ाने वाले शंकर जी को मैं नमस्कार करता हूँ।


भरत विरह तथा भरत-हनुमान मिलन, अयोध्या में आनंद

दोहा :

Ramcharitmanas Uttar Kand Dohe Vyakhya in Hindi

रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग।
जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग।।1.।।

व्याख्या :

दोस्तों ! उत्तरकांड के प्रारंभिक दोहे में तुलसीदास जी कहते हैं कि श्री रामचंद्र जी के लौटने की अवधि का एक ही दिन बाकी रह गया है। नगर के लोग बहुत अधीर हो रहे हैं।

दोहा :

Ramcharitmanas Uttar Kand Dohe Arth in Hindi

सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर।
प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर।।2.।।

कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ।
आयउ प्रभु श्री अनुज जुत कहन चहत अब कोइ।।3.।।

व्याख्या :

हृदय में ही सभी प्रकार के सुंदर शकुन होने लगे। सबके मन प्रसन्न हो गये। नगर चारों ओर से रमणीक हो गया। मानो ये चिन्ह प्रभु जी का आगमन सूचित कर रहे हो। कौशल्या आदि सब माताओं के मन में ऐसा आनंद हो रहा है, जैसे कोई अभी यही कहना चाहता हो कि सीता और लक्ष्मण सहित श्री राम जी आ गये हैं।

दोहा :

Ramcharitmanas Uttar Kand Dohe Bhavarth in Hindi

भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार।
जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार।।4.।।

व्याख्या :

तुलसीदास जी कहते हैं कि भरत की दाहिनी आँख और दाहिनी भुजा फड़क रही है। इसे शुभ शकुन जानकर उनके मन में बड़ा हर्ष हुआ और वे विचार करने लगे।


चौपाई :

Ramcharitmanas Uttar Kand Chaupai Arth in Hindi

रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा।।
कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ।।1.।।

व्याख्या :

भरत जी विचार करने लगे कि प्राणों का आधार स्वरूप अवधि का अब एक ही दिन रह गया है। यह सोचते ही उनके मन में अपार दु:ख हुआ। वे मन ही मन विचार कर रहे हैं कि क्या कारण है, जो नाथ नहीं आये। ऐसा लगता है कि मुझे कुटिल समझकर उन्होंने भुला दिया है।

चौपाई :

Ramcharitmanas Uttar Kand Chaupai Bhavarth Vyakhya in Hindi

अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी।।
कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा।।2.।।

जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी।।
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ।।3.।।

मोरि जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई।।
बीतें अवधि रहहि जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना।।4.।।

व्याख्या :

भरत मन ही मन विचार कर रहे हैं कि अहो लक्ष्मण ! बड़भागी और धन्य है, जो श्री राम जी के चरण कमलों के प्रेमी हैं। प्रभु जी ने मुझे तो कपटी और कुटिल जान लिया और इसीलिये तो नाथ ने मुझे साथ नहीं लिया।

आगे भरत मन ही मन विचार करते हैं और कहते हैं कि यदि प्रभु जी मेरी करनी पर ध्यान दें तो 100 करोड़ कल्पों तक भी मेरा उद्धार नहीं, पर प्रभु जी सेवक का अवगुण कभी नहीं मानते।

वे दीनबंधु है और अत्यंत ही कोमल स्वभाव के हैं। इसलिए मेरे जी में ऐसा पक्का भरोसा है कि श्री राम जी अवश्य मिलेंगे, क्योंकि मुझे शुभ शकुन हो रहे हैं और अवधि बीतने पर मेरे यदि प्राण रह जाये तो जगत में मेरे समान नीच कौन होगा ?

इसप्रकार दोस्तों ! आज हमने श्री रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड के प्रारम्भिक श्लोक, दोहे और चौपाइयों की विस्तृत व्याख्या को समझा। उम्मीद है कि आपको पढ़कर अच्छा लगा होगा। फिर मिलते है अगले कुछ दोहों और चौपाइयों के साथ। धन्यवाद !


यह भी जरूर पढ़े :


एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Ramcharitmanas Uttar Kand रामचरितमानस उत्तरकांड व्याख्या के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

नोट्स अच्छे लगे हो तो अपने दोस्तों को सोशल मीडिया पर शेयर करना न भूले I नोट्स पढ़ने और HindiShri पर बने रहने के लिए आपका धन्यवाद..!


Leave a Comment

error: Content is protected !!