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Shukla – Bhramar Geet Saar | भ्रमरगीत सार के पदों की व्याख्या


Shukla – Bhramar Geet Saar in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! जैसाकि हम रामचंद्र शुक्ल द्वारा संपादित “भ्रमरगीत सार” का विस्तृत अध्ययन कर रहे है। इसी क्रम में आज हम इसके अगले पदों #18-20 की व्याख्या समझते है :

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Shukla – Bhramar Geet Saar | भ्रमरगीत सार व्याख्या [#18-20 पद]


Ramchandra Shukla Bhramar Geet Saar Vyakhya : दोस्तों ! रामचंद्र शुक्ल द्वारा सम्पादित कृति “भ्रमरगीत सार” के 18-20 तक के पदों की व्याख्या को इसप्रकार से समझिये :

#पद : 18.

Shukla – Bhramar Geet Saar Raag Dhanashri Vyakhya Bhavarth in Hindi

राग धनाश्री
हमसों कहत कौन की बातें?
सुनि ऊधो ! हम समुझत नाहीं फिरि पूँछति हैं तातें।।
को नृप भयो कंस किन मार्‌यो को वसुद्यौ-सुत आहि?
यहाँ हमारे परम मनोहर जीजतु हैं मुख चाहि।।

दिनप्रति जात सहज गोचारन गोप सखा लै संग।
बासरगत रजनीमुख आवत करत नयन-गति पंग।।
को ब्यापक पूरन अबिनासी, को बिधि-बेद-अपार?
सूर बृथा बकवाद करत हौ या ब्रज नंदकुमार।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. ऊधो उद्धव
02. नृप शासक
03. वसुद्यौ-सुत श्री कृष्ण
04. गोचारन गाये चराने
05. बासरगत दिन बीत जाने

व्याख्या :

दोस्तों ! उद्धव गोपियों को अपना ब्रह्म ज्ञान का उपदेश देते हुए अपने निर्गुण ब्रह्म के विषय में बताते है कि निर्गुण ब्रह्म की भक्ति के द्वारा ही मोक्ष संभव है, इसलिए गोपियों को श्री कृष्ण के प्रति अपने आकर्षण को त्यागकर, ऐसे अविनाशी ब्रह्म की ओर एकाग्र होना चाहिए।

उद्धव के इस उपदेश की प्रतिक्रिया स्वरुप गोपियाँ उद्धव से कह रही है कि हे उद्धव ! आप हमसे किस विषय में बात कर रहे हो ? सुनो ! हमें तुम्हारी बातें समझ में नहीं आ रही। इसलिए हम तुमसे फिर से पूछ रही है कि भला बताओ तो सही कि तुम किसकी बातें कर रहे हो ?

तुम हमें बताओ कि मथुरा का शासक कौन हो गया है ? कंस का वध किसने किया है ? तथा वसुदेव और देवकी का पुत्र कौन है ? ये कोई और ही श्री कृष्ण होगा, जिसने ये सारे कार्य किये है। यहाँ तो हमारे श्री कृष्ण परम सुन्दर है, जिनके मनमोहक मुख को देखकर ही हम सब जी रही है।

Shukla – Bhramar Geet Saar

वह सहज रूप से अपने स्वभाव के अनुसार प्रतिदिन अपने गोप-सखाओं को साथ लेकर गाये चराने वन में जाया करते थे और दिन बीत जाने पर संध्या समय लौटकर आते थे। ऐसे अनुपम सुन्दर श्री कृष्ण को देखकर हमारे नेत्रों की गति पंगु हो जाती थी अर्थात् हम उनके सौंदर्य की छवि में स्तब्ध होकर, स्वयं को भूल जाते थे। श्री कृष्ण के सौंदर्य को हम अपलक देखा करती थे।

आगे गोपियाँ कहती है कि तुम्हारा यह सर्वव्यापी परिपूर्ण अविनाशी ब्रह्म, जो वेद के ज्ञान से भी परे है, कौनसा है ? हम ऐसे ब्रह्म के विषय में कुछ नहीं जानती। हमारे विचार में तो ब्रह्म सम्बन्धी तुम्हारी सभी बातें वस्तुतः व्यर्थ का प्रलाप है। ब्रज में तो नंदकिशोर ही सर्वस्व है और हम किसी ब्रह्म को नहीं जानती है।

दोस्तों ! इस पद में गोपियों की वाग्विदग्धता दर्शनीय है, जिसके बल पर उद्धव की ब्रह्म स्थापना को निष्तेज बना दिया है। गोपियों के मतानुसार उनके ब्रह्म श्री कृष्ण है, जो सगुण साकार रूप में उनके प्रियतम है और उनके सम्मुख विद्यमान है। इसी कारण उन्हें उद्धव की तर्कभरी बातें व्यर्थ बकवाद (बकवास) लग रही है।


#पद : 19.

Shukla – Bhramar Geet Saar Arth with Hard Meaning in Hindi

तू अलि ! कासों कहत बनाय?
बिन समुझे हम फिरि बूझति हैं एक बार कहौ गाय।।
किन वै गवन कीन्हों सकटनि चढ़ि सुफलकसत के संग।
किन वै रजक लुटाइ बिबिध पट पहिरे अपने अंग?
किन हति चाप निदरि गज मार्‌यो किन वै मल्ल मथि जाने?
उग्रसेन बसुदेव देवकी किन वै निगड़ हठि भाने?
तू काकी है करत प्रसंसा, कौने घोष पठायो?
किन मातुल बधि लयो जगत जस कौन मधुपुरी छायो?
माथे मोरमुकुट बनगुंजा, मुख मुरली-धुनि बाजै।
सूरदास जसोदानंदन गोकुल कह न बिराजै।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. सुफलकसत अक्रूर जी
02. रजक धोबी
03. गज हाथी
04. मधुपुरी मथुरा

व्याख्या :

दोस्तों ! उद्धव गोपियों के प्रति श्री कृष्ण का संदेश सुनाने के बाद, अपने ज्ञानयोग का उपदेश दे चुके हैं। उद्धव का मत यह है कि जिस श्री कृष्ण के प्रति गोपियों ने अपने हृदय की लौ लगाई हुई है, वह ब्रह्म नहीं है, बल्कि मथुरा का राजा है तथा वसुदेव और देवकी का पुत्र है। अतः उन्हें निर्गुण ब्रह्म की भक्ति में लीन होना चाहिए, तभी उनका मोक्ष संभव है।

अब इसके उत्तर में गोपियां कह रही हैं कि हे उद्धव ! आप यह ना समझ में आने वाली बातें गढ़ -गढ़ कर किसको सुना रहे हो ? आपकी बातें अभी तक हमारी समझ में नहीं आई है और इसी कारण हम आपसे पूछ रही हैं कि एक बार धीरे-धीरे फिर कहो। गोपिया फिर कहती है कि ब्रज से अक्रूर जी के साथ रथ में बैठकर मथुरा कौन गया था और किसने कंस के धोबी के सभी वस्त्र लुटवा दिए थे ? शरीर पर अनेक प्रकार के राजसी वस्त्र भला कौन धारण करता है ?

Shukla – Bhramar Geet Saar

अब तुम यह भी बताओ कि किसने कंस के राजसी धनुष को भंग किया था ? किसने कंस के मदमस्त हाथी का निरादर करके वध किया था ? किसने कंस द्वारा भेजे गए मल्लों का वध किया था ? उग्रसेन, वसुदेव और देवकी कारागार में बंद थे, किसने उनकी बेड़ियों को दृढ़ता पूर्वक काटकर मुक्त करवाया था ? उद्धव तुम किसका इतना गुणगान कर रहे हो ? किसने तुम्हें यहां ग्वालों की बस्ती में भेजा है ? किसने कंस का वध करके सारे संसार में कीर्ति अर्जित की है और अब मथुरा पर शासन कर रहा है ? हम उन्हें नहीं जानते हैं।

सूरदास जी कहते हैं कि गोपियों के श्री कृष्ण सिर पर मोर-मुकुट और गले में गुंजाओं की माला धारण करने वाले हैं। वे अत्यंत मनमोहक छवि वाले हैं और वे अपने मुख से बंसियों की मधुर ध्वनि निकालते हैं। वे ब्रज में सर्वत्र विद्यमान रहते हैं। हे उद्धव ! आप ही बताओ कि वे गोकुल में कहाँ नहीं विद्यमान है ? इस पद में गोपियां उपहास करती हुई दिखाई दे रही हैं।


#पद : 20.

Shukla – Bhramar Geet Saar Raag Saarang Shabdarth Sahit in Hindi

राग सारंग
हम तो नंदघोष की वासी।
नाम गोपाल, जाति कुल गोपहि, गोप गोपाल-उपासी।।
गिरिवरधारी, गोधनचारी, बृन्दावन – अभिलासी।
राजा नंद, जसोदा रानी, जलधि नदी जमुना सी। ।
प्रान हमारे परम मनोहर कमलनयन सुखरासी
सूरदास प्रभु कहौं कहाँ लौं अष्ट महासिधि दासी।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. गोपाल-उपासी श्री कृष्ण की उपासिका
02. गोधनचारी गाय रूपी धन को चराने वाले
03. सुखरासी सुखों की खान
04. अष्ट महासिधि आठों महासिद्धियाँ

व्याख्या :

दोस्तों ! उद्धव के ज्ञानोपदेश देने के बाद गोपियां उन्हें उत्तर दे रही हैं कि श्री कृष्ण सदैव गोकुल में विराजमान हैं। वे अपनी रूपराशि और बंसी की तानों के कारण सभी के आकर्षण का केंद्र है। ऐसे श्री कृष्ण को त्यागकर निर्गुण ब्रह्म को कौन भजे ? गोपियां कहती हैं कि हम नंदगांव गोकुल की रहने वाली हैं। हमारा नाम गोपाल है। हमारी जाति और कुल गोपों का है और गोप होने के कारण हम श्री कृष्ण की उपासिका है। हम उनकी पूजा-अर्चना करती है और इस प्रकार अत्यंत प्रसन्न है।

श्री कृष्ण के गोपाल होने से और हमारे गोप-वंश एवं गोप-कुल के होने से दोनों में निकट की समानता है। गोपियाँ कहती है कि हमारे गोपाल, गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले हैं। वे गाय रूपी धन को चराने वाले है। वे वृंदावन में अनुराग रखते हैं। वे हमारे राजा हैं और यशोदा हमारी रानी है। इस प्रदेश में विशाल समुद्र की भांति यमुना नदी प्रवाहित होती है। कमल के समान सुंदर नेत्रों वाले और परम मनोहर सौंदर्य एवं सुखों की खान श्री कृष्ण ही हमारे प्राण हैं।

Shukla – Bhramar Geet Saar

दोस्तों ! सूरदास जी कहते हैं कि हे उद्धव ! हम तुम्हें यहां के सुख का क्या वर्णन करें ? यहां के सुख की तुलना में आठों महासिद्धियों से प्राप्त सुख भी फीका है। वैष्णव मत के अनुसार आठों सिद्धि और नवनिधि से पूर्ण सुख की प्राप्ति देवताओं एवं महान अवतारों को ही प्राप्त होती है, पर गोपियाँ यह सुख श्री कृष्ण के सुंदर मुख और बंसी की तान से प्राप्त सुख से तुच्छ मानती हैं।

गोपियाँ उद्धव से यह बताना चाहती है कि उनका अपना एक राज्य है, जिसके राजा-रानी नंद और यशोदा है तथा समुद्र के समान विशाल यमुना नदी इसकी सीमा का निर्धारण करती है। गोपियाँ कहती है कि श्री कृष्ण कमल के समान सुंदर नेत्रों वाले, परम मनोहर सौंदर्य और सुखों की खान है। इस पद में अनुप्रास अलंकार प्रयुक्त हुआ है।

इसप्रकार दोस्तों ! आज हमने Shukla – Bhramar Geet Saar | भ्रमरगीत सार के 18 से 20 तक के पदों की व्याख्या समझ ली है। उम्मीद है कि आपको समझ में तो आ ही रहा होगा। अगले पदों की व्याख्या के साथ फिर से मिलते है। धन्यवाद !

ये भी अच्छे से समझे :


एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Shukla – Bhramar Geet Saar | भ्रमरगीत सार के पदों की व्याख्या के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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