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भ्रमरगीत सार की व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya by Surdas


भ्रमरगीत सार की व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya by Surdas in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! आज हम रामचंद्र शुक्ल द्वारा संपादित “भ्रमरगीत सार” के पद संख्या #42-44 की विस्तृत व्याख्या करने जा रहे है। चलिए समझने की कोशिश करते है :

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भ्रमरगीत सार की व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya [पद #42-44]


Bhramar Geet Saar Arth Vyakhya by Surdas in Hindi : दोस्तों ! “भ्रमरगीत सार” के 42-44 तक के पदों की व्याख्या को इस तरह से समझ सकते है :

#पद : 42.

भ्रमरगीत सार की व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya Bhavarth by Surdas in Hindi

अँखिया हरि-दरसन की भूखी।
कैसे रहैं रूपरसराची ये बतियाँ सुनि रूखी।।
अवधि गनत इकटक मग जोवत तब एती नहिं झूखी
अब इन जोग-सँदेसन ऊधो अति अकुलानी दूखी।।
बारक वह मुख फेरि दिखाओ दुहि पय पिवत पतूखी
सूर सिकत हठि नाव चलाओ ये सरिता हैं सूखी।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. दरसन दर्शन
02. रूपरसराची रूप के रस में भीगी हुई
03. बतियाँ बातें
04. रूखी शुष्क
05. गनत गिनते हुये
06. इकटक बिना पालक झपके
07. मग जोवत राह देख रही है
08.झूखी दुखी हुई
09. बारक एक बार
10. फेरि पुनः
11. पय दूध
12. पतूखी पत्ते का दोना
13. सिकत रेत
14. हठि जिद

व्याख्या :

दोस्तों ! इस पद में गोपियाँ श्री कृष्ण जी के उस रूप का दर्शन करना चाहती है, जिसमें वह पत्तों के दोने में दूध दुहकर दिया करते थे। गोपियाँ कहती है कि हे उद्धव ! क्या आप अभी तक नहीं समझ पाये कि हमारी आंखें तो प्रिय श्री कृष्ण के दर्शन के लिए लालायित है। हमारी जो आंखों की भूख है, आपके नीरस ज्ञान योग के उपदेशों से कैसे मिट सकती है ? कल तक जो आँखे श्री कृष्ण के रूप के रस में डूबी रहती थी, वे आज आपके नीरस उपदेशों से कैसे संतुष्ट हो सकती है ?

जब हम श्री कृष्ण के मथुरा से लौटने की अवधि को एक-एक दिन करके गिन रही थी अर्थात् हमारी आँखें टकटकी लगाकर उनके आगमन के मार्ग को देख रही थी। तब भी ये इतनी नहीं खिंजी थी। पर आज आपके इन योग संदेशों को सुनकर हमारी आँखें अत्यंत दुखी हो रही है। अब आप ज्ञान योग के उपदेशों को बंद कर दीजिये।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya by Surdas

बस एक बार हमें श्री कृष्ण के उस रूप का दर्शन करा दीजिये, जिसमें वह पत्ते के दोने में दूध दुहकर पिया करते थे। हम तो उसी श्री कृष्ण की आस लगाये बैठी है, जो गोपियों से हिल-मिलकर रसमय क्रीड़ाये किया करते थे।

सूरदास जी कहते है कि गोपियों ने उद्धव से कहा कि हे उद्धव ! आप अपनी योग की नाव को हमारी सूखी सरिताओं जैसे हृदयों में बलपूर्वक चलाना चाहते हो। यह कभी संभव नहीं हो सकता, श्री कृष्ण प्रेम अनुरक्त हमारे हृदयों पर तुम्हारे योग का कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता है।


#पद : 43.

भ्रमरगीत सार की व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya by Surdas Raag Sarang with Hard Meaning in Hindi

राग सारंग
जाय कहौ बूझी कुसलात।
जाके ज्ञान न होय सो मानै कही तिहारी बात।।
कारो नाम, रूप पुनि कारो, कारे अंग सखा सब गात
जौ पै भले होत कहुँ कारे तौ कत बदलि सुता लै जात।।
हमको जोग, भोग कुबजा को काके हिये समात ?
सूरदास सेए सो पति कै पाले जिन्ह तेही पछितात।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. बूझी पूछी
02. कुसलात कुशलक्षेम
03. जाके जिसके
04. तिहारी तुम्हारी
05. कारो काला
06. गात शरीर
07. कत क्यों
08. काके किसके
09. समात विश्वास
10. सेए सेवा की
11. पाले पालन किया
12. पछितात पश्चाताप

व्याख्या :

दोस्तों ! गोपियाँ क्षुब्ध होकर उद्धव से कहती है कि हे उद्धव ! तुम वापस मथुरा चले जाओ और जाकर के श्री कृष्ण से कहो कि हमने उनकी कुशलक्षेम पूछी है। उनकी कुशलक्षेम पूछने और हमारे समाचार देने के बाद, उनसे कहना कि जो अज्ञानी होगा, वही आपकी बातों को मानेगा। आपके योग मार्ग को अपना लेने का जो संदेश है, उसे वही व्यक्ति मान सकता है, जो बिल्कुल अज्ञानी होगा।

श्री कृष्ण का नाम काला है और रंग-स्वरूप भी काला है। उनके जितने भी सखा है : अक्रूर जी, उद्धव आदि उन सभी के शरीर के समस्त अंग भी काले है। स्वयं श्री कृष्ण और उनके सभी मित्र तन-मन से काले और कपटी है।

यदि ये काले वर्ण वाले कपटी और धोखेबाज नहीं होते वरन अच्छे होते तो वसुदेव अपने पुत्र श्याम वर्ण के श्री कृष्ण को छोड़कर, बदले में नंदबाबा की लड़की को नहीं ले जाते। वसुदेव ने काले श्री कृष्ण को यहाँ छोड़कर उनसे पीछा इसीलिए छुड़ा लिया था, क्योंकि काले वर्ण वाले बुरे होते है। तुम सब काले लोग इतने दुष्ट हो कि नारी-नारी में भी अंतर करते हो।

हम गोपियों के लिए तो योग साधना को उचित बताते हो और कुब्जा के लिए भोग को। तुम्हारा यह जो व्यवहार है, ये किसके हृदय में समाने वाला है। ये तो सरासर अन्याय है अर्थात् किसी के भी समझ में नहीं आने वाला है।

सूरदासजी गोपियों के माध्यम से कह रहे है कि श्री कृष्ण के इसप्रकार छल-कपटपूर्ण व्यवहार पर, उन्हें पति समान मानने वाली हम गोपियाँ ही नहीं अपितु पुत्र के समान मानने वाले, उनका भरण-पोषण करने वाले नन्द और यशोदा भी पछताते है।


#पद : 44.

भ्रमरगीत सार की व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya by Surdas Shabdarth Sahit in Hindi

कहाँ लौं कीजै बहुत बड़ाई।
अतिहि अगाध अपार अगोचर मनसा तहाँ न जाई।।
जल बिनु तरँग, भीति बिनु चित्रन, बिन चित ही चतुराई।
अब ब्रज में अनरीति कछू यह ऊधो आनि चलाई।।
रूप न रेख, बदन, बपु जाके संग न सखा सहाई।
ता निर्गुन सों प्रीति निरंतर क्यों निबहै, री माई ?
मन चुभि रही माधुरी मूरति रोम रोम अरुझाई।
हौं बलि गई सूर प्रभु ताके जाके स्याम सदा सुखदाई।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. लौं तक
02. अतिहि बहुत ज्यादा
03. अगोचर ना दिखाई देने वाला
04. मनसा मन
05. तरँग लहर
06. भीति दीवार
07. अनरीति अनोखी
08. बदन शरीर
09. बपु मुख
10. माधुरी सुन्दर
11. ताके जिनके

व्याख्या :

गोपियाँ कहती है कि हे उद्धव ! तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म की प्रशंसा कहाँ तक करे ? तुम उनके बारे में जो कथन कहते हो। वे बड़े विचित्र है। तुम्हारे मन में जो तुम्हारा निर्गुण ब्रह्म है, वो अगाध, अपार और इतना अगम्य है कि मानव मन भी उस तक नहीं पहुँच सकता अर्थात् वह मानव मन से भी परे है। तुम्हारा यह निर्गुण सम्प्रदाय बहुत विचित्र है। इसमें बिना अपेक्षित उपादानों के ही वस्तुएँ निर्मित हो जाती है।

बिना जल के तरंगे उत्पन्न हो जाती है, बिना दीवार के या अन्य किसी आधार के बिना ही चित्रों का अंकन होता है। और चित्र के बिना ही चतुराई प्रदर्शित की जाती है। हे उद्धव ! तुमने यहाँ ब्रज में आकर इसप्रकार की अनोखी रीत चलाई है। तुम असंभव बातें कह कर हमें बहला रहे हो। और अपने जाल में फँसाना चाहते हो।

भ्रमरगीत सार की व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya by Surdas

ना तो तुम्हारे ब्रह्म की कोई रूप रेखा है, ना आकार है और ना ही उसका कोई मुख है, ना कोई शरीर है। उनके साथ में ना कोई मित्र है और ना कोई सहायक ही है। अब तुम ही बताओ कि ऐसी विशेषताओं से सम्पन्न तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म के साथ हमारा प्रेम निर्वाह कैसे हो सकता है ?

हमारे श्री कृष्ण तो रूप और गुण से संपन्न है, इसलिए उनके साथ हमारा निरंतर प्रेम निर्वाह होता रहता है। प्रेम व्यापार चलता रहता है, किन्तु तुम्हारे निर्गुण ब्रह्म के साथ हमारा निरंतर प्रेम व्यवहार किस प्रकार हो सकता है ?

गोपियाँ कहती है कि हम तो श्री कृष्ण के माधुर्य पूर्ण मोहिनी मूरत के सामने मग्न रहती है। हमारे मन में तो श्री कृष्ण की वो मधुर और रूपहली मूर्ती घर कर गयी है। वो हमारे रोम-रोम में समायी हुयी है। इसलिए हे उद्धव ! हम उन्हीं लोगों पर बलिहारी जाती है, जिसके लिए हमारे प्रभु श्री कृष्ण सदा सुखदायी है। हम श्री कृष्ण प्रेमियों पर अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तत्पर है।

दोस्तों ! उम्मीद है कि Bhramar Geet Saar Vyakhya by Surdas भ्रमरगीत सार के 42-44 पदों की विस्तृत व्याख्या आपको अच्छे से समझ में आ ही गयी होगी। फिर मिलते है जल्दी ही !

ये भी अच्छे से समझे :


एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको भ्रमरगीत सार की व्याख्या Bhramar Geet Saar Vyakhya by Surdas के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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