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Bhramar Geet Saar by Shukla in Hindi भ्रमरगीत सार व्याख्या


Bhramar Geet Saar Arth Vyakhya by Shukla in Hindi भ्रमरगीत सार व्याख्या : नमस्कार दोस्तों ! आज हम रामचंद्र शुक्ल द्वारा संपादित “भ्रमरगीत सार” के 69-70 पदों की शब्दार्थ सहित व्याख्या करने जा रहे है। और इसी के साथ आज हम इसका समापन भी करने जा रहे है।

प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से हमने इसके कुल 70 पदों को विस्तार से समझाने की कोशिश की है। और इस कोशिश में आपने हमारा साथ दिया एवं धैर्य बनाये रखा, इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। तो चलिए अब आगे के पदों को समझ लेते है :

आप रामचंद्र शुक्ल द्वारा सम्पादित भ्रमरगीत सारका विस्तृत अध्ययन करने के लिए नीचे दी गयी पुस्तकों को खरीद सकते है। ये आपके लिए उपयोगी पुस्तके है। तो अभी Shop Now कीजिये :


भ्रमरगीत सार Bhramar Geet Saar by Shukla in Hindi [पद #69-70]


Bhramar Geet Saar Vyakhya by Shukla 69-70 in Hindi भ्रमरगीत सार व्याख्या : दोस्तों ! “भ्रमरगीत सार” के 69-70 पदों की व्याख्या इसप्रकार से है :

#पद : 69.

भ्रमरगीत सार व्याख्या Bhramar Geet Saar by Shukla Raag Dhanashri Meaning in Hindi

राग धनाश्री
प्रकृति जोई जाके अंग परी।
स्वान-पूँछ कोटिक जो लागै सूधि न काहु करी।।
जैसे काग भच्छ नहिं छाँड़ै जनमत जौन घरी।

धोये रंग जात कहु कैसे ज्यों कारी कमरी?
ज्यों अहि डसत उदर नहिं पूरत ऐसी धरनि धरी।
सूर होउ सो होउ सोच नहिं, तैसे हैं एउ री।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01.प्रकृतिस्वभाव, आदत
02.स्वानकुत्ता
03.कोटिककरोड़ों
04.सूधिसीधी
05.न काहू करीकोई नहीं कर सका
06.कागकौआ
07.भच्छ न खाने योग्य पदार्थ
08.जनमतजन्म लेते ही
09.जौन घरीजिस समय
10.कारी कमरीकाला कंबल
11.अहिसर्व
12.धरनि धरीटेक पकड़ रखी है, स्वभाव बन गया है
13.एउ यह भी

व्याख्या :

दोस्तों ! एक गोपी अन्य गोपी से कहती है कि जिसका जैसा स्वभाव हो जाता है, उसको फिर बदला नहीं जा सकता। आज तक कोई करोड़ों प्रयत्न करके भी कुत्ते की पूँछ को सीधा नहीं कर पाया है। इसका कारण यह बताया है कि पूँछ-स्वभाव सदा टेढ़ा है और स्वभाव को बदला नहीं जा सकता। इसलिए अब उसे सीधा नहीं किया जा सकता।

एक उदाहरण और दिया गया है कि कौआ जन्म से ही ना खाने योग्य पदार्थों को खाना प्रारंभ कर देता है। कौआ ना खाने योग्य पदार्थों को भी खाने की तरह खाता है और पूरे जीवन इस स्वभाव को नहीं छोड़ता है। तुम ही बताओ कि धोने से काले कंबल का रंग उतर सकता है? जैसे सांप दूसरों को डसने का काम करता है, लेकिन दूसरों को डसने से उसका पेट नहीं भरता, क्योंकि डसने से उसके पेट में तो कुछ जाता ही नहीं है।

फिर भी उसका स्वभाव बन गया है – डसना। इसलिए वह इसे छोड़ता नहीं है और ऐसे ही उद्धव का दूसरों को दुखी करने का स्वभाव बन गया है। इन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं है कि इनके इस व्यवहार का क्या परिणाम होगा ? यह तो बस ऐसे ही है अर्थात् दूसरों को दुखी करना इनका स्वभाव बन गया है। इन्हें इसी बात में आनंद मिलता है। दोस्तों ! गोपियों ने मानव स्वभाव का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया है।


#पद : 70.

भ्रमरगीत सार व्याख्या Bhramar Geet Saar by Shukla Raag Ramkali with Hard Meaning in Hindi

राग रामकली
तौ हम मानैं बात तुम्हारी।
अपनो ब्रह्म दिखावहु ऊधो मुकुट-पितांबरधारी।।
भजिहैं तब ताको सब गोपी सहि रहिहैं बरु गारी।
भूत समान बतावत हमको जारहु स्याम बिसारी।।
जे मुख सदा सुधा अँचवत हैं ते विष क्यों अधिकारी?
सूरदास प्रभु एक अंग पर रीझि रहीं ब्रजनारी।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01.बरुभले ही
02.गारीगाली, चरित्रहीन होने की गाली
03.भूत समान छाया मात्र
04.जारहुदग्ध करते हो
05.बिसारीभुलाकर
06.अँचवत आचमन करते हैं, पान करते हैं
07.रीझिमुग्ध हुई

व्याख्या :

दोस्तों ! प्रस्तुत पद में गोपियां उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव ! हम तुम्हारी बात को मानकर तुम्हारे ब्रह्म को स्वीकार कर लेंगे, पर हमारी एक शर्त है और शर्त यह है कि तुम अपने ब्रह्म के मोर मुकुट और पीतांबर धारण किये हुये दर्शन करा दो। अर्थात् यदि तुम्हारा ब्रह्म श्री कृष्ण का वेश धारण करके हमारे सम्मुख आ जाता है तो हम उसे स्वीकार कर लेंगे।

ऐसा करते हुए हम बिल्कुल भी संकोच नहीं करेंगी। हम तुम्हारी बात मान जायेंगे। फिर हम सब मिलकर उसका ध्यान करेंगे, चाहे हमें इसके लिए यह संसार गाली ही क्यों ना दे ? चरित्रहीन ही क्यों न बताये ? हम इसे भी सहन कर लेंगी।

लेकिन हमें यह लगता नहीं है कि तुम हमें अपने ब्रह्म का श्री कृष्ण रूप में दर्शन करा दोगे, क्योंकि तुम तो अपने ब्रह्म को छायाहीन एवं आकारहीन बताते हो, भूत के समान बताते हो और उनका मोर मुकुट एवं पीतांबर धारण करना असंभव है, इसलिए हम श्री कृष्ण को भूलाकर, तुम्हारे ब्रह्म को स्वीकार नहीं कर पायेंगे।

Bhramar Geet Saar by Shukla in Hindi

हम तो सदा अपने मुख से अमृत का पान करती आई है और उसी मुख से आज विष का पान कैसे कर सकती है ? अर्थात् हमारा मुख अमृत के समान प्राणदायक और मधुर श्री कृष्ण का नाम स्मरण करने का आदी हो चुका है। वह आज तुम्हारे विष के समान घातक और कटु ब्रह्म का नाम कैसे जप सकता है ?

हे उद्धव ! हम सम्पूर्ण ब्रज की नारियां अपने श्री कृष्ण के मनोहर शरीर पर मुग्ध है और इसलिए उन्हें त्याग कर तुम्हारे शरीरविहीन, निराकार ब्रह्म को स्वीकार नहीं कर सकती।

दोस्तों ! गोपियां उद्धव के सम्मुख ऐसी शर्त रख रही है, जिसकी पूर्ति करना संभव नहीं है। प्रस्तुत पद में श्री कृष्ण के प्रति अटूट प्रेम का चित्रण किया गया है तथा मधुर भावों की अभिव्यक्त की गई है।


दोस्तों ! इसी के साथ भ्रमर गीत सार की व्याख्या श्रृंखला समाप्त होती है। हमने अब तक कुल 70 पदों की व्याख्या विस्तार से समझ ली है। उम्मीद करते है कि आपको समझने में कोई परेशानी नहीं हुई होगी। आप इन सभी पदों को क्रम से तैयार कर लीजिये। ये सभी पद बहुत ही महत्वपूर्ण है।

ठीक है तो दोस्तों ! फिर से मिलेंगे एक नए टॉपिक के साथ। आपसे एक विनम्र विनती है कि आप Hindishri को ज्यादा से ज्यादा शेयर कीजिये और अपने यार-दोस्तों को भी इस प्लेटफार्म के बारे में अवगत कराये।

ये भी अच्छे से समझे :


एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Bhramar Geet Saar by Shukla in Hindi भ्रमरगीत सार व्याख्या के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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