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Bhramar Geet Saar – Shukla | भ्रमरगीत सार के पदों की व्याख्या


Bhramar Geet Saar – Ramchandra Shukla In Hindi : नमस्कार दोस्तों ! पिछले कुछ दिनों से हम रामचंद्र शुक्ल द्वारा संपादित “भ्रमरगीत सार” के पदों का अध्ययन कर रहे है। इसी क्रम में आज हम इसके अगले #13-15 पदों की व्याख्या समझेंगे। तो चलिए शुरू करते है

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Bhramar Geet Saar – Shukla | भ्रमरगीत सार व्याख्या [#13-15 पद]


Ramchandra ShuklaBharmar Geet Saar Ki Vyakhya in Hindi : दोस्तों ! रामचंद्र शुक्ल द्वारा सम्पादित कृति “भ्रमरगीत सार” के अगले #13-15 पदों की विस्तृत व्याख्या को इसप्रकार से समझिये :

#पद : 13.

Bhramar Geet Saar – Shukla with Hard Meanings in Hindi

कोऊ आवत है तन स्याम।
वैसिय पट, वैसिय रथ-वैठनि, वैसिय है उर दाम।।

जैसी हुतिं उठि तैसिय दौरीं छाँड़ि सकल गृह-काम।
रोम पुलक, गदगद भई तिहि छन सोचि अंग अभिराम।।

इतनी कहत आय गए ऊधो, रहीं ठगी तिहि ठाम।
सूरदास प्रभु ह्याँ क्यों आवै बंधे कुब्जा-रस स्याम।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. वैसियवैसे ही
02. दौरीं दौड़ी चली
03. रोम पुलक शरीर रोमांचित हो गया
04. ठगी तटस्थ खड़ी रह गई

व्याख्या :

दोस्तों ! उद्धव रथ में बैठकर मथुरा से ब्रज आ गये है। उनका रूप-रंग, वस्त्र सभी श्री कृष्ण के समान है। श्री कृष्ण के रथ में बैठे होने से उद्धव को देखकर सबको श्री कृष्ण के लौट आने का भ्रम होता है। इसी स्थिति का वर्णन करते हुए कवि कहते है कि एक गोपी अपनी अन्य सखी से कह रही है कि देखो कोई श्याम वर्ण अर्थात् काले शरीर वाला पुरुष ब्रज की ओर चला आ रहा है। शायद वह श्री कृष्ण ही हो, उसने श्री कृष्ण के समान ही वस्त्र धारण किये हुये है और वैसे ही रथ में बैठा है। उसने श्री कृष्ण के समान ही गले में मोतियों की माला पहनी हुई है।

गोपिया जिस भी स्थिति में थी, वह बात सुनते ही उठी और जिधर से रथ आ रहा था, उधर दौड़ी चली। अपने समस्त ग्रहकार्य, जिन में भी वे संलग्न थी, छोड़कर दौड़ पड़ी। अत्यधिक आनंद के कारण उनका सम्पूर्ण शरीर रोमांचित हो गया। श्री कृष्ण के सुंदर शरीर की स्मृति होने पर वे गदगद हो उठी।

वे आपस में श्री कृष्ण के सौंदर्य और क्रीड़ाओं के बारे में बात कर रही थी कि इतने में ही उद्धव उनके निकट आ पहुंचे और गोपियाँ उद्धव को देखकर उसी स्थान पर पर तटस्थ खड़ी रह गई। उन्होंने तो श्री कृष्ण के आने की कल्पना की थी, पर अपने कृष्णा को न पाकर उन्हें अपार दुःख होता है और वे जहाँ खड़ी थी, वहीं की वहीं खड़ी रह गई।

सूरदास जी कह रहे हैं कि श्री कृष्ण के स्थान पर उद्धव को आया देखकर गोपियाँ आपस में बातें करती है कि श्री कृष्ण तो मथुरा में कुब्जा के प्रेम-पाश में बंधे हुये है। वे अब यहाँ क्यों आयेंगे। अब उन्हें हमारी क्या आवश्यकता है? पद की अंतिम पंक्ति में ईर्ष्या भाव स्पष्ट दिखाई देता है।


#पद : 14.

Bhramar Geet Saar – Shukla Shabdarth Sahit in Hindi

है कोई वैसिय अनुहारि।
मधुबन ते इत आवत, सखि री ! चितौ तु नयन निहारि।।

माथे मुकुट, मनोहर कुंडल, पीत बसन रुचिकारि।
रथ पर बैठि कहत सारथि सों ब्रज-तन बाँह पसारि।।

जानति नाहिंन पहिचानति हौं मनु बीते जुग चारि
सूरदास स्वामी के बिछुरे जैसे मीन बिनु वारि।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. इत इधर
02. बाँह पसारि बांह फैलाकर
03. जुग चारिचार युग
04. मीनमछली
05. वारिजल

व्याख्या :

दोस्तों ! उद्धव ब्रजभूमि में आ गये है और उनको देखकर एक गोपी दूसरी गोपी को कह रही है कि हे सखी ! इस रथ में बैठा व्यक्ति बिल्कुल श्री कृष्ण की रुपरेखा और मुखाकृति वाला जान पड़ता है। यह व्यक्ति मथुरा से इधर की ओर ही आ रहा है। तू स्वयं अपने नेत्रों से देख और सोच, यह श्री कृष्ण ही होना चाहिए।

उसने अपने मस्तक पर मोर मुकुट और कानों में मनोहर कुण्डल धारण किये है। वह रथ में बैठे हुए ब्रज की ओर बांह फैलाकर अपने सारथी से कुछ कह रहा है। इससे स्पष्ट है कि वह ब्रज की ओर ही आ रहा है और वह अवश्य श्री कृष्ण ही है। आगे गोपी अपनी सखी से कहती है कि हे सखी ! मैं उसे पहचानती तो नहीं, पर ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ-कुछ पहचानती अवश्य हूँ। ऐसा लगता है जैसे इसे देखे चार युग हो गये है अर्थात् बहुत समय पहले इसे देखा था।

सूरदास जी कह रहे हैं कि उद्धव को देखकर गोपियों को अपने स्वामी श्री कृष्ण की अनुभूति हो आयी है। वे इस तरह विरह वेदना में छटपटाने लगी है, जिस तरह मछलियां पानी के बिना छटपटाने लगती है। श्री कृष्ण और उद्धव के रूप-रंग के साम्य के कारण गोपियों को यह भ्रान्ति हो रही है कि उन्होंने इसे पहले देखा है। भूली हुई सी स्मृति का यहाँ सुन्दर अंकन हुआ है।


#पद : 15.

Bhramar Geet Saar – Shukla Bhavarth or Mool Bhaav in Hindi

देखो नंदद्वार रथ ठाढ़ो।
बहुरि सखी सुफलकसुत आयो पज्यो सँदेह उर गाढ़ो।।

प्रान हमारे तबहिं गयो लै अब केहि कारन आयो।
जानति हौं अनुमान सखी री ! कृपा करन उठि धायो।।

इतने अंतर आय उपंगसुत तेहि छन दरसन दीन्हो।
तब पहिंचानि सखा हरिजू को परम सुचित तन कीन्हो।।

तब परनाम कियो अति रुचि सों और सबहि कर जोरे
सुनियत रहे तैसेई देखे परम चतुर मति-भोरे।।

तुम्हरो दरसन पाय आपनो जन्म सफल करि जान्यो।
सूर ऊधो सों मिलत भयो सुख ज्यों झख पायो पान्यो।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01. सुफलकसुत अक्रूर जी
02. उपंगसुत उद्धव
03. कर जोरेहाथ जोडे
04. भोरे भोले-भाले
05. झख मछलियां

व्याख्या :

दोस्तों ! उद्धव ब्रज में पहुंच गये है और नन्द बाबा से भेंट कर रहे है। उनका रथ नन्द के द्वार पर खड़ा है। उसे देखकर गोपियाँ अक्रूर जी के पुनः ब्रज में आने का अनुमान लगा रही है। वे आपस में बातें कर रही है। एक गोपी दूसरी गोपी से कहती है कि देखो वही रथ नन्द बाबा के द्वार खड़ा है।

मेरे हृदय में गहरा संदेह हो रहा है कि अक्रूर जी फिर आ गये है? ये अक्रूर जी हमारे प्राण और हमारे जीवन श्री कृष्ण को तो तभी ले गये थे, अब किस वजह से यहाँ पर आये है। हे सखी ! मैं अनुमान लगाकर यह समझ रही हूँ कि ये हम पर कोई कृपा करने आये है। संभव है कि ये इस बार हमारी कोई मनोकामना पूर्ण करने के लिये आये हो। मुझे इनका आना सार्थक प्रतीत होता है।

दोस्तों ! गोपियों आपस में इसप्रकार बातचीत कर रही होती है कि इसी समय उद्धव नन्द बाबा से भेंट करके बाहर आ जाते है। उन्होंने गोपियों को अपने दर्शन देकर लाभान्वित किया। उद्धव के निकट आने पर गोपियों ने अपने प्राण श्री कृष्ण के परम सखा के रूप में उन्हें पहचाना और तन-मन में संतोष प्राप्त किया। उनके संतोष का एक कारण यह था कि वे अक्रूर जी न होकर उद्धव थे।

Bhramar Geet Saar – Shukla

उन्हें अक्रूर जी के पूर्व आगमन और श्री कृष्ण के कारण अब तक यही भय बना हुआ था, जो उद्धव के आगमन पर निर्मूल सिद्ध हुआ। श्री कृष्ण के सखा उद्धव को पहचान कर सभी गोपियों ने उनको अत्यंत प्रेम के साथ हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

उद्धव से गोपिया कहती है कि हमने उनके विषय में जो कुछ सुन रखा है और जो धारणा उनके विषय में बनी हुई है, आप बिल्कुल उसी के अनुरूप है। आप अत्यंत चतुर बुद्धि वाले और भोले-भाले प्रतीत होते हैं। आपके दर्शन पाकर हमारा जन्म सफल हो गया हैं। आप हमारे प्रियतम श्री कृष्ण के परम सखा है, इसलिए हमारे लिये पूजनीय और आदरणीय है।

सूरदास जी कहते है कि गोपियाँ उद्धव से भेंट करके इसप्रकार प्रफुल्लित हो रही है, जैसे मछलियां जल को पाकर आनन्दित हो रही हो।


दोस्तों ! आज हमने Bhramar Geet Saar – Shukla | भ्रमरगीत सार के 13 से 15 तक के पदों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की है। उम्मीद करते है कि आपको अच्छे से समझ में आया होगा। अगले कुछ पदों के साथ फिर से मिलते है।

ये भी अच्छे से समझे :


एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको Bhramar Geet Saar – Shukla | भ्रमरगीत सार के पदों की व्याख्या के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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