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भ्रमरगीत सार अर्थ Bhramar Geet Saar Pad Arth by Surdas


भ्रमरगीत सार अर्थ Bhramar Geet Saar Pad Arth by Surdas in Hindi : नमस्कार दोस्तों ! पिछले कुछ समय से हम लगातार रामचंद्र शुक्ल द्वारा संपादित “भ्रमरगीत सार” के पदों की व्याख्या को समझते चले जा रहे है। महत्वपूर्ण होने के कारण हमने आपको इसे विस्तार से समझाने का प्रयास किया है। उम्मीद है कि आपको पढ़कर अच्छा लग रहा होगा। तो चलिए आज हम इसके अगले पदों 45 से 47 की विस्तृत व्याख्या को देखते है :

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भ्रमरगीत सार अर्थ Bhramar Geet Saar Pad Arth [पद #45-47]


Bhramar Geet Saar Ke Pado Ka Arth by Surdas in Hindi : दोस्तों ! “भ्रमरगीत सार” के 45-47 तक के पदों की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत है :

#पद : 45.

भ्रमरगीत सार अर्थ Bhramar Geet Saar Pad Raag Malaar Bhavarth by Surdas in Hindi

राग मलार
काहे को गोपीनाथ कहावत ?
जो पै मधुकर कहत हमारे गोकुल काहे न आवत ?
सपने की पहिंचानि जानि कै हमहिं कलंक लगावत।
जो पै स्याम कूबरी रीझे सो किन नाम धरावत ?
ज्यों गजराज काज के औसर औरै दसन दिखावत।
कहन सुनन को हम हैं ऊधो सूर अनत बिरमावत।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01.काहे कोकिस लिए
02.काहे नक्यों नहीं
03.आवतआते
04. कूबरी कुबड़ी, कुब्जा
05.किनक्यों
06.धरावतरखते
07. औसर अवसर
08.औरेऔर
09.दसनदांत
10.अनतअन्यत्र और नहीं
11.बिरमावतविश्राम करते हैं

व्याख्या :

दोस्तों ! श्री कृष्ण ने मथुरा जाकर गोपियों को भुला दिया है और कुब्जा के प्रेम में फंस गये हैं। फिर भी उन्हें गोपीनाथ कहा जाता है, इसलिए व्यंग्य करते हुये गोपियां उद्धव से कह रही हैं कि हे उद्धव ! श्री कृष्ण अब भी स्वयं को गोपीनाथ क्यों कहलवाते हैं ? जबकि वे मथुरा जाकर हमें भुला बैठे हैं। अब इस नाम में कोई तथ्य नहीं रहा है। हे मधुकर ! यदि वे हमारे स्वामी ही कहलवाते हैं तो वे मथुरा से लौटकर गोकुल क्यों नहीं चले आते हैं ? एक तो वह हमारे साथ स्वप्न के समान थोड़ा सा परिचय बताते हैं और फिर खुद को गोपीनाथ भी कहलवाते हैं।

इस प्रकार तो यदि श्री कृष्ण उस कुबड़ी कुब्जा पर ही रीझ गये हैं तो उसी के नाम पर अपना नाम क्यों नहीं रखवा लेते – कुब्जानाथ या कुब्जापति। उनके गोपीनाथ नाम पर सारा संसार ही हमें कलंकिनी समझ रहा है। जबकि उनका और हमारा कोई साथ ही नहीं रहा। वे तो कुब्जा पर मोहित हैं और उसके साथ मथुरा में रहते हैं। यह तो वही बात हो गई कि हाथी के दांत खाने के और, और दिखाने के और होते हैं अर्थात् श्री कृष्ण की कथनी और करनी में अंतर है।

हे उद्धव ! कहने-सुनने के लिए तो हम उनकी प्रेमिकायें हैं और वे हमारे स्वामी होने के कारण गोपीनाथ भी कहलाते हैं, किंतु वास्तविकता तो यह है कि वे हमारे प्रियतम न होकर कुब्जा के प्रेम में फंसे हुये हैं और आजकल उसी के साथ मथुरा में रह रहे हैं। दोस्तों ! गोपीनाथ शब्द के द्वारा गोपियाँ श्री कृष्ण के छल और निष्ठुरता पर व्यंग्य कर रही हैं।


#पद : 46.

भ्रमरगीत सार अर्थ Bhramar Geet Saar Pad Arth by Surdas with Hard Meaning in Hindi

अब कत सुरति होति है, राजन् ?
दिन दस प्रीति करी स्वारथ-हित रहत आपने काजन।।
सबै अयानि भईं सुनि मुरली ठगी कपट की छाजन
अब मन भयो सिंधु के खग ज्यों फिरि फिरि सरत जहाजन।।
वह नातो टूटो ता दिन तें सुफलकसुत-सँग भाजन
गोपीनाथ कहाय सूर प्रभु कत मारत हौ लाजन।।

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01.कतकिस प्रकार
02.सुरतिस्मृति
03.प्रीतिप्रेम
04.काजनकार्य के लिए
05.अयानिअज्ञानी
06.छाजनकपट पूर्ण व्यवहार
07.भाजनभाग गए

व्याख्या :

दोस्तों ! श्री कृष्ण के विश्वासघात पर दु:खी होकर गोपियां उद्धव से कह रही हैं कि हे उद्धव ! अब श्री कृष्ण को हमारी याद कैसे आती होगी ? अब तो वे मथुरा के राजा है और वो कुब्जा उनकी रानी हो गई है। उसके सानिध्य में उन्हें हमारा अभाव क्या खटकता होगा ? उन्होंने अपने स्वार्थ के लिए 10 दिन अर्थात् थोड़े समय के लिए हमसे प्रेम बढ़ाया था, किंतु अब राजा बन जाने के कारण राजकाज में ही सारा समय निकल जाता होगा। अब उन्हें हमारी याद किस प्रकार आती होगी ?

श्री कृष्ण के बंसी के स्वर को सुनकर हम सब अज्ञानी हो गई थी और उसके प्रभाव में अपना तन-मन खो बैठी थी। वास्तव में उन्होंने तो प्रेम का ढोंग रचा था, किंतु हम इसे सत्य समझकर अपनी सुध-बुध खो बैठी और उनके चंगुल में फंस गई। अब तो हमारा मन उस जहाज के पक्षी के समान हो गया है, जो अन्यत्र कहीं कोई ठोर प्राप्त न करवाने के कारण, लौटकर पुनः उसी जहाज पर आ जाता है।

हमारे मन को श्री कृष्ण के अतिरिक्त अन्य किसी भी स्थान पर सुख नहीं मिलता और इसी कारण हमारा ध्यान उन्हीं की ओर जाता है। हमारा प्रेम का नाता तो उसी दिन टूट गया था, जिस दिन वे हमें अकेला छोड़कर अक्रूर जी के साथ मथुरा चले गये थे। अब तो बस इसी बात का दु:ख है कि उन्होंने हमसे स्नेह का रिश्ता तोड़ दिया है, फिर भी अभी तक गोपीनाथ क्यों बने हुये हैं ? यह सारा संसार हमें लांछित कर रहा है और हम सब लाज से मरी जा रही हैं।

दोस्तों ! माधुर्य और प्रसाद गुण-संपन्न शैली में ब्रज भाषा का सुन्दर प्रयोग सूरदास जी के द्वारा किया गया है।


#पद : 47.

भ्रमरगीत सार अर्थ Bhramar Geet Saar Raag Sorath Pad Arth by Surdas Shabdarth Sahit in Hindi

राग सोरठ
लिखि आई ब्रजनाथ की छाप
बाँधे फिरत सीस पर ऊधो देखत आवै ताप।।
नूतन रीति नंदनंदन की घरघर दीजत थाप
हरि आगे कुब्जा अधिकारी, तातें है यह दाप।।
आए कहन जोग अवराधो अबिगत-कथा की जाप।
सूर सँदेसो सुनि नहिं लागै कहौ कौन को पाप ?

शब्दार्थ :

क्रम संख्या शब्द अर्थ
01.छापचिन्ह
02.तापज्वर
03.नूतननवीन
04.थापस्थापित करना
05.आगेबढ़कर, अधिक
06. तातें इसी कारण
07.दापदर्द
08.अवराधोआराधना
09. अबिगत निराकार ब्रह्म

व्याख्या :

सूरदास जी के गोपियों के माध्यम से कहते हैं कि देखो, ब्रजनाथ के हाथों का लिखा हुआ पत्र आया है, जिस पर उनकी मुद्रा का चिन्ह भी अंकित है। इस प्रकार इस उद्धव बेचारे का कोई दोष नहीं है। योग का संदेश तो वास्तव में श्री कृष्ण ने हमारे लिए भेजा है। उद्धव अपनी ओर से कुछ नहीं कह रहे हैं। उद्धव तो इस पत्र की सुरक्षा के लिए इसे अपनी पगड़ी में बांधे हुए फिरते हैं।

इसे देखकर इन्हें क्रोध के कारण ज्वर आने लगता है। यह श्री कृष्ण के संदेश देने की नवीन रीति है। उनकी आज्ञा के अनुसार ही तो उद्धव घर-घर जाकर के, इस पत्र में जो संदेश निहित है, उसकी स्थापना कर रहे हैं अर्थात् सभी को श्री कृष्ण के निर्गुण ब्रह्म की आराधना करने की शिक्षा दे रहे हैं। ऐसा लगता है कि मथुरा में श्री कृष्ण की कुछ भी नहीं चलती। हर जगह कुब्जा का आदेश चलता है और उसके अधिकार श्री कृष्ण से भी अधिक है। इसी कारण उसे इतना घमंड हो गया है कि उसने श्री कृष्ण से चोरी करके इस पत्र पर, उनकी मोहर छाप कर इसे प्रमाणिक बना दिया है।

Bhramar Geet Saar Pad Arth by Surdas

वस्तुतः कुब्जा श्री कृष्ण को अपने तक ही सीमित रखना चाहती है। तात्पर्य यह है कि यह जो मोहर है, श्री कृष्ण ने नहीं लगाई है, बल्कि कुब्जा ने लगाई है। इस प्रकार यह कुब्जा द्वारा हमें भेजा गया संदेश है। कुब्जा हमें अन्य राह पर डालकर श्री कृष्ण का स्वयं अकेले ही भोग करना चाहती है। तभी तो उद्धव उनके संकेत पर यहां आये हैं और हमें निर्गुण ब्रह्म की कथा सुनाकर, योग साधना के बल पर उसे प्राप्त करने की शिक्षा दे रहे हैं।

इस अनुचित संदेश को सुनने में किसे पाप नहीं लगेगा ? हम गोपियां तो एकमात्र श्री कृष्ण की ही अनुरागिनी है। श्री कृष्ण को त्याग कर निर्गुण ब्रह्म की उपासना करने में हमें पाप लगता है। श्री कृष्ण की हम जैसी सच्ची प्रेमिकाओं के लिए, अपने प्रियतम श्री कृष्ण को त्याग कर, किसी अन्य से प्रेम करना और उसका ध्यान करना निश्चय ही पाप है।

इसप्रकार दोस्तों ! इन्हीं पदों के साथ आपके पास अब तक कुल 47 पदों के विस्तृत नोट्स हो गये है। अब इसके कुछ ही पद शेष रहे है। इन्हें भी हम आने वाले नोट्स में समझ लेते है ताकि आपको परीक्षा में कोई परेशानी ना हो। तो जुड़े रहिये हमारे साथ।

ये भी अच्छे से समझे :


एक गुजारिश :

दोस्तों ! आशा करते है कि आपको भ्रमरगीत सार अर्थ Bhramar Geet Saar Pad Arth by Surdas के बारे में हमारे द्वारा दी गयी जानकारी पसंद आयी होगी I यदि आपके मन में कोई भी सवाल या सुझाव हो तो नीचे कमेंट करके अवश्य बतायें I हम आपकी सहायता करने की पूरी कोशिश करेंगे I

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